Saturday, September 4, 2021

कांशीराम दलित नहीं, बहुजन मसीहा थे-दद्दू प्रसाद

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14 अप्रैल 1984 को बीएसपी का गठन करने वाले कांशीराम आज परिचय के मोहताज नहीं हैं, लेकिन समाज के असमानतावादी ताकतों ने इस बहुजन नेता को दलित नेता के रूप में परिभाषित कर उन्हें एक पार्टी का नेता बना दिया। कांशी राम कभी भी दलित नेता नहीं रहे वो हमेशा बहुजन की बात करते थे। कांशी राम के 79 वें जन्म दिन 15 मार्च को आपने किस रूप में मनाया या मनाते हैं ये अलग मुद्दा है लेकिन क्या थे कांशीराम, इसे जानने के लिए डीडीसी न्यूज़ नेटवर्क के लखनऊ संवाददाता अखिलेश कृष्ण मोहन ने कांशीराम के साथ काफी समय तक काम करने वाले यूपी सरकार के पूर्व मंत्री दद्दू प्रसाद से कुछ अनछुए पहलुओं पर बात-चीत की। प्रस्तुत है बातचीत का रोचक अंश।

सवाल-01- कांशीराम कैसे नेता थे, क्या कांशीराम दलित नेता के रूप में ही याद किए जाएंगे ?

उत्तर-कांशीराम को दलितों का नेता जो लोग मानते हैं वो षड्यंत्रकारी हैं। कांशीराम हकीकत में कभी दलित नेता थे ही नहीं, वो बहुजन नेता थे। वो विरोधियों से सीधे नहीं टकराते थे और न ही अपने साथियों को किसी आंदोलन की आग में झोकते थे, यही वजह है कि कभी भी कांशीराम के उपर कोई आरोप नहीं लगा पाया। और न ही कोई ऐसा हादसा हुआ जिससे कांशीराम का आंदोलन सवालों के घेरे में आया हो। कांशीराम बहुजन समाज के मसीहा थे। मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू करवाने का श्रेय कांशीराम और मायावती को ही जाता है। कांशीराम ने पिछड़े वर्गों को रेखांकित किया। मंडल कमीशन के लिए प्रधानमंत्री वीपी सिंह तैयार नहीं थे, तो उनको डराने के लिए कांशीराम ने ही देवीलाल को आगे कर, देवीलाल आगे बढ़ो हम तुम्हारे साथ हैं का नारा दिया और तब तत्कालीन प्रधानमंत्री वीपी सिंह डर गए, और मंडल कमीशन की रिपोर्ट को लागू किया। मायावती ही वह पहली नेता हैं, जिन्होंने लोकसभा में मंडल कमीशन की मांग को सबसे पहले उठाया था।

सवाल-02- कांशीराम से आपकी मुलाकात कब और कहां हुई ? उस समय आपकी क्या उम्र रही होगी ?

उत्तर- कांशीराम जी से पहली मुलाकात के समय मेरी उम्र 17 साल थी। 15 साल की उम्र से ही बाबा साहब के जीवन संघर्ष, पाखंड और अंधविश्वास के खिलाफ किताब को पढ़कर मैं प्रभावित हुआ। बाद में डीएस4 की रैलियों और बैठकों में जाने लगा। दिल्ली के प्रेस क्लब पर 13 अगस्त 1984 को कांशीराम ने जेल भरो आंदोलन किया था। कांशीराम जी सबसे हाथ मिलाते थे, हमने भी दौड़कर हाथ मिलाया। यहीं प्रेस क्लब पर ही कांशीराम से मेरी पहली मुलाकात थी। कांशीराम से हाथ मिलाने के बाद हम लोगों ने मंदिर लेन थाने में गिरफ्तारी दी, हालांकि दो घंटे बाद ही हमे रिहा कर दिया गया।

सवाल-03- कांशीराम जी के काम करने की शैली क्या थी और लोगों पर उसका प्रभाव कैसा था ?

 उत्तर-कांशीराम में बिखरे समाज को एक जुट करने की जो आग थी वो काबिले तारीफ थी । वो लोगों को एक ही मंच पर देखना चाहते थे यही वजह थी कि वह कभी भी कहीं भी लोगों से मिलने को तैयार रहते और मिलकर एक जुट होने की अपील करते । उनके भाषणों और संवादों को लोगों पर जादुई असर होता था।

सवाल-03- राजनीतिक रूप से आप कांशीराम से कैसे जुड़े ?

उत्तर- कांशीराम से जो जुड़ाव हुआ वह राजनीतिक नहीं वैचारिक था। 1984 का दौर था, जब कांशीराम ने लोगों में चेतना का संचार करने के लिए साईकिल रैली की । मैं भी उस साईकिल रैली में बांदा जिले से प्रचार यात्रा पर निकला और कई इलाकों में लोगों से जनसम्पर्क किया। कुल मिलाकर कहें तो साईकिल रैली ने मुझे कांशीराम को और करीब ला दिया।

सवाल-04- कांशीराम का लक्ष्य क्या था, क्या लोगों को कभी उन्होंने खुलकर अपने विचारों से अवगत करवाया था  ?

उत्तर-कांशीराम एक युगपुरुष थे। उनका मत था कि हम दलितों की बात नहीं करेंगे। दलित की वकालत कर हम डेमोक्रेटिक रूप से कमजोर हो जाएंगे। वो कहते थे कि हम भारत के मूल निवासी हैं। पेरियार ई. रामाश्वामी, महात्मा ज्योतिबा फूले, शाहूजी महराज को बाह्मणवादी लोग दलित कहते है। इसके पीछे एक साजिश है। साजिशकर्ताओं की कोशिश है कि जो भी कमजोर तबकों की बेहतरी की बात करे, उसे दलित घोषित कर दो। क्यों कि दलित तो 22 फीसदी है । साजिशकर्ताओं को डर है कि कहीं बहुजन समाज एक जुट हो गया तो हम सत्ता से बाहर हो जाएंगे। कांशीराम ने कहा कि हमारा लक्ष्य तो 6 हजार पिछड़ी जातियों को जोड़ना है। अगर हम एक हजार जातियों को जोड़ने में भी कामयाब हो गए तो हम एक रूलर क्लास होंगे। कांशीराम ने कहा कि हमें बहुजन की बात करनी चाहिए।

 सवाल-05- मंडल कमीशन की मांग करने वाले कौन लोग थे  ?

उत्तर-आपका सवाल बिलकुल सही है, मंडल कमीशन की मांग और आंदोलन में शामिल 90 फीसदी लोग एससी और एसटी थे। इसे हम नहीं कह रहे हैं तत्कालीन मीडिया रिपोर्टों को देखकर भी इसे समझा जा सकता है।

सवाल-06- कांशीराम के साथ आप काफी समय तक रहे व्यक्तिगत अनुभव आपका कैसा है ?

उत्तर-कांशीराम की बात का एजुकेटेड सोसायटी पर गहरा प्रभाव पड़ा। अनेक लोग पढ़ाई छोड़कर, नौकरी छोड़कर, वीआरएस लेकर कांशीराम के साथ आंदोलन में जुड़े। साल 1989 को सामाजिक परिवर्तन का साल कहा जा सकता है। यह वो दौर था कि जब यूपी में उपचुनाव में बीएसपी ने बेहतर प्रदर्शन किया। इसी दौरान बीएसपी के 3 एमपी और 14 एमएलए जुने गए।

सवाल-07– कांशीराम ने इतना बड़ा सोशल ट्रांस्फरमेशन कैसे किया ?

उत्तर-देखिए कांशीराम के जिस विचार ने लोगों पर सबसे बड़ा प्रभाव डाला, वह था कि वह कभी शादी नहीं करेंगे, कभी घर वापस नहीं जाएंगे, खुद के लिए पैसा-कौड़ी इकट्ठा नहीं करेंगे। खुद की कोई जमीन नहीं होगी। कांशीराम के इस विचार पर हजारों नौजवानों ने अपनी जिंदगी को सामाजिक परिवर्तन के लिए झोंक दिया। 

सवाल-08- फंड कहां से आता था । कांशीराम ने इतने बड़े आंदोलन का बीड़ा उठाया था लेकिन उनको मदद कहां से मिलती थी ?

उत्तर-कांशीराम ने फंड जुटाने के लिए लोगों से एक टाइम का खाना मांगा, और कहा कि हम आपको आजादी देंगे। सामाजिक आजादी, उन्होंने सबसे पहले लोगों से अपील की कि जालिम की कुर्सी मंजूर नहीं । हम स्टूल पर बैठकर काम करेंगे, क्यों कि जालिम की कुर्सी पर बैठने से सहारा तो मिलता है लेकिन इशारा भी मिलने लगता है।

सवाल-09-वोट के लिए उन्होंने क्या अपील की, क्यों कि सत्ता के लिए असली फंड तो वोट है ?

उत्तर-देखिए मान्यवर कांशीराम का मिशन क्लीयर था। इलाहाबाद में उन्होंने कहा कि वोट के साथ नोट मांगो। उन्होंने एक डब्बा लेकर लोगों से अपील की, और कहा कि वोट तो आप बाद में डालेंगे, वोट पहले डालिए। उनका मानना था कि हम बैनर और अन्य संसाधनों में विरोधियों का मुकाबला नहीं कर पाएंगे । दीवारों पर वाल पेंटिंग का नायाब तरीका भी कांशीराम का ही था। कांशीराम ने 500 पेंटरों की फौज तैयार कर दीवार पर हाथी बनवाया। कांशीराम का मत था कि हाथ से हाथी बनाना हमारे लिए आसान है क्यों कि हाथ हमारे पास है और वाल पेंटिंग से हम लोगों को अधिक संख्या में जागरुक कर पाएंगे।

सवाल-10- चुनाव में हार जीत को लेकर कांशीराम का क्या मत था ?

उत्तर-चुनाव में हार को लेकर कांशीराम बड़े ही गंभीर हो जाते थे उनका कहना था कि मैं चुनाव जीतने के लिए ही नहीं लड़ रहा हूं, बल्कि ललुआ वर्ग के लोगों को ट्रेनिंग दे रहा हूं। उस समय कांशीराम दिल्ली से लोकसभा चुनाव लड़ रहे थे । हालांकि बाद में कांशीराम चुनाव हार गए। इस हार का कांशीराम पर गहरा प्रभाव पड़ा और वह इस हार को साजिशकर्ताओं के उपहास के तौर पर लिया और बाद में इटावा से चुनाव लड़े और जीते।

सवाल-10- क्या मुलायम सिंह की वजह से कांशीराम चुनाव जीत गए ?

उत्तर-नहीं इट्स टोटली रॉग…. ऐसा नहीं है इट्स टोटली रॉग…. । कांशीराम के खिलाफ मुलायम सिंह ने इटावा लोकसभा चुनाव में राम सिंह शाक्य को खड़ा किया था और वह 1 लाख वोट से अधिक वोट पाए। कांशीराम को एक लाख चालीस हजार वोट मिले थे। इसके विपरीत जसवंतनगर विधानसभा सीट से जहां से मुलायम सिंह चुनाव लड़ रहे थे, कांशीराम ने अपने उम्मीदवार पन्ना लाल को हटाया और कहा कि मुलायम सिंह यादव ने रोकर कहा है कि इस इस देश की फ्यूडेल, बाह्मणवादी, कम्यूनिज्म फोर्सेज हमें चुनाव जीत कर नहीं आने देना चाहती। मैं चाहता हूं कि मुलायम सिंह चुनाव जीतें।

सवाल-11- वोट लुटेरों को लेकर कांशीराम का क्या संदेश था, आखिर वोट लूटने वालों से कांशीराम कैसे लड़े ?

उत्तर-कांशीराम कहते थे कि जब आप अपने वोटबैंक को लूटने से नहीं बचा सकते तो बहु-बेटियों की इज्जत को कैसे बचा पाएंगे, आप अपनी जमीन कैसे बचा पाएंगे। वो कहते थे जालिम कमजोर है। आपके वोट बैंक को वो लूटकर ही बलवान बनता है और फिर आपकी बहु बेटियों पर हाथ डालता है। आप पर हमला करता है। आपके अधिकारों को छींनता है।

सवाल-12- इस संदेश का क्या लोगों पर कुछ असर हुआ ?

उत्तर-जी हां असर भी हुआ और कई जगह पर वोट लुटेरों की पिटाई भी हुई । कुछ बूथों पर लोगों की जागरुकता की वजह से वोट लुटरों को मार डाला गया।

सवाल-13- सत्ता को लेकर कांशीराम का क्या कहना था ?

उत्तर- उनका कहना था कि सत्ता ही सभी चाभियों की चाभी है। इसी से विकास के हर ताले को खोला जा सकता है। अब भी हमारा मानना है कि बहुजन की सत्ता बहुत जरूरी है।

सवाल-14- आज के डेट में कांशीराम होते तो तस्वीर कैसी होती ?

उत्तर- मान्यवर साहब और बहन जी दोनों लोग होते तो अधिक फायदा होता। प्लानिंग के मामले में हम ज्यादा मजबूत होते। हालांकि बहन जी के बेहतर दिशा निर्देश दिया है। बेहतर काम भी हो रहा है। लेकिन हम लोग मान्यवर कांशीराम को हमेशा याद करते हैं आज भी उन्हीं के बताए रास्तों पर लोग चल रहे हैं, पार्टी चल रही है और काम भी हो रहा है।

(कांशीराम के साथ कई सालों तक काम करने वाले यूपी सरकार के पूर्व ग्राम्य विकास मंत्री दद्दू प्रसाद ने डीडीसी न्यूज़ नेटवर्क के लखनऊ संवाददाता अखिलेश कृष्ण मोहन से लखनऊ में कई मुद्दों पर बेवाकी के साथ अपना पक्ष रखा ।)

 

 

 

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