Breaking News

वोटिंग से पहले डायवर्सिटी मैन ऑफ इंडिया ने की मतदाताओं से अपील

वाराणसी के बहुजन मतदाताओं के समक्ष एक अपील!
-एच.एल. दुसाध

वाराणसी के प्रबुद्ध बहुजन मतदातागण,
आज सत्रहवीं लोकसभा चुनाव के शेष चरण का मतदान है और देश ही नहीं,दुनिया की निगाहें आप पर हैं. कारण आपने 2014 में जिस व्यक्ति को चुना, वह व्यक्ति ही देश का प्रधानमंत्री बना और आज वह आपका वोट पाने के लिए पाने के लिए आपके बीच फिर आये है.आपके वोट से नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने से निश्चय ही आपके संसदीय क्षेत्र का मान पूरे विश्व में बढ़ा है. किन्तु जिस व्यक्ति को आपने प्रधानमंत्री बनाया उनके कामों से क्या देश का भला हुआ? ऐसे में आज अपना लोकतांत्रिक अधिकार का इस्तेमाल करने के पहले मोदी के कार्यकाल का गंभीरता से सिंहावलोकन की अपील यह लेखक कर रहा है.

आपको याद होगा 2014 में नरेंद्र मोदी सौ दिनों के अन्दर विदेशों से काला धन लाकर प्रत्येक परिवार के खाते में 15 लाख रूपये जमा कराने, किसानों की आय दो गुनी करने, हर साल युवाओं को दो करोड़ नौकरिया सुलभ कराने इत्यादि अन्य कई अभूतपूर्वलोक लुभावन नारों के साथ ही आपके शहर को क्येटो बनाने के वादे के साथ आपसे वोट की याचना किये थे,किन्तु हुआ क्या! जिस तरह आपका शहर क्वेटो बनने से मीलो दूर रह गया उसी तरह उनके बाकी वादे भी हवा-हवाई साबित हुए.इसलिए आज जब वह दुबारा आपका वोट मांगने उतरे हैं, अपनी उपलब्धियों का कोई जिक्र नहीं करते. उनकी सारी कवायद यह रही है है कि आप पिछले चुनाव को लेकर सवाल न करें.बहरहाल मोदी के पांच साल का सही अक्श मई 2019 के अमेरिका के टाइम मैगज़ीन में उभरकर आया है,जिसमें उन्हें भारत का सबसे बड़ा विभाजकारी नेता साबित किया गया है . स्मरण रहे यही वह टाइम मैगजीन है जिसने उन्हें कभी ‘पर्सन ऑफ़ द इयर’ से नवाज कर उन्हें अंतर्राष्ट्रीय जगत में ऊँचा मक़ाम दिलवाया था.किन्तु मोदी उस सम्मान के साथ न्याय न कर सके और सबसे बड़े विभाजनकारी नेता का कलंक वरण करने के लिए अभिशप्त हुए. यही नहीं हांल ही में उन्होंने बालाकोट एयर स्ट्राइक के पीछे ‘ बादलों’ का जो सिद्धांत पेश करने के जिस तरह डिजिटल कैमरे पर अपनी राय जाहिर की, उससे भारत के साथ आपके शहर का भी भारी अपमान हुआ है. क्योंकि आपने ही उन्हें चुनकर प्रधानमंत्री का पद सुशोभित करने का अवसर दिया था . बहरहाल आज जबकि मोदी आपके वोट की याचना करने के लिए वाराणसी में डेरा जमाये हुए, अपना कीमती वोट इस्तेमाल करने के पूर्व भले ही उपरोक्त बातों को भूल जाएँ किन्तु इस बात पर जरुर गंभीरता से गौर फरमा लें कि जो व्यक्ति आपके वोट से भारत का प्रधानमन्त्री बना उसने आपको शत्रु समझकर अपनी सारी क्षमता आपके विनाश लगायी. सरल शब्दों में मोदी ने आपके साथ वर्ग शत्रु का व्यवहार किया. इसे समझने के लिए आपको कार्ल मार्क्स के नजरिये से भारत के इतिहास का सिंहावलोकन कर लेना होगा.

वर्ग संघर्ष के सूत्रकार मार्क्स ने कहा है ‘अब तक का विद्यमान समाजों का लिखित इतिहास वर्ग-संघर्ष का इतिहास है. एक वर्ग वह है जिसके पास उत्पादन के साधनों पर स्वामित्व है और दूसरा वह है, जो शारीरिक श्रम पर निर्भर है. पहला वर्ग सदैव ही दूसरे का शोषण करता रहा है. मार्क्स के अनुसार समाज के शोषक और शोषित : ये दो वर्ग सदा ही आपस में संघर्षरत रहे और इनमें कभी भी समझौता नहीं हो सकता.नागर समाज में विभिन्न व्यक्तियों और वगों के बीच होने वाली होड़ का विस्तार राज्य तक होता है. प्रभुत्वशाली वर्ग अपने हितों को पूरा करने के लिए राज्य का उपयोग करता है.’ जहां तक भारत में वर्ग संघर्ष का प्रश्न है, यह वर्ण-व्यवस्था रूपी आरक्षण –व्यवस्था में क्रियाशील रहा, जिसमें 7 अगस्त,1990 को मंडल की रिपर्ट प्रकाशित होते ही एक नया मोड़ आ गया. क्योंकि इससे सदियों से शक्ति के स्रोतों पर एकाधिकार जमाये विशेषाधिकारयुक्त तबकों का वर्चस्व टूटने की स्थिति पैदा हो गयी. मंडल ने जहां सुविधाभोगी सवर्णों को सरकारी नौकरियों में 27 प्रतिशत अवसरों से वंचित कर दिया, वहीँ इससे दलित,आदिवासी. पिछड़ों की जाति चेतना का ऐसा लम्बवत विकास हुआ कि सवर्ण राजनीतिक रूप से लाचार समूह में तब्दील हो गए. कुल मिला कर मंडल से एक ऐसी स्थिति का उद्भव हुआ जिससे वंचित वर्गों की स्थिति अभूतपूर्व रूप से बेहतर होने की सम्भावना उजागर हो गयी और ऐसा होते ही सुविधाभोगी सवर्ण वर्ग के बुद्धिजीवी, मीडिया, साधु -संत, छात्र और उनके अभिभावक तथा राजनीतिक दल अपना कर्तव्य स्थिर कर लिए.

मंडल से त्रस्त सवर्ण समाज भाग्यवान था जो उसे जल्द ही ‘नवउदारीकरण’ का हथियार मिल गया, जिसे 24 जुलाई,1991 को नरसिंह राव ने सोत्साह वरण कर लिया. इसी नवउदारवादी अर्थिनीति को हथियार बनाकर नरसिंह राव ने मंडल उत्तरकाल में हजारों साल के सुविधाभोगी वर्ग के वर्चस्व को नए सिरे से स्थापित करने की बुनियाद रखी, जिस पर महल खड़ा करने की जिम्मेवारी परवर्तीकाल में अटल बिहारी वाजपेयी, डॉ.मनमोहन सिंह और नरेंद्र मोदी पर आई. नरसिंह राव के बाद सुविधाभोगी वर्ग को बेहतर हालात में ले जाने की जिम्मेवारी जिनपर आई, उनमे डॉ. मनमोहन सिंह अ-हिन्दू होने के कारण बहुजन वर्ग के प्रति कुछ सदय रहे, इसलिए उनके राज में उच्च शिक्षा में ओबीसी को आरक्षण मिलने के साथ बहुजनों को उद्यमिता के क्षेत्र में भी कुछ बढ़ावा मिला. किन्तु अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी हिन्दू होने के साथ उस संघ से प्रशिक्षित पीएम रहे, जिस संघ का एकमेव लक्ष्य ब्राह्मणों के नेतृत्व में सिर्फ सवर्णों का हित-पोषण रहा है.अतः संघ प्रशिक्षित इन दोनों प्रधानमंत्रियों ने सवर्ण वर्चस्व को स्थापित करने में देश-हित तक की बलि चढ़ा दी, बहरहाल मंडलोत्तर भारत में सवर्णों का वर्चस्व स्थापित करने की दिशा में कांग्रेसी नरसिंह राव और डॉ. मनमोहन सिंह तथा सघी वाजपेयी ने जितना काम बीस सालों में किया, उतना मोदी ने विगत साढ़े चार सालों में कर दिखाया है.
विगत साढ़े चार वर्षों में आरक्षण के खात्मे तथा बहुसंख्य लोगों की खुशिया छीनने की रणनीति के तहत ही मोदी राज में श्रम कानूनों को निरंतर कमजोर करने के साथ ही नियमित मजदूरों की जगह ठेकेदारी प्रथा को बढ़ावा देकर, शक्तिहीन बहुजनों को शोषण-वंचना के दलदल में फंसानें का काम जोर-शोर से हुआ.बहुसंख्य वंचित वर्ग को आरक्षण से महरूम करने के लिए ही एयर इंडिया, रेलवे स्टेशनों और हास्पिटलों इत्यादि को निजीक्षेत्र में देने की शुरुआत हुई. आरक्षण के खात्मे के योजना के तहत ही सुरक्षा तक से जुड़े उपक्रमों में 100 प्रतिशत एफडीआई की मजूरी दी गयी. आरक्षित वर्ग के लोगों को बदहाल बनाने के लिए ही 62 यूनिवर्सिटियों को स्वायतता प्रदान करने के साथ –साथ ऐसी व्यवस्था कर दी गयी जिससे कि आरक्षित वर्ग,खासकर एससी/एसटी के लोगों का विश्वविद्यालयों में शिक्षक के रूप में नियुक्ति पाना एक सपना बन गया. कुल मिलाकर जो सरकारी नौकरियां वंचित वर्गों के धनार्जन का प्रधान आधार थीं, मोदीराज में उसके स्रोत आरक्षण को कागजों की शोभा बनाने का काम लगभग पूरा कर लिया गया.

अब जहां तक विशेषाधिकारयुक्त तबकों को और शक्तिशाली बनाने का सवाल, मोदी इस मामले में जो कामयाबी हासिल किये, उसकी सही तस्वीर 22 जनवरी, 2018 को प्रकाशित ऑक्सफाम की रिपोर्ट में सामने आई .उस रिपोर्ट से पता चलता है कि टॉप की 1% आबादी अर्थात 1 करोड़ 3o लाख लोगों की धन-दौलत पर 73 प्रतिशत कब्ज़ा हो गया है. इसमें मोदी सरकार के विशेष योगदान का पता इसी बात से चलता है कि सन 2000 में 1% वालों की दौलत 37 प्रतिशत थी ,जो बढ़कर 2016 में 58.5 प्रतिशत तक पहुच गयी. अर्थात 16 सालों में इनकी दौलत में 21 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई. किन्तु उनकी 2016 की 58.5 प्रतिशत दौलत सिर्फ एक साल के अन्तराल में 73% हो गयी अर्थात सिर्फ एक साल में 15% का इजाफा हो गया. शायद ही दुनिया में किसी परम्परागत सुविधाभोगी तबके की दौलत में एक साल में इतना इजाफा हुआ हो.किन्तु मोदी की सवर्णपरस्त नीतियों से भारत में ऐसा चमत्कार हो गया. 1% टॉप वालों से आगे बढ़कर यदि टॉप की 10% आबादी की दौलत का आंकलन किया जाय तो नजर आएगा की देश की टॉप 10% आबादी, जिसमें 99.9% सवर्ण होंगे, का देश की धन-दौलत पर 90% से ज्यादा कब्ज़ा हो गया है. दुनिया के किसी भी देश में परपरागत सुविधाभोगी वर्ग का देश की राज-सत्ता, धर्म और ज्ञान-सत्ता के साथ अर्थ-सत्ता पर इतना ज्यादा कब्ज़ा नहीं है.इस क्रम में जिस पैमाने पर आर्थिक और सामाजिक विषमता की खाई भीषणतम रूप अख्तियार की है, उससे डॉ. आंबेडकर के शब्दों में लोकतंत्र के ढाँचे के विस्फोटित होने की स्थित पैदा हो गयी है. ऐसी स्थिति में कोई और शासक होता तो लोकतंत्र पर मडराते खतरे को देखते हुए अपने कार्यकाल के शेष दिनों में विषमता की खाई को पाटने लायक कुछ ठोस योजनायें पेश करता. किन्तु सवर्ण वर्चस्व स्थापित करने की जूनून में उन्होंने जनवरी 2019 में अपनी पारी के स्लॉग ओवर में दो ऐसे कार्य कर डाले, जिससे उनकी छवि नयी सदी के सबसे बड़े सवर्णपरस्त शासक के रूप में स्थापित हो गयी. इससे विषमता का नयी ऊंचाई छूना तय है.

बहरहाल जिस तरह मोदी के स्लॉग ओवर में सवर्ण आरक्षण और 13 प्वाइंट रोस्टर के साथ दस लाख आदिवासी परिवारों को जंगल से खदेड़ने का दु:साहसिक फैसला लिया गया है, उससे तय है कि यदि सत्ता में उनकी दुबारा वापसी होती है, तो वे सवर्णपरस्ती के हाथों मजबूर होकर इस देश के जन्मजात सुविधाभोगी वर्ग के हित में ऐसे-ऐसे फैसले लेना शुरू करेंगे, जिसके फलस्वरूप आर्थिक और सामाजिक विषमता उस बिंदु पर पंहुच जाएगी, जहां से लोकतंत्र के ढांचे का विस्फोटित तथा बहुजनों का विशुद्ध गुलाम में तब्दील होना महज कुछ अन्तराल का विषय रह जायेगा.ऐसे में 23 तारीख को यह देखना काफी दिलचस्प होगा कि वाराणसी के बहुजन मतदाता मोदी को पुरस्कृत करते हैं या दण्डित? अगर विश्वप्रसिद्ध वाराणसी के मतदाता अपने विवेक का इस्तेमाल करेंगे तो मोदी का दण्डित होना अवधारित है अगर नहीं करते हैं तो निश्चित रूप से वह विजेता के रूप में रिकॉर्ड बनायेगे.

लेखक बहुजन डाइवर्सिटी मिशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं.संपर्क:9654816191

loading...