मोदीजी पहले मन साफ कीजिए, फिर सड़क

इन दिनों देश में साफ-सफाई को लेकर एक बड़े सामाजिक आंदोलन की गहरी कसक दिखाई पड़ रही है। गांधी के नाम को याद किया जाने लगा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आगे बढ़कर स्वच्छता अभियान की अगुवाई की। उनके मंत्रियों और अधिकारियों ने कैमरों के आगे झाड़ू पकड़े। कॉलेज और स्कूलों के बच्चों ने गंदगी के खिलाफ और अपने आस-पड़ोस को साफ-सुथरा रखने की शपथ ली। इसके पहले प्रधानमंत्री ने स्वतंत्रता दिवस के दिन लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए देश के सभी स्कूलों में लड़कियों और लड़कों के लिए शौचालय बनाने की बात कही थी।

इससे ऐसा लगता है कि ग्रामीण भारत, स्लमों और शहरी सार्वजनिक स्थलों की गंदगी अंतत: खत्म हो जाएगी। और इसके साथ खुले में शौच करने और गंदा पानी पीने के कारण करोड़ों बच्चों की सेहत को जो नुकसान पहुंचता है, उससे उन्हें बचाया जा सकेगा। हर साल डायरिया से होने वाली मौतें भी रोकी जा सकेंगी। किशोरियों को स्कूल न छोड़ने के लिए प्रेरित किया जा सकेगा और वे युवतियां भी यौन-प्रताड़ना से बच जाएंगी, जो अंधेरे में अकेले शौच के लिए निकलने को विवश हैं।

आम जनता से जुड़ी तमाम नीतिगत प्राथमिकताओं में साफ-सफाई के मुद्दे का चयन वाकई एक शानदार चुनाव है। फिर भी मैं स्वच्छ भारत की संभावनाओं को लेकर इतना सशंकित क्यों हूं? इसलिए कि स्वच्छता के मामले में भारत का शर्मनाक प्रदर्शन दरअसल इसकी जाति, लिंग, धर्म और वर्ग संबंधी सामाजिक-आर्थिक असमानताओं से काफी गहरे तक जुड़ा हुआ है। यही नहीं, देश के करोड़ों गरीबों के जीवन-स्तर को ऊपर उठाने में लगातार कम निवेश का भी इससे गहरा नाता है। लेकिन साफ-सफाई को लेकर देश में इस समय तो बहस छिड़ी हुई है, वह उस ऐतिहासिक विषमता की तरफ नजर भी नहीं डाल रही, जो भारत में गंदगी पैदा करने के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है। इसकी बजाय मुझे लगता है कि मौजूदा विमर्श अजीब तरीके से अप्रिय चीजों को छांटकर अलग कर रहा है। भारत की हजारों साल पुरानी जाति-व्यवस्था मलिनता के संदर्भ में गंभीर सामाजिक सोच पर ही आधारित है। पारंपरिक तौर पर मानव मल-मूत्र से अधिक गंदा किसी अन्य चीज को नहीं माना गया है। और जाति-व्यवस्था के सबसे निचले क्रम में जो लोग आते हैं, और उनमें भी ज्यादातर महिलाओं व लड़कियों को इस गंदगी की सफाई का अपमानजनक जिम्मा सौंपा गया है। यानी मानव मल-मूत्र को साफ करने का यह गर्हित कर्म उनके हिस्से है। सिर पर मैला ढोने को देश के दो-दो कानून गैर-कानूनी घोषित करते हैं, लेकिन अब तक यह कुप्रथा पूरी तरह से खत्म नहीं हो सकी है। देश की तमाम नगरपालिकाओं, सरकारी दफ्तरों और रेलवे में साफ-सफाई का काम उन लोगों को सौंपा गया है, जो हमारे समाज की वंचित जातियों से आते हैं।

इस जातिवादी मलिन सोच का नतीजा यह है कि यदि स्कूलों में शौचालय बन भी जाएं, तो उनकी साफ-सफाई निम्न जातियों के बच्चे, खासकर लड़कियां ही करेंगी। अनेक शहरों में इन समुदायों के बच्चों ने मुझे अकेले में यह बताया है कि उनके स्कूल वापस न जाने के पीछे की एक बड़ी वजह यह है कि उनके सहपाठियों ने उन्हें शौचालयों की सफाई के लिए उन्हें मजबूर किया था। उसके बाद वे शौचालय कभी साफ नहीं हुए और फिर कुछ दिनों के बाद बदबू और बजबजाती गंदगी के कारण वे इस्तेमाल के लायक नहीं रहे। लेकिन मुझे कहीं से भी यह सुनने को नहीं मिला कि स्कूलों में शौचालय बनाने की योजना इस सामाजिक हकीकत से भी टकराने का काम करेगी।

एक बार फिर मैं आप सबके सामने रेलवे का उदाहरण रखता हूं। सभी ट्रेनों में शौचालय हैं, जिनका मल-मूत्र पटरियों पर गिरता है। और इनकी सफाई भी उन्हीं वंचित जातियों के कर्मचारी करते हैं, जिन्हें रेलवे ने इस काम के लिए नियुक्त कर रखा है। अमूमन ये न्यूनतम वेतन वाले ठेके के कर्मचारी होते हैं। हालांकि, आज ऐसी तकनीक उपलब्ध है, जो रेल पटरियों से न सिर्फ इस गंदगी की सफाई कर सके, बल्कि वह मानव-स्पर्श के बिना उनका निष्पादन भी कर सकती है। कानूनी आदेशों और अदालती दिशा-निर्देशों के बावजूद रेल महकमे ने इस तकनीक के इस्तेमाल के लिए कोई निवेश नहीं किया है। यदि वह ऐसा करता, तो उससे न सिर्फ उसकी पटरियां साफ-सुथरी रह पातीं, बल्कि इस गंदगी की सफाई में जुटे लोगों को सामाजिक रूप से शर्मसार होने से और स्वास्थ्य संबंधी जोखिमों से भी वह बचा सकता था। यही बात सीवरों की सफाई के मामले में भी लागू होती है, जिनकी सफाई करने वाले अपनी जान खतरे में डालकर गंदगी में उतरते हैं। रेलवे और नगरपालिकाओं द्वारा साफ-सफाई की आधुनिक तकनीक में इसलिए निवेश नहीं किया जाता, क्योंकि निचली जातियों के गरीब लोग यह काम करने के लिए उपलब्ध हैं।

कई सारे लोग स्लम में रहने वालों पर ही आरोप लगाते हैं, मानो वे उसी तरह रहना चाहते हैं, जैसा वे काम करते हैं। चूंकि सरकारें असंगठित मजदूरों-कामगारों को उनकी खरीद-क्षमता के अनुरूप मकान उपलब्ध कराने में नाकाम रही हैं, इसलिए ये लोग खुले सार्वजनिक स्थलों पर जमने को विवश हैं। कई स्लम बस्तियां तो सूखी नालियों या कचरा-भराव वाले क्षेत्रों में बसी हुई हैं। मानसून में इनकी जिंदगी नरक बन जाती है। द इंडिया एक्सक्लूजन रिपोर्ट-2013 साल 2011 की जनगणना के आधार पर यह बताती है कि देश की स्वीकृत झुग्गी बस्तियों के 63 फीसदी घरों में गंदे पानी के निकास की मुकम्मल व्यवस्था नहीं है, 34 प्रतिशत मकानों में कोई शौचालय नहीं है और इन बस्तियों के आधे से अधिक लोग खुले में शौच करते हैं। अस्वीकृत स्लमों में ये आंकड़े अधिक दुखद तस्वीर पेश करते हैं।

अगर हमें अपने नौनिहालों का बेहतर पालन-पोषण करना है और अपने नागरिकों को गरिमामय, स्वस्थ और सुरक्षित जिंदगी मुहैया कराना है, तो हमें देश में पसरी गंदगी से बड़ी जंग लड़नी होगी। लेकिन इनमें से कोई समस्या मध्यवर्गीय लोगों द्वारा अपने आस-पड़ोस को साफ रखने के पवित्र संकल्प भर से हल नहीं की जा सकती। भारत को स्वच्छ बनाने के लिए आवश्यक है कि देश के भीतर की असमानता खत्म की जाए, सामाजिक तिरस्कार सहने के अपने धैर्य को हम छोड़ें, सरकारें महिलाओं और वंचित तबकों के लोगों, स्लम में रहने वालों की उपेक्षा करना बंद करें। जब तक यह नहीं होगा, हम एक बेहद गहरी राजनीतिक समस्या को गैर-राजनीतिक बनाने तथा करोड़ों हिन्दुस्तानियों को हाशिये पर बनाए रखने के लिए गांधी के नाम का इस्तेमाल करते रहेंगे।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)
हर्ष मंदर, निदेशक, सेंटर फॉर इक्विटी स्टडीज

(साभार- हिन्दुस्तान)

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