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गोलगप्पे बेचे पर नहीं भूले जिंदगी का गोल, आइए जानेें उनके संघर्ष की कहानी…

हर इंसान को जिंदगी में कभी न कभी संघर्ष के दौर से गुजरना पड़ता है। कोई उसमें टूट जाता है तो कोई निखर जाता है। जो उस दौर का डटकर सामना करता है और उसको पार करता है, वही यशस्वी बन पाता है। यह कहानी है उत्तर प्रदेश के भदोही जिले के सुरियावां निवासी यशस्वी जायसवाल की, जिन्होंने संघर्ष के एक लंबे दौर का सामना किया। गोलगप्पे तक बेचे, लेकिन टूटे नहीं। बस आगे बढ़ते गए और आज बन चुके हैं विश्व रिकॉर्डधारी।

यशस्वी की कहानी शुरू होती है एक सपने से, जो उन्होंने बचपन में देखा था। क्रिकेटर बनने का। यशस्वी ने अपना सपना पिता भूपेंद्र जायसवाल से साझा किया। परिवार की माली हालत ऐसी नहीं थी कि बेटे को क्रिकेटर बना पाते। बेटे ने मुंबई में रहने वाले एक रिश्तेदार के घर भेजने की जिद की। पेंट व्यवसायी पिता ने उन्हें रोका नहीं और मुंबई के वरली इलाके में रहने वाले रिश्तेदार के यहां भेज दिया। यहीं से शुरू हुआ यशस्वी के संघर्ष का सफर।

यशस्वी मुंबई तो आ गए, लेकिन उनके रिश्तेदार के यहां इतनी जगह नहीं थी कि वह वहां रह पाते। कालबादेवी इलाके में स्थित एक डेयरी में उन्हें सोने की जगह इस शर्त पर मिली कि वह वहां काम भी करेंगे। यशस्वी ने हां तो बोल दिया, लेकिन ऐसा हो न सका। दिनभर क्रिकेट का अभ्यास करने के बाद जब शाम को वह लौटते तो सो जाते। डेयरी वाले ने उन्हें अपना बंदोबस्त कहीं और करने को कहा।

इसके बाद शुरू हुई नए ठिकाने की तलाश। 11 साल की उम्र में यशस्वी का नया ठिकाना बना मुंबई क्रिकेट की नर्सरी कहा जाने वाला आजाद मैदान। यहां वह मुस्लिम यूनाइटेड क्लब में ग्राउंड्समैन के साथ टेंट में रहने लगे। यहां भी उनके ठहरने के लिए एक शर्त रखी गई थी। यशस्वी से कहा गया कि उन्हें अच्छा प्रदर्शन करके दिखाना होगा। यशस्वी दिनभर क्रिकेट खेलते और रात को यहीं सो जाते। यहां खाना बनाने का काम भी उन्हें ही दिया गया।

पैसों के लिए काफी कुछ करना पड़ा

मुंबई में अपने संघर्ष को यशस्वी ने परिवार से कभी साझा नहीं किया। उनके पिता खर्चे के लिए कुछ पैसे भेज देते, लेकिन वह कम पड़ ही जाते। यशस्वी ने पैसे कमाने के लिए कई काम किए। आजाद मैदान पर बॉल अक्सर खो जाती थी। बॉल ढूंढ़ने वाले को कुछ रुपये दिए जाते थे। उन्होंने इससे कुछ पैसे कमाने शुरू किए। अच्छा प्रदर्शन करने पर मैन ऑफ द मैच के रूप में भी बतौर इनाम कुछ रुपये मिलते। इन सबके अलावा आजाद मैदान में होने वाली रामलीला के दौरान उन्होंने गोलगप्पे भी बेचे। कई बार ऐसा होता था कि वह गोलगप्पे बेच रहे होते थे और उनके साथी खिलाड़ी वहीं आ जाते। उन्हें आता देख यशस्वी ठेला छोड़ वहां से भाग जाते। जब ठेला मालिक उनसे पूछता तो वह कहते, ‘अगर वो मुझे इस तरह देख लेंगे तो क्या होगा। मैं सबकुछ कर सकता हूं पर उन्हें गोलगप्पे नहीं खिला सकता।’ इन सबके बावजूद वह कभी अपने जीवन का गोल नहीं भूले।

संघर्ष जारी था, लेकिन यशस्वी को कोई खास पहचान नहीं मिल पा रही थी। तभी उनके घर वालों ने उन्हें वापस घर बुलाने का फैसला किया। इसी बीच 2013 में आजाद मैदान पर अभ्यास के दौरान एक दिन उन पर कोच ज्वाला सिंह की नजर पड़ी। उत्तर प्रदेश के गोरखपुर से करीब ढाई दशक पहले मुंबई आए ज्वाला के जीवन की कहानी भी यशस्वी जैसी ही थी। वह यशस्वी के संघर्ष और खेल दोनों से प्रभावित हुए और उन्हें कोचिंग देने का निर्णय लिया। यहीं से इस युवा खिलाड़ी के दिन बदलने शुरू हो गए। ज्वाला सिंह की कोचिंग में यह युवा खिलाड़ी निखरता चला गया।

…और पूरे होने लगे सपने

जून 2018 यशस्वी के लिए किसी सपने से कम नहीं था। उन्हें श्रीलंका के खिलाफ अंडर-19 टीम में जगह मिली। हालांकि, शुरुआती मैचों में वह पूरी तरह से उम्मीदों पर खरे नहीं उतर सके। शुरुआती दो मुकाबलों में उनके बल्ले से रन नहीं निकले। तीसरे और चौथे मैच के लिए टीम से बाहर कर दिया गया। जब पांचवें एकदिवसीय में उन्हें फिर से जगह मिली तो यह उनके लिए करो या मरो जैसे हालात वाला मैच था। उन्होंने न केवल मैच जिताऊ सैकड़ा मारा, बल्कि टीम को सीरीज भी जिता दी।

इसके बाद 2018 में ही हुए अंडर 19 एशिया कप में यशस्वी प्लेयर ऑफ द टूर्नामेंट रहे। इंग्लैंड में हुई ट्राई सीरीज में भी उनका प्रदर्शन शानदार रहा। यहां सात मैचों में उन्होंने चार अर्धशतक लगाए। विजय हजारे ट्रॉफी के इस सीजन में भी उनका बल्ला जमकर दहाड़ रहा है। इस दोहरे शतक से पहले इसी सीजन में वह तीन शतक जमा चुके हैं। अब यशस्वी का एक ही सपना है। भारतीय टीम में जगह बनाना।