जानिए क्यों, झाड़ू लगा रहा है पीएचडी छात्र, डीन मांग रहा कमीशन

anandयह हाल लखनऊ यूनिवर्सिटी (एलयू) का है। यहां अनुसूचित जाति के शोध छात्र की फेलोशिप की रकम रोक ली गई है। उससे झाड़ू लगवाया जा रहा है। वह दाने-दाने को मोहताज है, उसे नीचा दिखाने के लिए डीन उसे पागल कहकर बुलाते है।

मुलायम सिंह यादव

लखनऊ ।। बाबा साहेब भीमराव अंबेडकर यूनिवर्सिटी में आठ छात्रों की बर्खास्तगी को लेकर धरना हो ही रहा है, वहीं पर लखनऊ यूनिवर्सिटी में भी अनुसूचित जाति के एक छात्र के साथ अमावीय व्यवहार किए जाने की घटना सामने आ गई। छात्र शोध कर रहा है, लेकिन कमीशन न देने की वजह से दो साल से उसकी फेलोशिप की रकम नहीं दी जा रही है। छात्र ने वीसी से लेकर राज्यपाल तक का दरवाजा खटखटाया, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। अब छात्र ने हार मानकर अपने गाइड के खिलाफ एफआईआर दर्ज करवाने के लिए गुहार लगाया है।

तमाम नियम कायदा-कानून होने के बावजूद भी अनुसूचित जाति के छात्रों के साथ अमानवीय व्यवहार बंद नहीं हो रहा है। कमीशनखोरी की मार भी अनुसूचित जाति के छात्रों पर अधिक पड़ रही हैं। यही वजह है कि आज छात्र बिना कमीशन दिए अपनी फेलोशिप भी नहीं ले पा रहे हैं। इसको लेकर वीसी और राज्यपाल भी अपनी आंखें बंद कर लिए हैं।

सूत्रों का कहना है कि चूंकि यह रकम कई लोगों के बीच बंटती है, ऐसे में सभी एक-दूसरे का साथ देते हैं। पीड़ित छात्र संघरत्ना आनन्द को प्रतिमाह करीब 25 हजार रुपया दिया जाना चाहिए, जिसमें एचआरए व फेलोशिप की एकमुश्त रकम है, जिसे रोकने का अधिकार किसी को भी नहीं है। प्रतिवर्ष मिलने वाले कंटीजेंसी फंड को भी बिना कारण बताए रोका नहीं जा सकता है, लेकिन चूंकि संघरत्ना ने भाजपा नेता व सांसद डा. उदितराज के संघठन का होने की बात कहकर कमीशन देने से मना कर दिया था, इसकी वजह से उसे अब परेशान किया जा रहा है। जब उसने अपने डीन प्रो. पद्मकांत व गाइड की शिकायत प्राक्टर निशी पांडेय से की तो उन्होंने भी कोई कार्रवाई ही नहीं की।

आरोप है कि मिलीभगत के चलते प्रो. पद्मकान्त ने उक्त छात्र के अनुशासन में न होने की बात बताकर प्रयोगशाला की चाबी न देने का निर्देश देकर मामले को दबा दिया। शोध करने वाले छात्रों का शोषण किस तरह से डीन व गाइड करते हैं, आनंद इसका नजीर बनता जा रहा है।

आरोप है कि विभाग के डीन प्रो. पद्मकान्त शोध कर रहे संघरत्ना आनंद से न केवल झाड़ू लगवा रहे हैं, बल्कि उसके साथ गुलामों जैसा व्यवहार करते हैं। कागज चोरी जैसा घटिया आरोप लगाकर उसे पागल करार दिया जा रहा है। राजभवन में राज्यपाल से शिकायत करने के बाद भी उसके दो वर्ष की फेलोशिप नहीं दी जा रही है, जिसकी वजह से संघरत्ना भूखों मर रहा है। सुभाष हास्टल के मेस में पैसे के अभाव में जहां उसे खाना नहीं मिल रहा है, वहीं उसका लाखों रुपया लविवि दबाये बैठा है।

कुलपति प्रो. एसबी निमसे ने हाल ही में फरियाद लेकर पहुंचे शोध छात्र को सुरक्षा गार्ड से पीटने का निर्देश दे दिया था। छात्र रसायन शास्त्र विभाग का है। संघरत्ना आनंद को रसायन शास्त्र विभाग के लैब में ही जाने नहीं दिया जाता, उसे मजाक का पात्र बनाकर विभाग के डीन प्रो. पद्मकान्त मजा लेते हैं। जबकि गाइड डा. एनके सिंह पूरी तरह से डीन के दबाव में हैं और वे शोध छात्र से ही कन्नी काटे हुए हैं। आनंद ने वर्ष 2014 में यहां एडमिशन लिया था। kkkk

संघरत्ना आनंद ने लविवि से 2008 में बीएससी व 2010 में एमएससी पास किया है। इसके बाद वे बाराबंकी स्थित ग्राम्यांचल पीजी कॉलेज में प्रवक्ता के पद पर काम करने लगे। इस बीच 2014 में जब लविवि में पीएचडी में एडमिशन मिला, तो उसने कॉलेज से छुट्टी लेकर 2014 से लविवि ज्वाइन कर लिया। बस यहीं से उक्त छात्र का दुर्भाग्य शुरू हो गया।

शोध छात्र संघरत्ना ने लविवि चौकी इंचार्ज को दिये प्रार्थना पत्र में आरोप लगाया है कि उसके साथ लविवि में दास जैसा व्यवहार होता है, डीन व गाइड उससे विभाग में झाड़ू लगवाते हैं तथा कागज चोरी का आरोप लगाते हैं। पूरी तरह से स्वस्थ संघरत्ना ने कहा कि डीन प्रो. पद्मकान्त उसे पागल करार देने में लगे हुए हैं।

संघरत्ना आनन्द को पीटने की बात कहने वाले कुलपति प्रो. निमसे से जब पूछा गया तो उन्होंने फोन ही काट दिया। यही नहीं इस पूरी घटना के समय कई शिक्षक चश्मदीद थे, लेकिन वे सभी कन्नी काटने लगे। प्रो. पद्मकान्त के मोबाइल संख्या 9450362878 पर कई बार फोन किया गया, लेकिन उन्होंने फोन ही नहीं उठाया। इस प्रकरण पर जब लविवि प्रवक्ता प्रो. एनके पांडेय से पूछा गया तो उन्होंने कहा कि फेलोशिप रोकने की कोई शिकायत उनके संज्ञान में ही नहीं है। यह जरूरी नहीं है कि कुलपति से जितने भी लोग मिलने आएं, उन सबकी जानकारी प्रवक्ता को भी हो।

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