Monday, September 6, 2021

क्या रास्ते से भटक गए अखिलेश यादव ?

resizedimage (6)लखनऊ।। यूपी में विधानसभा चुनाव के पहले दागियों से दूर होने का संदेश देने वाले अखिलेश यादव न तो सीएम बनने के बाद बच पाए और न ही कैबिनेट बिस्तार में ही अपने वादे पर खरे उतरे। विधानसभा चुनाव में मिली जीत ने समाजवादी पार्टी के नेताओं और खुद मुख्यमंत्री को केंद्र की सरकार में भागीदारी की उम्मीदें बढ़ा दी हैं। वैसे तो यूपीए में भी समाजवादी पार्टी बाहर से समर्थन दे रही है लेकिन असली मकसद तो सत्ता में शामिल होकर मंत्रिमंडल में मन मुताबिक पद पाना है। समाजवाद का जो सपना लोहिया ने देखा वह तो अभी भी सपना ही है।

यूपी में समाजवादी पार्टी से समाजवाद की उम्मीद तो की जा सकती है लेकिन समाजवाद का चेहरा कुछ फीसदी ही दिखाई दे रहा है। असली में समाजवाद कुछ चेहरों की प्रतिछाया ही बनकर रह गया है । हमारा मकसद मुलायम या अखिलेश के समाजवाद और लोहिया के समाजवाद की तुलना करना नहीं बल्कि उस समाजवाद को रेखांकित करना है जो हकीकत में समाजवाद की परिभाषा के दायरे में है और जिसे लोहिया और जयप्रकाश नारायण समाजवाद मानते थे। समान जनसंख्या के हिसाब से प्रतिनिधित्व भी समाजवाद का अहम हिस्सा है जो समाज में गैरबराबरी के खाई को पाटता है। लेकिन आज खाई इतनी चौड़ी हो गई है कि कितने लोग उस खाई में समा रहे हैं कि उनके बारे में सही आकड़ा इकट्ठा कर पाना भी मुश्किल है। हकीकत में समाजादी पार्टी पिछड़ों, अल्पसंख्यकों और कुछ दलितों को वोट बैंक से सत्ता में आती है लेकिन सत्ता में आने पर समाजवाद फाइलों में ही दर्ज होकर रह जाता है। सबसे बड़ी बात है कि जिस वोट बैंक के लिए समाजादी पार्टी और बीएसपी भागतीं हैं वो वोट बैंक उन्हें कभी मिलता ही नहीं। अगर कुछ वोट मिलता भी है तो उसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है पार्टी को भी और समाज को भी । लेकिन राजनीतिक दल इसे दरकिनार करते रहे हैं।

विधानसभा चुनाव से पहले डीपी यादव को रेड सिंगनल और चुनाव के बाद राजा भैया सरीखों को भारी पद देकर मुख्यमंत्री ने ये संदेश तो पहले ही दे दिया था कि ये फैसले कोई ओर कर रहा है। रही सही कसर गोंडा से विधायक विनोद सिंह उर्फ गुड्डू पंडित जैसे दागी विधायक को दोबारा मंत्री पद देकर कर दी। सत्ता में आने के लिए ये सही है कि कई समझौते करने पड़ते हैं लेकिन उसकी भी एक सीमा होती है। किसान और मजदूर अखिलेश सरकार के 10 महीने पूरे होने के बाद भी निराश हैं लेकिन प्रदेश सरकार अपनी ही पीठ थपथपा रही है । सरकार की कुछ योजनाएं चलाई तो गईं लेकिन जनता को नहीं बल्कि ऊंचे रसूख वालों को ही उसका फायदा मिला। यूपी की 70 फीसदी ग्रामीण जनता समाजवादी पार्टी को वोट करती है लेकिन सरकार के बजट का 70 फीसदी हिस्सा केवल शहरी लोगों को ही मिल रहा है ।  अब सवाल ये है कि लोकसभा चुनाव में बेहतर सफलता की उम्मीद कर रही समाजवादी पार्टी चुनाव से पहले नींद से जागेगी या चुनाव के परिणाम का ही इंतजार करेगी।

अखिलेश कृष्ण मोहन

लेखक डीडीसी न्यूज़ नेटवर्क के लखनऊ संवाददाता हैं। 

(लेखक के निजी विचार हैं  )

Leave a Reply