सुंदर लड़कियां तलाशते हुए सेना के जवान रात में घर में घुस जाते थे…

…बेगम बहार तीन दिनों तक नंगे पैर जंगलों के रास्तों से गुजरीं। साथ में उनकी 8 महीने की बच्ची भी थी, जिसे उन्होंने अपनी पीठ पर एक कपड़े से बांधे रखा था, वही कपड़ा जिसे वह पहले हिजाब की तरह पहनती थीं। जब उन्हें भूख लगती, तो वह पौधों को उखाड़ती और जमीन में कीड़ों की तलाश करती थीं। जब प्यास लगी तो सीधे धारा से खारा पानी तक पिया।

 

आखिरकार, जब बेगम बहार जब नाफ नदी तक पहुंची तो उन्हें एक नाव दिखी जो उन्हें और उनके बच्चे को सुरक्षित जगह पर पहुंचा सकती थी। नाव देखते ही वह जमीन पर गिर गईं और जोर-जोर से रोने लगीं। लेकिन जब वह नाव पर बैठ गईं तब उन्हें अहसास हुआ कि उनके पैर खून से लथपथ थे और उन्हें दर्द हो रहा था। इस तरह बहार भी 3 लाख से ज्यादा रोहिंग्याओं के समूह में शामिल हो गईं जो बीते कुछ हफ्तों में अपना घर-बार छोड़कर शरणार्थी कैंपों में रहने को मजबूर हैं।

बांग्लादेश के शरणार्थी कैंप में रह रहीं बेगम बहार ने हमारे सहयोगी टाइम्स ऑफ इंडिया से बातचीत में बताया, ‘जहां हम जन्म लेते हैं वही हमारी मातृभूमि होती है। यह मायने नहीं रखता कि आपके साथ कैसा व्यवहार हो रहा है, कोई भी अपनी मां को नहीं छोड़ता। लेकिन हमारे पास ऐसा करने के अलावा दूसरा कोई विकल्प नहीं बचा था। सेना हमारे गांव में घुस चुकी थी और उन्होंने लोगों को मारना शुरू कर दिया था।’

म्यामांर के रखाइन राज्य में रहने वाले रोहिंग्या कई दशकों से ऐसे ही बिना नागरिकता के रह रहे हैं। म्यांमार में रोहिंग्या मुस्लिमों की जनसंख्या 13 लाख बताई जाती है, लेकिन दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशिया में इनकी संख्या 15 लाख है।

साल 2013 में संयुक्त राष्ट्र ने रोहिंग्या मुस्लिमों को दुनिया का सबसे सताया हुआ अल्पसंख्यक समुदाय बताया था। म्यांमार की सेना ने हाल ही में रोहिंग्या मुस्लिमों के खिलाफ कार्रवाई शुरू की है, जिसकी वजह से लाखों रोहिंग्या भागकर बांग्लादेश के शरणार्थी कैंपों में शरण ले चुके हैं।

कॉक्स बाजार के कुतुपलंग कैंप में रह रहीं हामिदा खातून ने उन तीन महीनों को याद किया जब हर रात वे लोग भयानक डर से जूझते थे। खातून के मुताबिक,’रात में, सेना के जवान हमारे दरवाजे खटखटाते थे। वे जबरदस्ती घरों में घुसकर सुंदर लड़कियां खोजते थे।

…अगर उन्हें सुंदर लड़कियां मिल जाती थीं, तो उस लड़की को घसीटकर जंगल में ले जाया जाता था और उसके साथ बलात्कार होता था। जो लड़कियां भाग्यशाली होती थीं, उन्हें वापस गांव की सड़क पर अधमरी हालत में छोड़ दिया जाता था और बाकियों को गला रेतकर मौत के घाट उतार दिया जाता था।’ खातून कहती हैं, ‘हमें अब भले ही यहां भूखा रहना पड़ता हो, लेकिन हम यहां शांति से सो सकते हैं।’

खातून के पति, अमीनुल्ला एक दिन काम से लौट रहे थे, तभी उन्होंने गोलियां चलने की आवाज सुनी। इससे पहले की वह कुछ करते उन्हें अपने बाएं हाथ में दर्द का एहसास हुआ। वह किसी तरह अपनी जान बचाकर घर पहुंचने में कामयाब हुए। उसी दिन दोनों पति-पत्नी ने बांग्लादेश भागने का फैसला लिया और रास्ते में ही अमीनुल्ला ने किसी नीम हकीम से गोली निकलवाई।

जब दोनों जंगल में घुसे तो पाया कि हजारों रोहिंग्या नाफ नदी की तरफ जा रहे हैं। किसी को रास्ता नहीं पता था, उन सबको सिर्फ इतना पता था कि मेन रोड से बचना है। तीन दिन और रातों तक, उन्होंने पत्ते, कीड़े खाकर और खारा पानी पीकर गुजारा किया। इसके बाद वे नाफ नदी पहुंचे। जहां नाविक ने नदी पार करवाने के लिए हर व्यक्ति से 10 हजार बांग्लादेश टका वसूले।

संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक तकरीबन 4 लाख रोहिंग्या मुस्लिमों ने बीते 2 हफ्ते में सीमा पार कर बांग्लादेश में शरण ली है। बीते साल से कुतुपलंग कैंप में रह रहे हाफिज खैरुल आमीन ने बताया,’मैंने अपने दोस्तों को सैनिकों की गोलियों का शिकार होते और बेरहमी से कत्ल होते देखा है। मैं किसी तरह एक ड्रम में छिपकर अपनी जान बचा पाया। मैं उस दिन भाग्यशाली थी लेकिन पूरी जिंदगी मैं रोहिंग्या होने की वजह से खुद को अभिशप्त मानता रहूंगा।’

साभारःएनबीटी

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