आईडिया, प्लान और एक्शन है बिजनश की पूंजी

resizedimage (2)बहुत से लोग ऐसे हैं, जो बिजनस शुरू करना चाहते हैं, लेकिन उन्हें पता नहीं होता कि कौन सा मॉडल उनके लिए अच्छा होगा। हर बिजनेस मॉडल के अपने फायदे और नुकसान हैं। कुछ के लिए फ्रेंचाइजी मॉडल फायदेमंद हो सकता है, तो कुछ हर काम खुद करने में विश्वास करते हैं। ऐसे लोग प्रॉपराइटरशिप के साथ शुरुआत कर सकते हैं। वहीं, जो अकेले काम शुरू नहीं करना चाहते, उनके लिए पार्टनरशिप फर्म फायदेमंद हो सकती है। जानिए सकीना बबवानी से कुछ जरूरी बातें…

प्रॉपराइटरशिप यानी क्या?

सबसे सिंपल स्ट्रक्चर वाला बिजनस सेटअप यही होता है। इसमें सीधे दुकान खोलकर शुरुआत की जा सकती है। इसके लिए बिजनस के हिसाब से जरूरी अप्रूवल लेने पड़ते हैं। प्रोडक्ट्स मैन्युफैक्चर करने या डीलर बनने के लिए टैक्स आइडेंटिफिकेशन नंबर (टिन) की जरूरत होती है। इसमें कंपनी खोलने के मुकाबले कम अप्रूवल लेने की जरूरत होती है।

प्रॉपराइटरशिप बिजनस चलाने में ज्यादा आसानी होती है, लेकिन जवाबदेही भी ज्यादा होती है। क्रेडिट डिफॉल्ट में लेनदार प्रॉपराइटर की पर्सनल प्रॉपर्टी से बकाया वसूल कर सकता है। इसमें ओनर और फर्म की अलग आइडेंटिटी नहीं होती है। बिजनस में गड़बड़ी होने पर प्रॉपराइटर पर मुकदमा किया जा सकता है। बिजनस इनकम प्रॉपराइटर की पर्सनल इनकम में जुड़ती है, इसलिए टैक्स लायबिलिटी ज्यादा हो सकती है। जो लोग छोटा बिजनस शुरू करना चाहते हैं, लेकिन फ्यूचर को लेकर आश्वस्त नहीं हैं, उन्हें प्रॉपराइटरशिप के साथ शुरुआत करनी चाहिए।

पार्टनरशिप यानी क्या?

यह बिजनस शुरू करने का दूसरा आसान तरीका है। इसमें दो या ज्यादा लोग मिलकर बिजनस शुरू करते और नफा-नुकसान में हिस्सेदार बनते हैं। पार्टनरशिप फर्म की भी लीगल फॉर्मैलिटी बहुत कम है। इसके लिए पार्टनरशिप डीड करनी होती है, जिसमें सभी पार्टनर्स के अधिकार और जिम्मेदारी के साथ प्रॉफिट शेयर का भी जिक्र होता है। डीड में नियम और शर्तें भी होती हैं। इसमें लिखा होता है कि किस पाटर्नर की कितनी पूंजी होगी और उसे बिजनेस से प्रॉफिट का कितना हिस्सा मिलेगा।

डीड पर सभी पार्टनर्स के साइन होने जरूरी हैं। इसमें भी फर्म और पार्टनर्स की आइडेंटिटी अलग-अलग नहीं होती। इससे पार्टनर्स की देनदारी असीमित होती है। कोई पार्टनर अलग होना चाहता है और अपना हिस्सा किसी तीसरे को देना चाहता है, तो इस पर सबकी रजामंदी जरूरी होगी। सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि किसी पार्टनर के पागल होने, दिवालिया होने, रिटायर होने या मरने पर पार्टनरशिप फर्म खत्म हो जाती है। पार्टनर की संख्या लिमिटेड होती है। फैसले अकेले नहीं किए जा सकते। इसलिए कुछ मामलों में फैसले में देरी का रिस्क होता है। जो लोग कम पूंजी से मीडियम साइज का बिजनस शुरू करना चाहते हैं, उनके लिए पार्टनरशिप फर्म बेहतर ऑप्शन है।

कंपनी यानी क्या?

कंपनी की परिभाषा के हिसाब से किसी खास मकसद को हासिल करने के लिए कॉमन परपज वाले कुछ लोग या एक कॉरपोरेट बॉडी कंपनी बना सकते हैं। जो लोग या एंटिटी इसे बनाते हैं, प्रमोटर कहलाते हैं। कंपनियां कई तरह की होती हैं जैसे प्राइवेट लिमिटेड, पब्लिक, नॉन प्रॉफिट मेकिंग वगैरह। ज्यादातर स्टार्टअप प्राइवेट लिमिटेड कंपनी के जरिए बिजनेस शुरू करना पसंद करते हैं।

प्राइवेट कंपनियां पब्लिक से डिपॉजिट नहीं ले सकतीं। इन पर कंपनी एक्ट के कुछ प्रोविजन मानने की बाध्यता भी नहीं होती है, क्योंकि इनमें पब्लिक इंटरेस्ट कम से कम होता है। दूसरी तरफ पब्लिक कंपनी का मिनिमम पेडअप कैपिटल 5 लाख रुपए होना चाहिए। इसमें शेयर ट्रांसफर करने पर पाबंदी नहीं होती। ये स्टॉक एक्सचेंज पर लिस्टेड होते हैं और कोई भी इनके शेयर या डिबेंचर खरीद सकता है। कंपनी एक्ट के सभी प्रोविजन इन पर लागू होते हैं।

(साभार-एनबीटी)

 

 

 

 

 

 

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