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विवेक कुमार और उर्मिलेश को लेकर सोशल मीडिया पर उठने लगी है ये मांग

रिपोर्ट- अखिलेश कृष्ण मोहन

लखनऊ. भारत की राजनीति में एक बड़ा तबका जिसे 85 फीसदी कहा जाता है वह हासिए पर जाने के बाद भी सुध लेने को तैयार नहीं है। इस तबके की राजनीति भी जातिपांत और परिवारवाद में उलझ कर रह गई है। यही नहीं इस जातिपांत और परिवारवाद की ठेकेदारी में बहुजन तबके के बुद्धिजीवियों का मर्डर हो रहा है। वह न तो अपनी बात कह पा रहे हैं और न ही दूसरों को इस दिशा में प्रेरित कर पा रहे हैं। आज बात देश के दो शख्सियत की होगी। 

1- प्रो. विवेक कुमार.

प्रोफेसर विवेक कुमार पूरे देश में परिचय के मोहताज नहीं हैं। हाशिए के समाज का प्रतिनिधित्व करने वाले विवेक जी लखनऊ के शायद पहले ऐसे प्रोफेसर हैं, जिन्होंने जिस संस्थान में शिक्षा ली, उसी संंस्थान में उसी विभाग के अध्यक्ष बने। प्रोफेसर विवेक जी जेएनयू के समाजशास्त्र विभाग के अध्यक्ष हैं। विवेक जी देश के लाखों बहुजन छात्रों के प्रेरणास्रोत व मार्गदर्शक माने जाते हैं। सोशल मीडिया पर बहुजन छात्र यह अभियान चला रहे हैं कि प्रोफेसर विवेक कुमार जैसे बुद्धिजीवियों को संसद भेजा जाना चाहिए। यह समय की मांग है।

लखनऊ बीबीएयू के छात्र बसंत कन्नौजिया लिखते हैं कि हम समस्त बहुजन समाज के लाखों छात्र बहन कुमारी मायावती जी से अनुरोध करते है कि प्रो. विवेक कुमार जी (अध्यक्ष, समाजशास्त्र विभाग, जेएनयू ) को उत्तर पश्चिमी दिल्ली सीट से बसपा पार्टी अपने फंड पर चुनाव लड़ाए। बहुजन पार्टीयों को संसद में इंटलेक्चुअल यानि शिक्षाविदों को भेजना चाहिए! तभी बाबासाहेब और मान्यवर कांशीराम का सपना पूरा होगा।

जब तक अंगूठा टेक, हत्यारे, बलात्कारी, गुंडे जैसे लोग संसद भवन में जाते रहेंगे, तब तक बाबा साहेब और मान्यवर का सपना कभी भी पूरा नहीं हो सकता और दलित समाज का उत्थान नहीं हो सकता है। हालांकि कुछ ऐसी ही आवाज देश के लगभग सभी विश्वविद्यालयों और उच्च शिक्षण संस्थानों से आ रही है। सवाल ये है कि आखिर बहुजन राजनीति करने वाली पार्टियों के मुखिया उच्च शिक्षा ले रहे छात्र छात्राओं और आम आदमी की इस आवाज को कब तक नजरअंदाज करेंगे। प्रोफेसर विवेक जी उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ से हैं।

2- उर्मिलेश.

उर्मिलेश जी पत्रकार ही नहीं हैं, वह पत्रकारिता के संस्थान हैं। देश की मुख्यधारा के ज्यादातर अखबारों में देश विदेश की रिपोर्टिंग करने वाले उर्मिलेश जी उत्तर प्रदेश के गाजीपुर जिले से आते हैं। राज्यसभा टीवी समेत कई अन्य टीवी चैनल में भी उर्मिलेश ने काम किया है। करीब 35 साल के पत्रकारिता के कैरियर में उर्मिलेश ने समाज को हमेशा दिशा देने वाली रिपोर्टिंग की है। उर्मिलेश जी ”यादव समाज” से आते हैं। आपका द वायर में मीडिया मंथन कार्यक्रम आजकल चर्चा में है। पूरे देश में आप देखे, सुने और पढ़े जाते हैं।

अखिलेश यादव ने उर्मिलेश जी को यशभारती के काबिल भी नहीं समझा। कई सवर्ण पत्रकारों को यशभारती दिए गए, लेकिन पिछड़ी जाति और दलित वर्ग के पत्रकार छूटते गए। उर्मिलेश जी किसी भी मीडिया संस्थान में स्थापित किए जा सकते है। उनका शिक्षण संस्थाओं से लेकर मीडिया संस्थानों में बेहतरीन उपयोग हो सकता है। आपने देखा होगा हाल ही में जनसत्ता के संपादक ओमथानवी जी को सरकार ने राजस्थान के एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय का कुलपति बनवा दिया। इस तरह बहुजन वोटबैंक को लेकर सत्ता में आने वाली सरकारें क्यों नहीं कर पाती हैं। हाल के दिनों में महागठबंधन को लेकर जो शोर है, यह धरातल पर नहीं दिखाई दे रहा है। उर्मिलेश जी जैसे लोगों को राजनीतिक दल नजर अंदाज करते हैं। यह बहुजन राजनीति का सामंतवादी नजरिया है। उर्मिलेश जी को लेकर भी सोशल मीडिया पर मांग हो रही है कि उन्हें सदन में भेजा जाना चाहिए।

प्रोफेसर विवेक और उर्मिलेश जैसे लोगों का राजनीति में उपयोग होना ही चाहिए। यह अब आम आदमी की मांग होती जा रही है।