Wednesday, September 8, 2021

गृहमंत्री राजनाथ सिंह के क्षेत्र में ये क्या रही है महिला!

---------_1429190886लखनऊ।। पीएम नरेंद्र मोदी ने जहां स्वच्छता अभियान की शुरुआत की है, वहीं उनके गृहमंत्री राजनाथ सिंह के संसदीय क्षेत्र में मैला ढोने की कुप्रथा आज भी जारी है। यह हाल सूबे की राजधानी लखनऊ का तब है, जब साल 1993 में संसद में कानून बनाकर इसपर प्रतिबंध लगाया गया था। इसके तहत शुष्क शौचालय बनाने या मैला ढुलाई के लिए किसी कर्मचारी को नियुक्त करने पर सजा का प्रावधान है।

कड़े कानून बनने के बाद भी राजधानी लखनऊ में मैला ढोने की कुप्रथा का जीता-जागता नमूना पुराने लखनऊ के कश्‍मीरी मोहल्ले में साफ देखा जा सकता है। इस मोहल्ले के कल्‍बे आबिद वार्ड में करीब 25 से 30 घर ऐसे हैं, जहां आज भी शुष्क शौचालय का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। आज भी महिलाएं घर-घर जाकर मैला ढोने का काम रही हैं।

साल 1993 की बात है, जब आजादी के चार दशक बाद भारत सरकार को लगा कि सि‍र पर मैला ढोना ठीक नहीं है और इसको बंद किया जाना चाहिए। इसके लिए कानून बनाया गया। यह तय किया गया कि मैला ढोने की अमानवीय प्रथा को किसी भी तरह 31 दिसंबर 2007 तक ज़रूर खत्म कर दिया जाएगा। 14 साल गुजर गए, फिर सरकार को होश आया कि यह प्रथा तो खत्म हुई ही नहीं। फिर ऐलान किया गया कि 31 मार्च 2009 तक यह कुप्रथा पूरी तरह खत्म कर दी जाएगी, लेकिन क्या ऐसा हो पाया?

लखनऊ के पुराने शहर के कश्‍मीरी मोहल्ले के कल्‍बे आबिद वार्ड में करीब 25 से 30 घर ऐसे हैं, जहां शुष्क शौचालय का इस्‍तेमाल किया जा रहा है। सुबह और शाम के समय यहां महिलाएं मैला ढोने के लिए आती हैं। ये महिलाएं अपने साथ एक बड़ी डलिया रखती है, जिसमें मैला उठाकर ले जाती हैं। इन महिलाओं को 20 से 25 रुपए प्रति घर के हिसाब से मैला ढुलाई मेहनताना मिलता है।

क्‍या कहती हैं मैला ढोने वाली महिलाएं

मैला ढोने वाली इन महिलाओं का कहना है कि उनके इस काम की वजह से लोग उनके पास भी नहीं आते हैं। वहीं, यदि वह दूसरा काम करने की सोचती हैं तो लोग काम भी नहीं करने देते। मजबूर होकर उन्‍हें इस काम को करना पड़ता है। वहीं, कुछ महिलाओं का कह‍ना कि अब उनके बेटे ही उनसे यह काम करने के लिए मना करने लगे हैं। बच्‍चे कहते हैं कि इस काम से लोग उनके पास नहीं आते हैं। ऐसे में वह अब यह काम छोड़ देंगी।

फोटोः लखनऊ के कश्‍मीरी मोहल्‍ले में मैला सफाई करती महिला।