Tuesday, September 7, 2021

किसने खोली सरकार के दावों की पोल ?

NationalCrimeRecordsBureau_thumb1नई दिल्ली, (डीडीसी न्यूज़ नेटवर्क)।। दिल्ली में बीते महीने एक 23 वर्षीया युवती के साथ हुए सामूहिक दुष्कर्म और फिर उसकी मौत की घटना ने सार्वजनिक जगहों पर महिलाओं की सुरक्षा पर चिंता बढ़ा दी है। लेकिन एक सवाल यह भी है कि क्या महिलाएं एवं लड़कियां अपने घरों में सुरक्षित हैं? विशेषज्ञों की माने तो वास्तविक बदलाव तब आ सकता है जब लड़कियों के जन्म से पहले लोगों की मानसिकता में परिवर्तन हो ताकि उसे बोझ के रूप में न देखा जाए और न ही वह हिंसा और भ्रूण हत्या का शिकार बने।

महिलाओं की तस्करी के खिलाफ काम करने वाली गैर सरकारी संस्था ‘अपने आप’ की रुचिरा गुप्ता ने कहा, ”किस जगह महिला खुद को सुरक्षित महसूस करे? लड़कियों को जन्म से पहले भ्रूण हत्या का शिकार होना पड़ता है। उसके पैदा होने पर मारे जाने का खतरा रहता है, फिर उसे उसके भाई की अपेक्षा कम पोषण या कम शिक्षा मिलती है। उसके बाद उसे बाल विवाह में झोंक दिया जाता है, और अगर इससे बच जाती है तो दहेज या घरेलू हिंसा जैसी समस्या उत्पन्न होती है।” रुचिरा के मुताबिक लड़कियों को इसके अलावा भी अपने घर में कई तरह के खतरों का सामना करना पड़ता है। नेशनल क्राइम रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के मुताबिक भारत में महिलाओं के साथ होने वाली हिंसा में वृद्धि आई है और महज एक साल में 2010 से 2011 के बीच इसमें सात फीसदी की वृद्धि हुई है। इस अवधि में 27 फीसदी महिलाएं दहेज हत्या की शिकार हुई हैं।

‘सेंटर फार सोशल रिसर्च’ की निदेशक रंजना कुमारी के मुताबिक महिलाओं के साथ भेदभाव करने की वजह उन्हें आर्थिक रूप से बोझ मानना है।

रंजना ने कहा, ”बच्चियों और उनके जन्म को बोझ के रूप में न देखे जाने की जरूरत है। यह इस सोच को जन्म देती है कि उसकी कोई कीमत नहीं है, उसे काबू में किया जा सकता है, और जब वह काबू में नहीं आती, तो उसके साथ लैंगिक हिंसा, दहेज हत्या, सम्मान के नाम पर हत्या जैसी चीजें पेश आती हैं।” उनके मुताबिक पूरे सामाजिक ढांचे पर दोबार विचार किए जाने की जरूरत है।

यूनिसेफ के मुताबिक 2007 से अब तक भारत में एक करोड़ लड़कियों की मौत गर्भपात और शिशु हत्या से हुई है जो कि लिंग अनुपात में आई जबरदस्त गिरावट को दर्शाती है। 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रत्येक 1,000 पुरुषों में महिलाओं की संख्या 917 है।

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