Saturday, August 28, 2021

खुलासे को हल्का न लें नेता जी

नई दिल्ली। (दिल्ली ब्यूरो)। अरविंद केजरीवाल इन दिनों चर्चा से बाहर चल रहे हों और उनका भ्रष्ट नेताओं के खिलाफ पोल खोलो अभियान भी मंद पड़ गया हो, लेकिन उन्हें नितिन गडकरी के इस्तीफे के रूप में पहली सफलता मिल गई है।

यह उनके ही खुलासे का नतीजा है कि गडकरी को न केवल दोबारा भाजपा अध्यक्ष बनने की दौड़ से बाहर होना पड़ा, बल्कि किरकिरी भी झेलनी पड़ी। आप पार्टी के गठन के पहले केजरीवाल ने ही सबसे पहले अपनी सहयोगी डॉ. अंजलि दमानिया के साथ मिलकर एक समय नितिन गडकरी के स्वामित्व में रही पूर्ति समूह का कच्चा-चिट्ठा खोला था। उन्होंने नितिन गडकरी और महाराष्ट्र सरकार में मिलीभगत का आरोप लगाते हुए पूर्ति समूह के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए थे। उनके इस खुलासे को सोनिया गांधी के दामाद रॉबर्ट वाड्रा भंडाफोड़ के मुकाबले हल्का माना गया और कुछ ने इसे संतुलन साधने की कवायद भी बताया। केजरीवाल के एक पूर्व सहयोगी और रिटायर्ड आइपीएस अधिकारी वाईपी सिंह ने तो केजरीवाल के कथित कमजोर खुलासे पर नाराजगी भी जाहिर की, लेकिन यह इसी खुलासे का असर था कि मीडिया ने पूर्ति समूह के कामकाज और खासकर उसमें निवेश करने वाली कंपनियों की छानबीन की तो कुछ चौंकाने वाले तथ्य सामने आए।

इन्हीं तथ्यों ने सरकार को हस्तक्षेप करने और गडकरी के खिलाफ आयकर विभाग की जांच करने का मौका दिया। गडकरी ने अपनी सफाई में न केवल यह तर्क दिया कि अब उनका पूर्ति समूह से कोई लेना-देना नहीं, बल्कि मीडिया के एक हिस्से पर अपने खिलाफ दुष्प्रचार छेड़ने की तोहमत भी मढ़ी। वह खुद को पाक-साफ बताने के साथ यह भी आभास कराते रहे कि इससे उनकी अथवा पार्टी की सेहत पर कोई असर नहीं पड़ने वाला।

गडकरी पर लग रहे आरोपों और उनके खिलाफ आयकर विभाग की सक्रियता के बावजूद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अध्यक्ष पद पर उनकी दावेदारी को समर्थन देता रहा, जबकि भाजपा के कई नेता उनके खिलाफ खुलकर खड़े हो गए थे। इनमें राज्यसभा सदस्य राम जेठमलानी प्रमुख थे। जेठमलानी को निलंबन का भी सामना करना पड़ा। बाद में यशवंत सिन्हा भी गडकरी के दोबारा अध्यक्ष बनने के खिलाफ हो गए थे।

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