नालायक निकल गईं कांशीराम की औलादेंः दद्दू प्रसाद

DADDU-PRASADयूपी सरकार के पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद कांशीराम के बहुजन मिशन में साथ रहे। वह बहुजन समाज पार्टी के संस्थापक सदस्यों में से एक हैं, लेकिन आज बसपा में उनके लिए जगह नहीं है। उन्होंने फर्क इंडिया पत्रिका के कार्यकारी संपादक अखिलेश कृष्ण मोहन से कई मुद्दों पर विस्तार से बात की है। पेश हैं संक्षिप्त अंश…

फर्क इंडियाः बहुजन समाज पार्टी को कौन चला रहा है?

दद्दू प्रसादः देश की न्याय पालिका चला रही है। सतीश चंद्र मिश्रा चला रहे हैं। शोषित वर्ग चला रहा है। यही वजह है कि एक एक कर दलित और पिछड़े पार्टी से बाहर या तो किए जा रहे हैं या खुद पार्टी को छोड़ने पर मजबूर हो रहे हैं। हद तो यह है कि पार्टी की इस स्थिति पर मायावती कहती हैं कि उन्होंने पार्टी छोड़कर उपकार किया है।

फर्क इंडियाः मायावती की चार बार सरकार बनी। सबसे बेहतर सरकार कौन थी?

दद्दू प्रसादः वर्ष-1995, 1997, 2003 और 2007 में चार सरकारें मयावाती की बनीं। बहुजन आंदोलन को लेकर सबसे बेहतर सरकर वर्ष 1995 वाली थी, वर्ष-1995 वाली सरकार एक्सीलेंट सरकार थी। क्योंकि इस सरकार को सामंतवादियों का आउटसाइडर सपोर्ट था। इनर सपोर्ट नहीं था। सामंतवादी अंदर नहीं घुसपाए थे। कांशीराम ने अपनी शर्तों पर सरकार चलाई थी। जब सरकार गिरी इसके पहले का वाक्या है। कांशीराम से मुरली मनोहर जोशी ने कहा कि यूपी में लोकल बॉड़ीज के चुनाव हो रहे हैं। जब यूपी में हमारे सपोर्ट से आपकी सरकार चल रही है, तो यूपी में मिलकर बसपा और भाजपा को मिलकर चुनाव लड़ना चाहिए। इस दौरान वहां पर आडवाणी भी थे, तो कांशीराम ने जोशी और आडवाणी दोनों से कहा कि इस देश में दो ही पार्टियां हैं, जिनका आब्जेक्टिव क्लीयर है। एक आरएसएस है, जो इस देश के सोशल सिस्टम को इक्जिस्टिंग वर्टिकल रखना चाहता है और दूसरी बसपा है, जो इस सोशल सिस्टिम को हॉरीजेंटल करना चाहती है। तो जिन लोगों को मैंने इस बड़े आंदोलन के लिए तैयार किया है। उन्हें मैं वर्टिकल सिस्टम को मजबूत करने के लिए कैसे कहूंगा। मैं नहीं कह सकता कि वह भाजपा को वोट करें। तो जोशी ने कहा कि यूपी में हमारे समर्थन से सरकार चल रही है और आप इस तरह की दलील दे रहे हैं। तो कांशीराम ने कहा कि आपके समर्थन से ही नहीं कांग्रेस और जनता दल का भी समर्थन प्राप्त है बसपा सरकार को। तो आप अपना सपोर्ट हटा लीजिए। मेरा जो काम था वह पूरा हो गया। इसके बाद उन्होंने 17 अक्टूबर वर्ष 1995 को सपोर्ट हटा लिया। यह जो 3 जून 1995 से 17 अक्टूबर तक की यह जो साढ़े चार महीने की सरकार थी। वह एक्सीलेंट सरकार थी। बहुजन नजरिए के हिसाब से भी और सामाजिक आंदोलन को गतिमान बनाने के लिए भी। इसके बाद 2007 में सरकार बनी।

फर्क इंडियाः भाजपा से समर्थन को लेकर सरकार बनाने पर कांशीराम का क्या नजरिया था ?

कांशीराम ने बहुत कोशिश किया कि भाजपा का सपोर्ट न लेना पड़े, लेकिन मुलायम सिंह यादव की वजह से ऐसा हो नहीं सका। कांशीराम अपने इस विचार पर अडिग थे कि सहारे के साथ इशारा भी आ जाता है और इशारा न मानों तो जालिम शैतानी करने लगता है, भाजपा के सहयोग से छह छह महीने के मुख्यमंत्री बनने के समझौते पर सरकार बनी थी। यह भी ठीक सरकार थी, बहुत काम हुआ यूपी में आपको दिखता होगा, लेकिन जो जालिम इसके पहले वाली सरकार में बाहर था वह अब अंदर आ चुका था।

फर्क इंडियाः बसपा की सरकार की मॉनिटरिंग कौन करता था ?

दद्दू प्रसादः खुद कांशीराम करते थे। कांशीराम की मॉनिटरिंग, उनकी प्राथमिकता पर चल रही थी। 21 अक्टूबर 1997 को जब कल्याण सिंह ने एससी/एसटी एक्ट को डायलूट कर दिया और कहा कि जांच के बाद केस दर्ज किया जाए, तो चेन्नई से ही काशीराम ने कहा कि तुम जाओ और एमएलए की मीटिंग करो और वर्कर के बीच मीटिंग करो। मायावती ने ऐसा ही किया। 22 अक्टूबर 1997 को सरकार गिर गई।

फर्क इंडियाः मायावती आजकल गद्दार शब्द का प्रयोग कर रही हैं, ऐसा क्यों है ?

मायावती जिन लोगों को आज गद्दार कह रही हैं, वह लोग चट्टान की तरह से मायावती के साथ खड़े थे। वह कभी नहीं बिके। मायावती ने जब समाजवादी पार्टी को विधायक बेचे तब भी दद्दू प्रसाद और स्वामी प्रसाद मौर्य नहीं डिगे। लाखों करोड़ों रुपए की पेटियां हमारे सामने से गईं। जो पार्टी के लिए वफादार थे वह आज गद्दार दिखने लगे, जिस नसीमुद्दीन सिद्दीकी को मायावती वफादार कह रही हैं। उनके कई साथी पार्टी छोड़कर सपा में चले गए थे।

फर्क इंडियाः क्या कभी कांशीराम ने कहा था कि मैं पीएम बनना चाहता हूं ?

25 अगस्त 2003 को पहली बार बहुत ही मजबूती के साथ लाखों कार्यकर्ताओं के साथ उन्होंने ऐसा कहा था। उन्होंने कहा था कि परिवर्तन के लिए मैं भारत का प्रधानमंत्री बनना चाहता है, लेकिन मुझे लगता है कि कांशीराम का पीएम बनने का एलान करना मायावती को पसंद नहीं आया। वह दो सप्ताह बाद ही बीमार पड़ गए और फिर कभी नहीं उठे। सवाल यह भी उठता है कि जब कांशीराम की मौत 8 अक्टूबर 2006 को सायं हो गई थी, तो मायावती ने एलान किया कि नौ तारीख को साढ़े 12 बजे क्यों किया। वह किससे डर रही थीं। क्या मायावती को डर था कि क्राउड न उमड़ परे। कांशीराम ने मां की ममता का परित्याग किया और आंदोलन पर कोई असर न पड़े इसके लिए मां को ठुकरा दिया। रजिस्ट्रार जनरल के सामने, उन्होंने मां के साथ जाने से मना कर दिया था। 2012 की मायावती की सरकार निकृष्टतम सरकार थी।

फर्क इंडियाः बहुजन आंदोलन में मायावती को आप अब कहां देख रहे हैं ?

दद्दू प्रसादः वर्ष 2012 की मायावती की जो सरकार बनी, वह सबसे बर्बाद सरकार थी। वह अब बहुजन आंदोलन को बर्बाद कर रही हैं। वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार ने एक पत्रिका में लिखा था कि बहुजन समाज की खलनायिका हैं मायावती। मुझे लगता है कि वह सच के बहुत करीब हैं।

फर्क इंडियाः कर्मचारियों के रिवर्ट किए जाने को लेकर क्या कहेंगे ?

दद्दू प्रसादः बहुत गलत हुआ, कर्मचारी वर्ग को बेज्जत किया गया। वह आशा संजोए हैं कि मायावती आएंगी और उनकों फिर से सम्मान मिल जाएगा। ऐसे इज्जत नहीं मिलती है। ऐसे अधिकार नहीं मिलते हैं। लड़कर के अधिकार मिलते हैं। कांशीराम ने लड़ना सिखाया। संघर्ष करके आदमी हमेशा उत्थान की ओर जाता है। सुविधा प्राप्त कर वह हमेशा पतन की ओर जाता है। जगजीवन राम ने सुविधा प्राप्त किया, उन्हें कोई नहीं जानता है। बाबा साहेब ने संघर्ष किया उन्हें दुनिया जानती है।

फर्क इंडियाः अंबेडकर को महापुरुषों में आप कहां पाते हैं ?

दद्दू प्रसादः कार्ल मार्क्स और मार्टिंग लूथर किंग से बड़े महापुरुष थे बाबा साहब अंबेडकर।

फर्क इंडियाः कहा जाता है कि मायावती ने कांशीराम का साहित्य जलवाया क्या यह सही है ?

दद्दू प्रसादः मायावती ने खड़ी होकर कांशीराम का साहित्य जलवाया। दिल्ली करोलबाग गाजियाबाद के प्यारेलाल जाटव को निर्देशित कर बहुजन साहिय को अहमदाबाद में जलवाया। नागपुर में रखे हुए बहुजन नायक, बहुजन संघटक की प्रतियों को जलवाया गया। इसमें कांशीराम के भाषणों का संकलन था। मायावती ने कहा जाओ जला दो।

साभारः फर्क इंडिया

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