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कानपुर रैली से खिला कमल, चेहरों में दिखी चमक

mmनरेन्द्र मोदी की कानपुर रैली उत्तर प्रदेश भाजपा के लिए मील का पत्थर है। एक जमाने के बाद कमल को यहां खिलते मुस्कुराते देखा गया। करीब एक दशक से पार्टी यहां बीमार थी। ना किसी दवा ने काम किया, ना दुआ का असर हुआ। ये मोदी थे, जिनके प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार घोषित होने से परिस्थितियां करवट लेती दिखाई दे रही है। उनकों आने से यहां पार्टी के चेहरे पर रौनक लौटी। लगा कि बीमार  का हाल अब अच्छा है। अब प्रदेश में पार्टी के लोगों को यह ऊर्जा गतिमान बनाए रखनी होगी। इस जिम्मेंदारी के निर्वाह के बाद ही बेहतर परिणाम की कल्पना सकार हो सकती है।

कानपुर की रैली का निष्पक्ष विश्लेषण निश्चय ही अद्भुत लग सकता है। रामजन्मभूमि के आन्दोलन के बाद ऐसा उत्साही हुजूम यहां पार्टी को पहली बार नसीब हुआ। कई अर्थो में यह उससे भी अलग था। निश्चय ही वह भावनात्मक मसला था। भावना पर आधारित माहौल बना। अन्य सभी मुद्दे पीछे छूट गए। हम कह सकते हैं कि रामराज्य सुशासन की पराकाष्ठा है। भगवान राम उसके प्रतीक है। वह परमवैभवशाली है। क्योंकि परमवैभवशाली महाराज दशरथ के पुत्र हैं। राम परमवैरागी है। क्योंकि चौदह वर्ष तक सहर्ष वन में रहे। वह स्थिति प्रज्ञ है। क्योंकि राम राज्यभिषेक की घोषणा से खुश नहीं होते और घोषणा के तत्काल बाद वनवास के आदेश से दुखी नहीं होते। समभाव। वह ऐसे राजा जो अपनी प्रजा को जीवन के अन्तिम पुरूषार्थ तक सम्यक ढंग से ले जाते हैं। इसलिए सर्वश्रेष्ठ राजा है। उत्तम पुरूष नहीं हैं, पुरूषोत्तम है। यहां कहने का तत्पर्य यह है जन्मभूमि आन्दोलन में रामराज्य की स्थपना का दिवास्वप्न नहीं था। केवल अयोध्या में रामजन्मभूमि पर भव्यमन्दिर निर्माण की इच्छा थी। इससे अधिक कुछ नहीं। यह मुद्दा भाजपा ने उठाया इस मुद्दे पर वह और से अलग दिखाई थी। अन्य पार्टियों की नजर में यह साम्प्रदायिक मुद्दा था। अर्थात औरों से अलग दिखने का भाजपा को भरपूर लाभ मिला। मुद्दे के प्रति वह विश्वसनीय दिखाई दी। इस आधार पर उसे जनसमर्थन मिला। गौर कीजिए, औरों से अलग दिखने की सीमा जितनी अधिक होती है,  भाजपा को उतना ही लाभ मिलता है। यह सीमा घटती है, तो नुकसान होता है। इसका सीधा अर्थ है- देश और प्रदेश में भाजपा को औरों से अलग देखने के अभ्यस्त है। पिछले दो दशकों से यह चुनावी ट्रेन्ड भी है।resizedimage (1)

फिर नरेन्द्र मोदी की ओर लौटते हैं। आज उनके नाम पर भीड़ उमड़ रही है। क्योंकि एक शासक के रूप में एक राजनेता के रूप  वह विश्वसनीय लगते हैं। कानपुर में लोगों का सैलाब इसी तथ्य की पुष्टि कर रहा था। इसीलिए भाजपा को रैली के नाम पर ऐसी सफलता मिली, जिसमें कोई भी भावनात्मक मुद्दा नहीं था। जिसमें जाति-मजहब से प्रेरित होकर आने वालों की भीड़ नहीं थी। उत्तर प्रदेश में तो लोग नरेन्द्र मोदी की जाति नहीं जानते। ना उसे जानने की उनमें जिज्ञासा है। फिर भी भीड़ है। यह कहना गलत होगा कि पार्टी की प्रदेश इकाई को भी ऐसी सफलता की उम्मीद नहीं थी। कोई अन्य अवसर होता तो शायद ऐसा कहा जा सकता था। लेकिन बात नरेन्द्र मोदी की थी। भीड़ का उमड़ना स्वाभाविक था। प्रदेश व क्षेत्र के लोगों ने मेहनत अवश्य की। लेकिन उन्हें भीड़ का पूर्वानुमान था। इसीलिए प्रदेश अध्यक्ष ल़क्ष्मीकांत वाजपेयी को यह निर्देश देना पड़ा, अपील करनी पड़ी कि कानपुर की सीमा से लगे जनपदों को छोड़कर अन्य लोग रैली में ना आऐं। ऐसा हुआ थी। गौर करनी वाल बात है कि प्रदेश में रैली के मामले में बसपा को अव्वल माना जाता है। लेकिन उसकी बड़ी रैलियों में सम्पूर्ण उत्तर प्रदेश ही नहीं, अन्य प्रान्तों के कार्यकर्ता भी शामिल होते हैं। मोदी की रैली क्षेत्रीय स्तर पर थी। लेकिन संख्या के मामले में उन्नीस नहीं थी।

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यह रैली एक अन्य मामले में भी विलक्षण थी। जिसका अनुभव वहां जाकर ही किया जा सकता था। रैली में युवाओं की संख्या बहुत अधिक थी। यह स्वतः स्फूर्त दिखाई दे रही थी। ऐसा लग रहा था जैसे यह बड़ा वर्ग मोदी के पक्ष में फैसला करने के बाद ही रैली स्थल पर आया था। उसकी मोदी को सुनने में भी बहुत दिलचस्पी नहीं थी। जैसे उसे सब कुछ पहले से पता है। इसीलिए वह निर्णय ले चुका है। जैसे वह मोदी को सुनने नहीं, मोदी को सुनाने के लिए आया है। वह लगातार अपनी बात, अपनी भावना मोदी तक पहुंचाना चाह रहा था। वह भी केवल दो शब्दों में मोदी-मोदी। बात समाप्त। कोई परम्परागत या रटा रटाया नारा नहीं। -संघर्ष करो हम तुम्हारे साथ है, या अभी तो यह अंगड़ाई है…… यह कुछ नहीं। सिर्फ मोदी-मोदी। बारंबार….बार-बार मोदी को हंसकर करना पड़ा आप नारा लगाते-लगाते गुस्सा हो जाते हैं। किसी भी राजनेता के लिए यह दुर्लभ अवसर हो सकता है।

यह स्थिति नरेन्द्र मोदी की विश्वसनीयता के कारण है। वह उत्तर प्रदेश को गुजरात बनाने की बात करते हैं। हुजुम उत्साहित होता है। ग्यारह वर्ष में एक दंगा नहीं। गांव-गांव में चौबीस घण्टे बिजली। कानून व्यवस्था की मजबूत स्थिति। वह अपने शासन का हिसाब देते हैं। इसी अवधि में केन्द्र के संप्रग सरकार का हिसाब मांगते हैं। लोग फिर उत्साहित होते हैं। वह भ्रष्टाचार, साम्प्रदयिक, तनाव की बात करते हैं। क्योंकि वह इसे गुजरात में दूर कर सकें। इसलिए विश्वसनीय दिखाई देते है। वह अपने गरीबी का बचपन का याद करते हैं, फिर गरीबों की बात करते हैं, लोग प्रभावित होते हैं। वह नेतृत्व के मुद्दे पर कांग्रेस को चुनौती देते हैं। यह तुलना लोग पसन्द करते हैं। यह तस्वीर साफ होती है। स्पष्ट है कि नरेन्द्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बना कर भाजपा की औरों से अलग दिखने की सीमा बढ़ी है। इस राह पर भाजपा सफलता की उम्मीद कर सकती है।

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(लेखक डॉ. दिलीप अग्निहोत्री सामाजिक कार्यकर्ता हैं )
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