Wednesday, September 8, 2021

करोड़ों की योजनाओं पर लग रहा पलीता

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लखनऊ।।अखिलेश कृष्ण मोहन।। स्वास्थ्य विभाग की योजनाएं और आए दिन होते कार्यक्रम अब अफसरों और मंत्रियों के कमाई का जरिया बन रहे हैं । इसे हम नहीं कह रहे हैं, बल्कि आए दिन राज्य सरकारों से लेकर केंद्र सरकारों के उन कार्यक्रमों से समझा जा सकता है जिसमें करोड़ों रुपए बर्बाद कर सेमिनार से लेकर एक दिन का मेडिकल चेकअप तक करवाया जाता है, जिससे बजट को खपाया जा सके और बाद में डाक्टर साहब कभी भी उस कमरे में नहीं मिलेंगे जहां मरीजों को देखने के ठिकाना है। ये समस्या किसी एक प्रदेश की नहीं है बल्कि शहर, गांव हो या देहात हर इलाके की है।

कैंसर से बड़ी बीमारी शायद ही कोई हो । ख़बर है कि केन्द्र सरकार कैंसर का जल्दी पता लगाने, स्वास्थ्य के प्रति लोगों की जागरुकता पैदा करने के लिए राज्य सरकारों के प्रयासों में सहायता कर रही है। समाचार पत्रों और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के जरिए भी जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है, जिसमें विज्ञापन का खेल है, इसे हम सब समझते हैं, सूचना विभाग भी समझता है । लेकिन क्या करें चल रहा है, सब आंख मूंदें हैं। स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं

(आशा) के लिए एक पुस्तिका तैयार की गई है, जिसमें स्तन कैंसर के बारे में जानकारी उपलब्ध है, लेकिन ये पुस्तिकाएं आशा के झोले में नहीं घर की आलमारियों या स्वास्थ्य सेंटरों में ही पड़ी रहती हैं,। इतना ही नहीं डाक्टर तो आशा के बारे में कोई जानकारी देने से भी बचते हैं। बीते दिनों लखनऊ के ही राम मनोहर लोहिया अस्पताल में स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन ने स्तन, मुंह और गर्भाशय कैंसर स्क्रीनिंग सेंटर का शुभारंभ किया जिसमें केंद्र सरकार के भी प्रतिनिधियों ने हिस्सा लिया था, कार्यक्रम में कुछ एनजीओ को भी शामिल किया गया था और पुरस्कृत भी किया गया था जो महिलाओं को स्तन कैंसर की स्क्रीनिंग के लिए प्रोत्साहित कर रही हैं। लेकिन अस्पताल में कार्यक्रम के दौरान करोड़ों रुपए खर्च के बाद भी हालात ये है कि गांव-देहात की महिलाओं को स्क्रीनिंग के लिए प्रोत्साहित करना तो दूर शहर के अस्पतालों और सेंटरों में भी इसके लिए कोई समुचित व्यवस्था नहीं है।

 भारत सरकार ने सन 2010 में कैंसर, मधुमेह, और हृदय रोग की रोकथाम और नियंत्रण (एनपीसीडीसीएस) के लिए एक व्यापक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू किया था। इस कार्यक्रम के अनुसार यह 2010-12 के दौरान 21 राज्यों के एक सौ ज़िलों में कार्यान्वित किया जाना था। एनपीसीडीसीएस के कैंसर मद के अधीन ज़िला अस्पतालों में कैंसर का जल्दी पता लगाने के लिए कीमोथिरेपी सुविधाओं को बढ़ाया जाना है लेकिन ये काम भी उस रफ्तार से नहीं हो रहा है जिस रफ्तार से हर जगह दिखावे के स्वास्थ्य कार्यक्रम किए जाते हैं, या कैंप के नाम पर लाखों रुपए खर्च होते हैं। वर्ष 2013-14 में राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अधीन एनपीसीडीसीएस गतिविधियों के लिए 300 करोड़ रुपये के बजट का प्रावधान और स्वास्थ्य क्षेत्र के अधीन कैंसर के रोगियों की देख-रेख के लिए 365 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। यह जानकारी स्वास्थ्य  एवं परिवार कल्याण मंत्री गुलाम नबी आजाद ने 23 अप्रैल को राज्य सभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में दी है। लेकिन असली सवाल भी इन्हीं करोड़ों के बजट से उठ खड़ा होता है, जिस तरह बाढ़ के दौरान सिंचाई विभाग के खर्च की कोई सीमा नहीं होती और करोड़ों रुपए खर्च होने के बाद भी  परिणाम ऊंट के मुंह में जीरे के समान ही दिखाई पड़ता है, ठीक वही हाल स्वास्थ्य विभाग के बजटका भी है। करोड़ों रुपए के बजट कार्यक्रम और एक दिन के जश्न से आगे नहीं बढ़ पाता। इसमें किसी एक की लापरवाही नहीं है बल्कि स्वास्थ्य विभाग का सामूहिक नाकारापन है, जो ऊपर से लेकर नीचे तक हर स्तर पर है।

 स्वास्थ्य महकमें में कुत्ता कांटने से लेकर सियार, बंदर कांटने तक की दवा सरकारी अस्पतालों में मुफ्त में आती है, लेकिन हालात ये है कि पीएचसी तो दूर सीएचसी और कई जिला अस्पतालों में बड़ी मुश्किल से मिलती है और मिलने के बाद भी पीड़ित से इंजेक्शन के बदले घूस नहीं ली जाएगी इसकी कोई गारंटी नहीं है। हमारे एक मित्र को बीते दिनों सियार ने काट लिया, वो बस्ती जिले के बनकटी अस्पताल में इंजेक्शन के लिए पहुंचे तो पता चला कि इंजेक्शन है लग जाएगा लेकिन हर इंजेक्शन के आपको 70 रुपए देने पड़ेंगे। उन्होंने सभी इंजेक्शन लगवाए भी उसी सत्तर रुपए के रेट से लेकिन अंतिम इंजेक्शन जब लगवाना था तब पीड़ित ने 70 की जगह 50 रुपए देने की कोशिश की तो इंजेक्शन लगाने वाले ने मना कर दिया। और ये कहते हुए एक भी पैसा कंपाउंडर ने उस दिन नहीं लिया कि हम लेंगे तो 70 रुपए नहीं तो नहीं लेंगे। इसकी शिकायत कौन किससे करेगा ?  और शिकायत करने के बाद कार्रवाई होगी इसकी संभावना कम ही है, क्यों कि अगर कार्रवाई होती ही तो इस तरह खुलेआम इंजेक्शन के 70 रुपए नहीं लिए जाते। अब यहीं से ये सवाल भी उठता है कि अगर पीड़ित के पास 70 रुपए देने की हैशियत नहीं होती (क्यों कि केंद्र सरकार 30 रुपए एक दिन का खर्चा लोगों का तय करती है) तो क्या वह पीड़ित परिवार अपनी जिंदगी बचा पाता, या उस सियार के कांटने की कीमत उसे जान देकर चुकानी पड़ती। बजट संसद और विधानसभा में पास किए जाते हैं लेकिन उस बजट का कितना हिस्सा लोगों तक पहुंच रहा है इसकी जिम्मेदारी बजट पास करवाने से भी बड़ी है, नहीं तो आम आदमी दिवालिया हो जाएगा, और सरकार अपनी योजनाओं और कार्यक्रमों का ही ढिढोरा पीटती रहेगी, और करोड़ों रुपए की योजनाएं कौड़ियों के भाव बिकती रहेंगी।

 

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