Tuesday, September 7, 2021

पेयजल सुविधा का हाल बेहाल, माननीय बेख़बर

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जल ही जीवन है, लेकिन हमारे देश में कई ऐसे प्रदेश हैं जहां सरकार पानी की समुचित व्यवस्था नहीं कर सकी। उत्तर प्रदेश सरकार ने होली के मौके पर विधानसभा के बजट सत्र के समापन के दौरान हर विधायक को अपने विधानसभा क्षेत्र में सौ हैण्डपंप लगाने के लिए बजट दिया है। सौ हैण्डपंप भी अगर इलाकों में सही तरीके से लगवा दिए गए तो तत्काल 10 फीसदी इलाकों की पानी समस्या हल हो सकती है लेकिन ऐसा होगा इसकी संभावना कम ही है, क्योंकि नेता से लेकर अफसर सभी की उदासीनता का ही नतीजा है कि पानी के लिए लोगों को दूर-दूर तक न केवल भटकना पड़ता है बल्कि गंदा पानी भी पीना पड़ता है। बुंदलखंड की तस्वीर तो और भी बदतर है । लेकिन पूरे देश में पानी की किल्लत पर नजर डाले तो तस्वीर कोई अलग नहीं है। दुर्भाग्यपूर्ण तो यह है कि कई राज्य जैसे छत्तीसगढ़, गुजरात, हरियाणा, जम्मू् और कश्मीर, झारखंड, केरल, उत्तणराखंड और त्रिपुरा ने अभी तक पेय जल गुणवत्ता‍ के लिए निर्धारित की गई 5 प्रतिशत राशि पाने के लिए अपना प्रस्ताव भी दाखिल नहीं किया है। दुनिया भर में पेय जल और स्वछ्ता की कमी के कारण होने वाली बीमारियों और मौतों का आंकड़ा 9 प्रतिशत और 6 प्रतिशत सरकार दिखाती है लेकिन हकीकत तो ये है कि अधिकतर बीमारियां गंदे पानी पीने की वजह से ही होती हैं।

हमारे देश के गांवों में एक लाख से अधिक घरों में रहने वाले पांच करोड़ से भी अधिक लोगों के पास आज भी साफ पानी की सुविधा नहीं है। आधिकारिक आंकडों के अनुसार कम से कम 22 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों को पानी लाने के लिए आधा किलोमीटर और उसे भी अधिक दूर पैदल चलना पड़ता है (इसमें अधिकतर बोझ महिलाओं को ढोना पड़ता है)। ऐसे परिवारों का अधिकतर प्रतिशत भाग मणिपुर, त्रिपुरा, उड़ीसा, झारखण्ड, मध्यपप्रदेश और मेघालय में है। गांवों में 15 प्रतिशत परिवार बिना ढके कुओं पर निर्भर करते हैं तो दूसरे दूषित पेय जल संसाधनों जैसे नदी, झरने और पोखरों आदि पर निर्भर करते हैं। गांवों के 85 प्रतिशत पेय जल संसाधन भूमिगत जल पर आधारित हैं और इनमें कई इलाकों का पानी दूषित होता है। गांवों की केवल 30.80 प्रतिशत आबादी के पास ही नल के पानी की सुविधा है, इसकी तस्वीर केंद्र सरकार भी साफ कर चुका है। वास्तव में केवल चार ही राज्य ऐसे हैं जो पचास प्रतिशत अथवा उससे अधिक गावों के क्षेत्रों को पाईप आपूर्ति के जरिए पेय जल लाने में सक्षम हो पाये हैं। कई राज्यों को अभी भी सरकारी विद्यालयों में पीने योग्य पानी की आपूर्ति नहीं है जबकि कोर्ट पहले ही स्वच्छ पानी मुहैया करना का आदेश दे चुका है। नवीनतम उपलब्ध आंकडें दिखाते हैं कि गांवों के 44 प्रतिशत से भी कम सरकारी विद्यालयों में पेय जल की सुविधा है।

राष्ट्रीय पेय जल कार्यक्रम में और संबंधित विषयों की प्रगति पर हाल ही में दिल्ली में आयोजित राष्ट्रीय परामर्श में यह बात सामने आई कि पीने योग्य पानी पर इस असंतोषजनक हालात से अलग कई राज्य केन्द्र के विभिन्न राष्ट्रीय ग्रामीण पेय जल कार्यक्रम के आवंटित धनराशि का भी उपयोग नहीं कर पाये हैं। सभी गांवों को पेय जल सुविधा उपलब्ध करवाने के लिए सरकार 12 वीं पंचवर्षीय योजना के दौरान राष्ट्रीय ग्रामीण पेय जल कार्यक्रम में प्रमुख रणनीतिक बदलाव लाने जा रही है। देश के अधिकतर हिस्सों में अति भूमिगत जल संग्रह की पृष्ठभूमि में भूमिगत जल से सतही जल उपयोग की तरफ जाने पर जोर दिया जा रहा है। हैण्ड पंप के प्रयोग को कम करते हुए पाईप से जलापूर्ति की जाएगी। काफी पहले 1972 में प्रति व्यक्ति प्रति दिन 40 लीटर पानी देने का मानक तय किया गया था परंतु अब 12 वीं पंचवर्षीय योजना के अन्तर्गत इसे बढ़ाकर 40 लीटर से 55 लीटर कर दिया गया है। 12 वीं पंचवर्षीय योजना का लक्ष्य परिवारों को उनके घर में अथवा 100 मीटर के दायरे के भीतर कम से कम आधी आबादी को 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन पानी उपलब्ध कराने के दायरे में लाने का है। एक बार राज्य प्रति व्यक्ति पेयजल उपलब्धत बढ़ाने के टारगेट को पा लेते हैं, तो यह कुछ हद तक गांवों और शहरों के बीच के अंतर को पाटने का काम करेगा। पेय जल एवं सफाई मंत्री भारत सिंह सोलंकी राज्यों से 55 लीटर प्रति व्यक्ति प्रतिदिन का लक्ष्य निर्धारित करने की प्रार्थना कर चुके हैं, वह कहते हैं कि ‘यह परिवारों को पानी के कनेक्शन को आम लोगों को सुलभ होने में मदद करेगा और महिलाओं पर से हैण्डहपंप और सार्वजनिक नलों से पानी लाने का बोझ कम करेगा और ठीक उसी प्रकार दूषित जल के खतरों को भी कम करेगा’ ।

गांवों में गुणात्मनक पेयजल की उपलब्धता एक प्रमुख चिंता का विषय है, देश के कई भाग विषाक्त और फ्लोराइड दूषण से प्रभावित हैं जो कि स्वायत्ता पर प्रभाव की दृष्टि से सबसे अधिक खतरनाक माना जाता है। देश में अभी 2000 विषाक्त और 12000 फ्लोराइड प्रभावित ग्रामीण आवास है जिसके कारण 2013-14 के लिए प्रस्तावित बजट में 1400 करोड़ रूपए उपलब्ध कराने का प्रावधान जल शुद्धिकरण की परियोजनाएं स्थापित करने के लिए किया गया है। केन्द्र उन राज्यों को जो कि रासायनिक पेय जल प्रदूषण और जापानी और इनसेफलाईटिस सिंड्रोम के केस हैं, उनको पेय जल गुणवत्ता सुधार के तहत राष्ट्रीय ग्रामीण पेय जल कार्यक्रम के अंतर्गत 5 प्रतिशत आवंटन का प्रावधान है। 

इस तरह 12वीं योजना का जोर ग्रामीण पेय जल आपूर्ति और ग्रामीण स्वच्छता को मजबूत करने के लिए गांवों को पाईप जल आपूर्ति और खुले में शौच से मुक्त करने की ओर प्रयास निहायत जरूरी हैं ।12वीं योजना का दस्तावेज़ प्रारूप कहता है कि सभी सरकारी ईमारतों और समुदायिक भवनों में विद्यालयों और आंगनवाडि़यों को पेय जल के लिए जलापूर्ति और शौचालय राष्ट्रीय ग्रामीण पेय जल कार्यक्रम में निर्धारित गुणात्मक मानकों के अनुरूप उपलब्ध कराये जायेंगे जो कि वर्तमान विद्यालयों और सर्वशिक्षा अभियान एवं सर्वशिक्षा अभियान के अंतर्गत स्थापित नये विद्यालयों के लिए भी हैं। निजी विद्यालयों के लिए यह शिक्षा अधिकारों के प्रावधानों के तहत अमल में लाया जायेगा। सभी समुदायिक शौचालय सरकारी धनराशि से बनेंगे और इनका जनता के उपयोग के लिए रख-रखाव राष्ट्रीय ग्रामीण पेय जल कार्यक्रम के अंतर्गत चल रही जलापूर्ति द्वारा किया जायेगा। इस बात का ध्या‍न रखा जायेगा कि नाइट्रेट दूषण से बचाव के लिए शौचालयों और जल स्रोतों के बीच एक न्यू्नतम अंतर रखा जायेगा। राष्ट्रीय ग्रामीण पेय जल कार्यक्रम के एक भाग का प्रारूप शहरी क्षेत्रों के अनुरूप ग्रामीण क्षेत्रों में आवास, पेय जल और शौच सुविधाओं को उपलब्ध कराने के लिए एकीकृत आवास सुधार परियोजनाओं की स्थापना करेगा। पेय जल योजना लाभार्थियों विशेषकर महिलाओं की भागीदारी भी प्रस्तावित है।

 

अखिलेश कृष्ण मोहन

(डीडीसी न्यूज़ नेटवर्क, लखनऊ)

 

 

 

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