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भारत की राजनीति में माता प्रसाद कभी मरते नहीं, हमेशा याद किए जाएंगे

लखनऊ. पांच बार विधायक, दो बार विधान परिषद सदस्य, उत्तर प्रदेश सरकार में राजस्व मंत्री रहे अरुणाचल प्रदेश के पूर्व राज्यपाल माता प्रसाद का निधन वैचारिक राजनीति के एक युग का अंत है। वह राजनीति में ही सक्रिय नहीं थे, बल्कि किताबों के लेखन और सामाजिक गतिविधियों में भी बराबर समय देते रहे। आंबेडकर महासभा ने भी उन्हें दलित रत्न से सम्मानित किया था।

गौरतलब है कि मूल रूप से जौनपुर के रहने वाले माता प्रसाद वर्ष 1957 से 1977 तक विधायक रहे। इसके बाद 1980 से 1992 तक वह विधान परिषद के सदस्य और 1988 से 1989 तक राजस्व मंत्री रहे। तत्पश्चात वर्ष वह 21 अक्टूबर 1993 से 13 मई 1999 तक अरुणाचल प्रदेश के राज्यपाल रहे। माता प्रसाद की गतिविधियां हमेशा सामाजिक रहीं।

माता प्रसाद जी हाशिए के समाज की बातों को हमेशा जोर देकर कहते थे। भारत सरकार में वह बाबा साहेब डा. आंबेडकर फिल्म निर्माण स्कृप्ट समिति के चेयरमैन रहे। इसके साथ ही उन्होंने खंडकाव्य और प्रबंधकाव्य की रचनाएं भी की। अछूत का बेटा समेत वीरांगना झलकारी बाई और अंतहीन बेड़ियां जैसे एकांकी नाटकों का लेखन भी उन्होंने किया।

भारत की राजनीति में माता प्रसाद को हमेशा याद किया जाएगा। उनकी छवि सामाजिक सरोकार और हाशिए के समाज के पैरोकार के रूप में रही। उन्होंने कभी वैचारिक समझौता नहीं किया। उनका जाना एक ऐसे साथी का खो जाना है जो हमेशा धर्म-जाति और मजहब को दरकिनार कर गरीब और आम आदमी की बात करता था।