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…तो क्या मायावती BJP के साथ मिलकर लड़ सकती है UP विधानसभा-22 का चुनाव !

फोटोः- फाइल

लखनऊ. पूरे देश में भले ही कोरोना का कहर है और लोग लॉक डाउन में हैं, लेकिन इस बीच यह चर्चा भी तेजी से फैल रही है कि विधानसभा चुनाव में 20 सीटें न जीत पाने वाली मायावती इस बार भाजपा से मिलकर चुनाव लड़ने की पटकथा तैयार कर रही हैं। यही वजह है कि वह प्रधानमंत्री और भाजपा को लेकर गंभीर मुद्दों पर कुछ भी बोलने से बच रही हैं। यह खुलासा मायावती के ही एक करीबी बसपा के ही एक पूर्व सांसद ने किया है। पूर्व सांसद का यह भी कहना है कि वह मोदी के लिए गुजरात चुनाव में प्रचार भी कर चुकी हैं। ऐसे में मायावती का भाजपा से मिलकर चुनाव लड़ना एक बार फिर से संभव है। पूर्व सांसद तो यहां तक कहते हैं कि इसकी रणनीति तैयार हो गई है।

बसपा के करीबी सूत्रों की माने तो मायावती ने अपने जन्मदिन पर पार्टी के पदाधिकारियों से फीडबैक लिया था कि अखिलेश यादव, समाजवादी पार्टी को लेकर वह क्या सोचते हैं। उत्तर प्रदेश में कैसा माहौल है। चुनाव को लेकर लोग क्या सोचते हैं। इस फीडबैक में यह भी सामने आया था कि बसपा के कई नेता सपा में चले गए हैं और बहुजन समाज पार्टी की तुलना में सपा काफी मजबूत है। हालांकि मायावती ने इस तथ्य को नकार दिया था।

बहुजन समाज पार्टी के पूर्व जोनल क्वार्डिनेटर (नाम न छापने की शर्त पर) कहते हैं कि बहन जी को पता है क्या करना है और क्या नहीं करना है। वह वह भाजपा के साथ सीटों का बंटवारा कर चुनाव लड़ सकती हैं। इसमें सीटों का बंटवारा होगा, यही वजह है कि किसी मुद्दे पर कुछ भी बोलने से बचा जा रहा है। चुनाव के बाद सीटों की संख्या के हिसाब से समीकरण बनने पर सरकार बनेगी। मायावती का पहला एजेंडा किसी भी पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाना है। क्योंकि बसपा का कार्यकर्ता पिछले 8 वर्ष से सत्ता से दूर है। यदि अधिक समय लगा तो वह किसी भी पार्टी की ओर रुख कर सकता है। दूसरी बात अखिलेश यादव और कांग्रेस को सत्ता में आने से रोकना है।

पूर्व जोनल क्वार्डिनेटर की माने तो मायावती वैसे सत्ता में आने के लिए कुछ भी कर सकती हैं। वह भाजपा के साथ मिलकर इसलिए चुनाव लड़ना चाहती हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि उनका संगठन धराशायी हो गया है। वह चुनाव में अकेले सरकार नहीं बना सकती हैं, बल्कि वह 50 सीट भी नहीं जीत पाएंगी। इस संगठन के पदाधिकारियों से मिली इस सूचना के बाद मायावती ने अब गठबंधन की एक नई कवायद शुरू कर दी है। भाजपा के रणनीतिकारों को भी इस समीकरण का ही अंदेशा है। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि यह वजह हो सकती है कि केंद्र और उत्तर प्रदेश की सरकार ने मायावती के खिलाफ सभी जांच को फिलहाल रोक दिया है। बहुजन समाज पार्टी के पूर्व मंत्री भी भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़े जाने की बात को नकारते नहीं हैं। वह कहते हैं कि यह बिलकुल संभव है और मौजूदा बसपा की हालात में तो इसकी संभावना प्रबल है। क्योंकि मायावती भी मानती हैं कि वर्ष 2022 का विधानसभा चुनाव शायद मुख्यमंत्री बनने की संभावनाओं को लेकर उनका आखिरी चुनाव होगा।

बहुजन राजनीति पर एक स्पष्ट राय रखने वाले पत्रकारों का भी मानना हैं कि मायावती की हाल के दिनों में भाजपा को लेकर और खासकर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और नरेंद्र मोदी की सरकार को लेकर जो नरमी दिखाई दी है वह भी इस दिशा की ओर ही संकेत करती है। कोरोना को लेकर जो इंतजाम किए जा रहे हैं उसको लेकर भी मायावती ने आर्थिक मदद किए जाने के बहाने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से बात की थी और राजस्थान के कोटा में जो छात्र फंसे हुए थे उनको लेकर लाए जाने के फैसले का भी मायावती ने समर्थन किया था।

यही नहीं, यह भी कहा जा रहा है कि मायावती ज्यादातर औपचारिकता पसंद नहीं करती हैं, लेकिन मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के पिता जी के निधन पर उन्होंने शोक संदेश जारी किया। जबकि हाल ही में उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता बेनी प्रसाद वर्मा का निधन हो गया था। इस दौरान उत्तर प्रदेश की पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने कोई शोक संदेश नहीं दिया था।

मायावती की राजनीति को बहुत ही बारीकी से देख रहे नेता यह भी मानते हैं कि मायावती ने लोकसभा चुनाव के बाद ही ये मान लिया था कि वह अब सपा के साथ नहीं, भाजपा के साथ मिलकर ही चुनाव लड़ेंगी। यही वजह रही कि गठबंधन में सबसे अधिक 10 सीट जीतने के बाद भी उन्होंने हार का ठीकरा समाजवादी पार्टी और खासकर यादव वोट बैंक न मिलने पर फोड़ दिया। क्योंकि मायावती जानती हैं कि वह यादवों पर हमला कर बाकी पिछड़ों की सहानुभूति बटोर लेती हैं।

उधर, पूर्वांचल के बसपा के कद्दावर नेता व पार्टी कैडर को देखते रहे पदाधिकारी भी नाराज हैं। पार्टी के लिए अधिकारियों एवं कर्मचारियों से आर्थिक संसाधन लाकर पार्टी को सींचते रहे एक पूर्व नेता तो कहते हैं कि पासी समाज का वोट बैंक जो उत्तर प्रदेश में 3.5 फीसदी, धोबी समाज लगभग 3 फीसदी एवं वाल्मीकि समाज का वोट फीसद लगभग 4.5 फीसद है का वोट बैंक भी अब मायावती के पास से खिसक गया है। पासी वोट बैंक भी अब मायावती के पास नहीं रहा। इसका कुछ हिस्सा सपा और कुछ हिस्सा भाजपा की ओर जा चुका है। इसे वापस लाना मायावती के लिए टेड़ी खीर है। ऐसे में मायावती को उत्तर प्रदेश की मुखिया बनने के लिए कोई मास्टर स्ट्रोक खेलना ही होगा। इसे वह खेल भी सकती हैं।

बहुजन समाज पार्टी के नेता आजाद समाज पार्टी के रावण को भी भाजपा के साथ मिलकर चुनाव लड़ने की एक बड़ी वजह मानते हैं। बसपा के कई नेता कहते हैं कि वह कैमरे के सामने तो नहीं बोल सकते, लेकिन सच है कि मायावती रावण से भी डरकर भी भाजपा की ओर बढ़ रहीं हैं। वह अब आगे क्या करेंगी इसे समझना काफी मुश्किल है।

हालांकि कुछ दलित नेता ये मानते हैं का बहुजन समाज पार्टी अब पार्टी में ठाकुर, ब्राह्मण और वैश्य को अधिक तवज्जों दें रही हैं। ओम प्रकाश राजभर को लेकर कहा जा रहा है कि मायावती पार्टी से निकाले गए बहुत ही कम नेताओं को वापस लेती हैं। वह दूसरी पार्टी से भले ही गठबंधन कर लेती हैं, लेकिन बसपा छोड़कर गए नेताओं को नहीं छोड़ती। समाजवादी पार्टी छोड़कर गए अंबिका चौधरी भले ही बड़े और बुद्धिमान नेता थे, लेकिन मायावती ने टिकट नहीं दिया और बसपा छोड़कर आए कई नेताओं को अखिलेश यादव के कोटे से भी लोकसभा चुनाव का टिकट नहीं देने दिया।

राजनीति के जानकार ये भी मानते हैं कि भाजपा की ये रणनीति बसपा के साथ मिलकर काफी पहले से चल रही है। भाजपा ने बसपा के एमएलसी, राज्यसभा सांसद या विधायक नहीं तोड़े, जबकि सपा के कई नेता भाजपा में गए हैं। ऐसे में इस खिचड़ी को लेकर जो चर्चा दिल्ली और लखनऊ में हो रही है, उसमें दम है। समाजवादी पार्टी को रोकने के लिए बसपा और भाजपा मिलकर रणनीति तैयार कर रहे हैं।

मायावती पहले सत्ता में रहने वाली पार्टी को लेकर बयान जारी करती थी कि ये सरकार गलत कर रही है, लेकिन अब उनका तरीका बिलकुल सामान्य जैसा है। हाल के दिनों में उनके ट्विटर अकाउंट को देखकर ये समझा जा सकता है।

मायावती सख्त तेवर की नेता मानी जाती रही हैं, लेकिन कन्नौज में जब एक दलित अधिकारी की पिटाई हुई तो वह मुख्यमंत्री से बात नहीं कीं, बल्कि उन्होंने जो ट्वीट किया उसमें भी सांसद को जेल भेजे जाने के लिए चिट्ठी लिखने जैसा कुछ भी नहीं था। सियासी जानकार इसे मायावती की भाजपा को लेकर या कहा जाए भाजपा हाईकमान को लेकर नरमी के तौर पर देखते हैं।

 

कांग्रेस की एक बैठक को लेकर मायावती ने ये ट्वीट करना जरूरी समझा कि वह क्यों इस बैठक में नहीं जा रही हैं। उन्होंने यहां तक बता दिया कि इससे पार्टी के नेताओं का मनोबल गिरेगा।

और आखिरी में आपको दिखाते हैं कोटा को लेकर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जो फैसला लिया उसका भी मायावती ने स्वागत किया, जबकि वह एक सफाई कर्मचारी की मौत पर ट्वीट करना भूल गईं, जो दलित था और दबंगों द्वारा सैनेटाइजर पिला दिए जाने से मर गया था। सियासी जानकारों की माने तो ये ट्वीट राजनीति समझने के लिए काफी हैं।