Wednesday, September 8, 2021

कुंठित परंपरावाद की मर्ज है छेड़खानी और महिला अपराध!

rsz_dangerousliasions-june07-istockकुछ समय पहले महिलाओं के लिए सेल्फ डिफेंस कार्यक्रम में महिला पत्रकारों का समूह बैठा था. इनमें से बहुत-सी पत्रकार राष्ट्रीय स्तर पर जाना-माना नाम थीं. कार्यक्रम की शुरुआत में इंस्ट्रक्टर ने सभी पत्रकारों से पूछा कि आप में से किन-किन महिलाओं को आपराधिक घटनाओं का सामना करना पड़ा है.

इस सवाल के जवाब में कुछ ही महिलाओं ने हाथ उठाए. पूछने पर किसी ने बताया कि बदमाशों ने उसका मोबाइल छीना तो किसी ने कहा कि उनकी सोने की चेन की झपटमारी हुई.

इंस्ट्रक्टर ने अचानक दूसरा सवाल पूछा कि आपमें से कितनी लड़कियां और महिलाएं कभी न कभी छेड़खानी की शिकार हुई हैं. इस सवाल के जवाब में हॉल में बैठी सभी पत्रकारों ने हाथ उठाए. प्रशिक्षक ने कहा कि हैरानी की बात यह है कि आप में कोई भी महिला छेड़खानी को अपराध नहीं मानती हैं, यानी अगर आपके साथ छेड़खानी हुई है तो आप उसे अपराध की तरह नहीं लेती हैं.

प्रशिक्षक का यह सवाल आंखें खोलने वाला था. यह हाल उन महिलाओं का है, जो चुनौतीपूर्ण नौकरी करते हुए खुद को प्रबुद्ध समाज का हिस्सा मानती हैं. खासतौर पर पत्रकारिता के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को आम महिलाओं के मुकाबले थोड़ा सजग और बहादुर भी माना जाता है. लेकिन यौन उत्पीड़न के मसले पर उनकी भी मानसिकता आम महिलाओं से अलग नहीं थी.

आखिर “सशक्त” मानी जाने वाली महिलाओं की भी कंडीशनिंग ऐसी कैसे हो गई कि वे यौन उत्पीड़न की घटनाओं को अपराध के दरजे में नहीं गिनतीं और काफी हद तक उसे अपनी नियति समझने लगती हैं.

एक किशोरी के यौन-उत्पीड़न के मामले में जब स्वयंभू संत आसाराम को पकड़ा गया, तब जाकर पूरे देश की नजरें इस ओर गईं. एक मामला दर्ज होने के बाद ऐसे कई आरोप सामने आए. जयपुर में कई महिलाएं आसाराम के खिलाफ शिकायतें लेकर आईं.

एक सवाल यह उठ सकता है कि बच्ची के साथ जुल्म होने के बाद ही ये शिकायतें सामने क्यों आईं? निजी तौर पर मैं तमाम बाबाओं को संदिग्ध ही मानती हूं. लेकिन ऐसे कितने ही बाबा टाइप के पाखंडी हैं, जिनके खिलाफ खुल कर आरोप सामने आए या उन्हें पकड़ा भी गया, लेकिन उनके खिलाफ समाज में कोई आक्रोश या विरोध नहीं उभरा. तब भी, जब इन बाबाओं पर महिलाओं के उत्पीड़न या शोषण के आरोप लगे.

यह स्थिति तब है जब पिछले साल सोलह दिसंबर या कुछ समय पहले मुंबई शक्ति मिल में सामूहिक बलात्कार के मामले पर देश भर में गुस्से की लहर दौड़ पड़ी और यहां तक कि दोषियों को फांसी की सजा सुनाई गई. लेकिन इन बाबाओं के खिलाफ न केवल हालात की शिकार महिलाएं चुप्पी साध लेती हैं, बल्कि कोई सामाजिक प्रतिरोध ठोस शक्ल अख्तियार कर पाता है.

बहरहाल, महिलाओं के चुप रह जाने की स्थितियां अलग होती हैं. यह उनकी कंडीशनिंग पर भी निर्भर हो सकती है. शायद दिल्ली में बैठी उन सशक्त पत्रकारों की तरह सामान्य महिलाओं को भी यह पता नहीं रहा होगा कि धर्म और आस्था के नाम पर साधु-संत उनके साथ जो कर रहे हैं, वह उनके खिलाफ किया गया अपराध ही है. एक पुख्ता कानून बन जाने के बाद भी हमारे देश में कितनी महिलाएं ऐसी हैं जो पति की मार-पिटाई को अपराध मानती हैं.

एक लड़की के पैदा होते ही उसे धार्मिक रूप से शिक्षित करना शुरू कर दिया जाता है. धीरे-धीरे यही धर्म के संदेश शिक्षा और कानून पर भारी पड़ने लगते हैं. घर में पिता-पति के खिलाफ कुछ नहीं बोलना और बाहर उन धर्मगुरुओं के खिलाफ नहीं बोलना, जिनकी शरण में वे भेजी जाती हैं. मानसिकता वही है कि एक शासक के रूप में पिता या पति आपके साथ जो भी करता है वह सही है तो उसी के अलग शक्ल के रूप में धर्मगुरु भी आपके साथ जो करेगा वह सही होगा. यही मानसिक कंडीशनिंग एक ऐसा भाव पैदा कर देती है कि जब धर्मगुरु, बाबा या तांत्रिक स्त्री का शारीरिक शोषण करता है तो वह उसे धर्म या खास तरह के उपचार का हिस्सा मानने लगती है.

एक बच्ची को आधुनिक स्कूल से हटा कर गुरुकुल में पढ़ने भेज दिया जाता है. आखिर इन गुरुकुलों में कौन अपनी बच्चियों को पढ़ने के लिए भेजता है? या तो अंधश्रद्धा या फिर गरीबी के कारण. छिंदवाड़ा वाला मामला अंधश्रद्धा का है. नहीं तो ज्यादातर गरीब घर के लोग ही अंधभक्ति से उपजे भरोसे के कारण ही अपने बच्चों को इन आश्रमों में भेजते हैं. यही वजह है कि उच्च-मध्यवर्ग को इस मामले में बापू के खिलाफ साजिश दिखाई देती है. गुरुकुल में पढ़ने वाली या आश्रम में रहने वाली बच्ची उन्हें अपनी नहीं लगती है, आसाराम उन्हें सवालों से ऊपर लगता है. तब भी, जब उसके खिलाफ आरोपों के सिलसिले हैं, बस उसे अदालतों में साबित होना था.

लेकिन वर्गीय वंचना के शिकार वर्गों की बच्चियों से कोई सहानुभूति नहीं दर्शाने वालों को क्या यह मालूम नहीं है कि आधुनिक कहे जाने वाले स्कूलों में उच्च मध्यवर्ग की बच्ची कितनी सुरक्षित है? ऐसे तमाम मामले हैं, जिनमें नामी-गिरामी स्कूलों में पढ़ने वाली बच्चियां यौन-शोषण से लेकर दूसरी तमाम तरह की प्रताड़नाओं की शिकार हुईं, लेकिन उसे या तो दबा दिया गया, या फिर उसे तूल नहीं दिया गया.

हमारे देश में बाबाओं का बढ़ता कारोबार और अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई कई तरह की कुंठाओं को जन्म दे रही है. धर्म और सेक्स का एक बाजार बन गया है, जहां कामनाएं हैं, और वंचना से उपजा हीनताबोध है. इसके बाद की विकृति से हम नफरत कर सकते हैं, लेकिन उसकी जड़ों पर गौर करना शायद ही कभी हमें जरूरी लगता है या शायद ध्यान भी नहीं जा पाता.

किसी भी अभिव्यक्ति के मूल में क्या छिपा है, अगर इस पर सोचना शुरू करें तो विश्लेषण आधारित एक स्थायी सामाजिक ढांचे की ओर बढ़ा जा सकता है. लेकिन यथास्थितिवाद से जिन्हें और जिनके समूचे वर्ग की सामाजिक-आर्थिक सत्ता बनी रहती है, वे इस बारे में क्यों सोचेंगे. किसी खास घटना पर सड़क पर उतरना और हल का एकमात्र उपाय फांसी पर लटकाने में ढूंढ़ना कई बार वर्गीय हितों से संचालित होता लगता है. दिल्ली और मुंबई की किसी संभ्रांत घर की महिला के बलात्कार की घटना पर हमें जितना दुख होता है, उससे ज्यादा होना चाहिए. लेकिन हरियाणा में जींद या दर्जनों जगहों पर दलित या गरीब तबके की महिलाओं के साथ जब इससे भी ज्यादा बर्बरता होती है, तो हमारी यह संवेदनशीलता क्यों नींद में चली जाती है?

कभी आसाराम कह देगा कि लड़कियों को बलात्कार से बचना है तो बलात्कारियों के सामने हाथ जोड़ लेना चाहिए, कभी कोई महिला मुख्यमंत्री कह देगी कि रात को एक बजे अकेली घर से क्यों निकलती हो, तो कोई महिला मुख्यमंत्री कहेगी कि यह बलात्कार बनावटी है, कभी कोई मंत्री कह देगा कि छोटे कपड़े क्यों पहनती हो…!!! ऐसे में अगर दिल्ली में सोलह दिसंबर सामूहिक बलात्कार के दोषियों का वकील कहता है कि अगर उसकी बेटी या बहन अकेले रात को किसी मर्द के साथ घूमेगी तो उसे पेट्रोल डाल कर जला दूंगा, तो वह दरअसल आसारामों, महिला मुख्यमंत्रियों के मूल में बैठी उसी कुंठित दुनिया के केंद्र पर अंगुली रखता है.

यह कोई मर्द और पितृसत्ता का प्रतिनिधि उदाहरण नहीं है, अगर स्त्री स्वतंत्र होने के लिए सोचेगी भी, थोड़ा-सा अपनी मर्जी से जीने के बारे में सोचेगी भी तो समूचा समाज ही उसे पेट्रोल डाल कर, तेजाब फेंक कर जला डालने के लिए तैयार खड़ा है. रोहतक में अपनी प्रेम करने वाली बेटी की हत्या कर और उसके प्रेमी को टुकड़े-टुकड़े में काट कर उस समाज ने जो किया है, क्या सबके भीतर कहीं न कहीं वही हत्यारा नहीं बैठा है?

दिल्ली या मुंबई के किसी शॉपिंग मॉल के बाहर एक लड़का चार आधुनिक लड़कियों के साथ घूम रहा है. वहीं पर एक प्रवासी मजदूर काम कर रहा होता है. वह अगर विवाहित भी है तो एक साल से अपने गांव नहीं जा पाया है. वह मजदूर अपनी शरीर की हड्डियों को मजबूत रखने के लिए रोज एक लीटर दूध नहीं खरीद सकता है. चार लड़कियों के साथ घूमने और किसी फाइव स्टार रेस्टोरेंट या होटल में जाकर मौज उड़ाने वाले उस लड़के की दुनिया के बारे में वह नहीं सोच सकता है, लेकिन अपने कई साथियों के साथ मिल कर वह महज दस रुपए खर्च कर अश्लील वीडियो जरूर देख सकता है, हनी सिंह के वीभत्स “बलात्कारी” गीत सुन सकता है. उसके सामने ये प्रत्यक्ष या प्रछन्न हालात उसके दिमाग को कहां ले जाकर छोड़ेंगे. क्या इस मूल पर सोचना हमें कभी जरूरी लगता है?

याद करें, मुंबई बलात्कार कांड का एक मुलजिम जब पुलिस के हत्थे चढ़ा, तो उस वक्त वह दो अश्लील फिल्में देख कर तीसरी देखने की तैयारी में था. सामूहिक बलात्कार को अंजाम देने के बाद पकड़े जाने के खौफ के बीच वह अश्लील फिल्म देख रहा था. इस तरह की फिल्मों में सेक्स का चित्रण किस तरह किया जाता है? एक हिंसक, विकृत और वीभत्स प्रदर्शन और स्त्री के शरीर को बर्बर तरीके से रौंदना पहले से ही कुंठित एक मर्द के दिमाग में कौन-सा जहर भरता है? और रोज-रोज ऐसे वीडियो देखने वाला, हनी सिंह टाइप अपराधियों के “बलात्कारी” गीत सुनने वाला व्यक्ति इसे फैंटेसाइज कर उसका मजा लेना चाहता है. उसके भीतर सिर्फ एक शासक और हिंसक मर्द होता है और स्त्री उसके लिए महज एक शरीर होती है. वर्ग का फर्क सुविधा और अपराध की अलग-अलग दुनिया की रचना करता है और अलग-अलग परिभाषाएं देता है.

संचार और इंटरनेट क्रांति ने दुनिया में बहुत से क्रांतिकारी काम तो किए, लेकिन इस पितृसत्तामक समाज ने इस सशक्त माध्यम को भी स्त्री के खिलाफ ही एक हथियार बना लिया है. प्राचीन धर्म हो या आधुनिक इंटरनेट, हर जगह ऐसी मानसिकता तैयार की जा रही है कि स्त्री का शरीर पुरुषों के लिए महज उपभोग की वस्तु है. क्या दुनिया भर की आधुनिकता हमारे यहां आकर कुंठित परंपरावाद का शिकार हो जाती है ?

(लेखिका मृणाल वल्लरी वरिष्ठ पत्रकार हैं। )

साभार-रविवार डॉट कॉम

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