Friday, September 3, 2021

क्या है आपके लोकपाल में जरूर जान लें ?

resizedimageलखनऊ।। (अखिलेश कृष्ण मोहन) ।। लोकपाल के चयन का कॉलि‍जियम: विधेयक में लोकपाल के सदस्‍यों का चयन प्रधानमंत्री, अध्‍यक्ष (लोकसभा), नेता विपक्ष (राज्‍यसभा), भारत के मुख्‍य न्‍यायाधीशों या मुख्‍य न्‍यायाधीश द्वारा मनोनीत सुप्रीम कोर्ट के न्‍यायाधीश और राष्‍ट्रपति द्वारा नामित जाने-माने न्‍यायविद की चयन समिति द्वारा किए जाने का प्रावधान है। प्रवर समिति ने सिफारिश की है कि चयन समिति का पांचवां सदस्‍य (जाने-माने न्‍यायविद) चयन समिति के चार सदस्‍यों की सिफारिश पर राष्‍ट्रपति द्वारा मनोनीत किया जाए। सरकार के इस सिफारिश को स्‍वीकार कर लिया है। सार्वजनिक एवं दान प्राप्‍त करनेवाली संस्‍थाओं पर अधिकार क्षेत्र प्रवर समिति ने जनता द्वारा दान प्राप्‍त करने वाली संस्‍थाओं और संस्‍थानों को लोकपाल के दायरे से बाहर रखने की सिफारिश की है। सरकार ने सोसायटी पंजीकरण अधिनियम के तहत पंजीकृत ऐसी संस्‍थानों या प्राधिकारियों को छूट देने का निश्‍चय किया है जिनका गठन या नियुक्ति किसी केन्‍द्रीय पर राज्‍य या प्रांतीय अधिनियम के तहत सार्वजनिक धार्मिक या धर्मादि ट्रस्‍टों या इंडोमेंट्स या धार्मिक या धर्मार्थ उद्देश्यों में किया गया हो। सार्वजनिक रूप से दान प्राप्‍त करनेवाली अन्‍य गैरसरकारी संस्‍थाएं लोकपाल के दायरे में रहेंगी।

सीधे तौर पर जांच करने का अधिकार : प्रवर समिति ने सिफारिश की है कि लोकपाल को प्राथमिक जांच का आदेश दिए बिना सीधे जांच करने का अधिकार दिया जाए बशर्ते कि लोकपाल को लगे कि प्रथम दृष्‍टया मामला बनता है। सरकार ने इस संशोधन के साथ यह भी सिफारिश स्‍वीकार कर ली है कि प्रथम दृष्‍टया मामला बनता है या नहीं इस निर्णय पर पहुंचने से पहले लोकपाल जनसेवक से स्‍पष्‍टीकरण मांगे और तब तय करे कि सीधी जांच प्रथम दृष्‍टया मामला बनता है या नहीं”।

लोकसेवक की बात सुनने का अवसरः  चयन समिति ने सिफारिश की है कि जांच एजेंसी द्वारा प्रारंभिक जांच के दौरान लोकसेवक की टिप्पणी अनिवार्य  नहीं हो (धारा 20(2)। समिति ने यह भी सिफारिश की है कि जांच का आदेश देने से पहले लोकपाल द्वारा सुनवाई का अवसर समाप्त किया जा सकता है (धारा 20(3)) लोकसेवक और सरकार सक्षम अधिकारी को प्रारंभिक जांच स्तर और जांच का औपचारिक आदेश देने से बहुत से मामलों में संदेह समाप्त हो जाएगा और नियमित जांच के लिए मामलों की संख्या बहुत कम हो जाएगी। सरकार ने चयन समिति की इस सिफारिश को स्वीकार नहीं करने का फैसला किया है और वह इसके लिए संशोधन पेश करेगी।

लोकसेवकों पर मुकदमा चलाने के लिए आदेश देने की शक्तिः

समिति ने यह सुझाव दिया है कि लोकसेवकों पर मुकदमा चलाने के लिए मंजूरी देने की शक्ति सरकार से हटाकर लोकपाल को दी जा सकती है। समिति ने यह भी सुझाव दिया है कि इस प्रकार का निर्णय लेते समय लोकपाल के लिए सक्षम अधिकारी और लोकसेवक की टिप्पणियां प्राप्त करना जरूरी हो सकता है। सरकार ने समिति के इस सुझाव को स्वीकार करने का निर्णय लिया है।

सीबीआई को सशक्त बनानाः  समिति ने सीबीआई को सशक्त बनाने के लिए विधेयक में कई संशोधन करने के लिए सुझाव दिये हैः-

1.     सीबीआई निदेशक के नियंत्रणाधीन एक अभियोजन निदेशक की अध्यक्षता में एक अभियोजन निदेशालय की स्थापना करना।

2.         केन्द्रीय सतर्कता आयोग के सुझाव पर अभियोजन निदेशक की नियुक्ति करना।

3.         लोकपाल द्वारा भेजे गये मामले की देख-रेख के लिए लोकपाल की सहमति के साथ सरकारी अधिवक्ताओं को छोड़कर सीबीआई द्वारा अधिवक्ताओं का एक पैनल बनाना।

4.     लोकपाल द्वारा बताये गये मामले की जांच के लिए सीबीआई के पास पर्याप्त धन होने का प्रावधान।

5.     लोकपाल की स्वीकृति के साथ लोकपाल द्वारा भेजे गये मामले की जांच करने वाले सीबीआई अधिकारियों का स्थानांतरण करना।

 

सरकार ने अंतिम एक सुझाव को छोड़कर इन सभी सुझावों को मानने का निर्णय लिया है, जोकि लोकपाल द्वारा भेजे गये मामले की जांच करने वाले सीबीआई अधिकारियों के स्थानांतरण के लिए लोकपाल की मंजूरी से संबंधित हैं। इस प्रस्ताव को इसलिए नहीं माना जा सकता कि इससे सीबीआई के क्रियाकलाप पर प्रभाव पड़ेगा।

 

विधेयक की अन्य प्रमुख विशेषताएं

सीबीआई पर पर्यवेक्षण की शक्तियां– यह विधेयक लोकपाल को दिल्ली विशेष पुलिस स्थापना (सीबीआई) पर जांच के लिए लोकपाल द्वारा सौंपे गये मामले के संदर्भ में अधीक्षण की शक्तियां प्रदान करता है।

सीबीआई निदेशक की नियुक्तिः  प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में एक उच्चाधिकार प्राप्त समिति सीबीआई निदेशक के चयन के बारे में संस्तुति करेगी।

अवैध तरीके से अर्जित संपत्ति को जब्त करनाः अभियोजन लंबित रहने की स्थिति मे भी भ्रष्टाचार द्वारा अर्जित संपत्ति को जब्त करने के प्रावधान विधेयक में शामिल हैं।

भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के अधीन दंड़ को बढ़ानाः इस विधेयक में भ्रष्टाचार रोकथाम अधिनियम के अधीन दंड़ को बढ़ाने का प्रस्ताव किया गया हैः-

ए)    सात वर्ष से लेकर दस वर्ष तक अधिकतम दंड

बी)   छः माह से लेकर दो वर्षों तक न्यूनतम दंड

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