Wednesday, September 8, 2021

एन. यादव सर, चाय पिलाएंगे क्या, आ जाऊं

8 x 5लखनऊ (अखिलेश कृष्ण मोहन, बस यादें ही बाकी हैं)।। सो रहे हो क्या, नहीं सर जग गया हूं, तुम्हारी चाय ठंडी हो रही है, रात में देर से क्यों सोते हो, जल्दी घर आओ। वरिष्ठ पत्रकार एन. यादव के कुछ इन्हीं शब्दों में शुरू होती थी, मेरी पिछले छह महीने से दिनचर्या, लेकिन पत्रकारिता का यह दबंग सिपाही जिस दिन दुनिया छोड़ने वाला था, उस दिन उसे फोन करने का मौका ही नहीं मिला। वह किसी को परेशान नहीं करना चाह रहा था, वह खुद ही अपना इलाज करवाना चाह रहा था, यही वजह रही कि उन्होंने मुझे फोन न कर बेटे के साथ अकेले की डॉक्टर के यहां चलने का फैसला किया।

यूपी की पत्रकारिता में जब-जब जुझारू और दबंग पत्रकार की सूची बनेगी, उसमें आज के ब्यूरोचीफ रहे एन. यादव का नाम सबसे ऊपर होगा। वह पत्रकार ही नहीं थे, हर किसी भी सामाजिक, व्यवहारिक समस्या के डॉक्टर भी थे। वह जिंदगी के आखिर में भले ही अपना इलाज नहीं कर पाए, लेकिन दूसरों का इलाज बहुत बेहतर तरीके से करवाते थे। वह कहते थे, उदास क्यों होते हो मेहनत करो, लोगों से मिलो सब ठीक हो जाएगा। जब जनवरी के महीने में मैंने दैनिक भाष्कर डॉटकॉम छोड़ा, तो वह बहुत नाराज हो गए। बोले क्यों छोड़ दिया, एक बार भी बताया नहीं। मैंने कहा सर रिपोर्टिंग में आना था, डेस्क पर काम कर मैं परेशान हो जा रहा था। मेरी फील्ड रिपोर्टिंग है। तो वह बोले फिर भी एक बार तो बताते। वहां पर श्रवण शुक्ला जी हैं, मैं बोल देता। मैंने कहा सर छोड़ दिया, अब बताइए क्या किया जाए। फिर वह मुझे पत्रकार सत्ता अखबार लेकर आए और यहीं पर संवाददाता की नौकरी दिलवा दी। इसके बाद उनसे जो रिश्ता शुरू हुआ वह शब्दों में ब्यां नहीं किया जा सकता। खबर को समझना हो या दैनिक जागरण चौराहे पर चाय पीकर ठहाके लगाना, बस सर को एक फोन… सर क्या हो रहा है, चाय पिलाएंगे। मैं ही कहता था। उधर से जवाब मिलता आ जाओ। इसके बाद इस उम्मीद के साथ वहां की चाय खत्म होती कि सुबह नौ बजे घर पर मुलाकात होगी।

एन. यादव जी हर किसी का सम्मान करते थे। वह सुबह टहलने जाते थे, तो वहां सैर करने आने वाले उनको देखते ही रह जाते। वर्जिश करना, दौड़ना और फोन पर बीस-पच्चीस कॉल निपटाना, यह सब उनके मॉर्निग वॉक का ही हिस्सा था। फिर शुरू होती थी अखबारों की पलटन। 15 अखबार और डेढ़ घंटे का समय। बस एन. यादव जी अखबार में ही खो जाते। मेरे पहुंचते ही वह बोल पड़ते, फिर चाय ठंडी हो गई तुम्हारी।