Wednesday, September 8, 2021

जवाब तो देना ही होगा

resizedimage (1)लखनऊ।। अरविंद यादव/डीडीसी न्यूज़ नेटवर्क।। कभी हंगामा तो कभी सदन का बहिष्कार, कभी सदन में बहस तो कभी चुटकुलों की बैछार कुछ इसी तरह यूपी विधानसभा का बजट सत्र 23 दिनों तक चला। 14 मार्च से 22 मार्च तक चले बजट सत्र में कई लोकलुभावन घोषणाएं हुईं तो माननीय विधायकों और पूर्व विधायकों को भी तोहफा मिला। सदन या उसकी समितियों की बैठक में भाग लेने के लिए हर दिन के भत्ते को 500 से बढ़ा कर 750 कर दिया गया और पूर्व विधायकों की पेंशन और उनके यात्रा के लिए रेलवे कूपन में भी अधिक रियायत दी गई। होली के मौके पर हर विधायक को सौ हैण्ड पम्प अपने इलाके में लगवाने का तोहफा भी दिया गया है, जिसकी सत्ता और विपक्ष दोनों से सराहना की है।

सदन के बजट सत्र के 23 दिनों को दौरान दलित मुद्दों पर कम चर्चा हुई। कई जगह दलितों के उत्पीड़न और उनहें परेशान किए जाने की ख़बरे आईं लेकिन सदन में ऐसे मुद्दों पर चर्चा कम ही हुई लेकिन बीएसपी नेता स्वामी प्रसाद मौर्य का कहना है कि ऐसा नहीं है कई बार ऐसा हुआ और बाबा साहब के अपमान जनक टिप्पणी पर तो सदन का बीएसपी ने बहिष्कार भी किया।

लेकिन इस सबसे अलग सदन का दूसरा पहलू भी है। जनता के बीच गला फाड़ कर वोट मांगने वाले कई बड़े विधायक और मंत्री सदन में या तो आए ही नहीं या केवल एक दो दिन आए, लेकिन जनता की समस्याएं उठाना तो दूर सदन में एक शब्द भी नहीं बोले। बुंदेलखंड से विधायक उमा भारती को ही ले लीजिए, जनता से ढेरों वादे करने वाली उमाभारती को भी अब सदन में विपक्ष की कतार में बैठना रास नहीं आता। कभी मध्यप्रदेश की मुख्यमंत्री रह चुकी उमाभारती शायद विपक्ष में बैठने को अपनी तौहीनी समझती हैं, इतना ही नहीं, लखनऊ पूर्वी से विधायक और बीजेपी के पार्टी उपाध्यक्ष कलराज मिश्र जी सदन में एक-दो दिन दिखे तो लेकिन जनता के मुद्दों को उठाने की जरूरत नहीं समझी, जबकि सत्ता में आने पर कलराज मिश्र को भी सीएम बद का प्रबल दावेदार माना जा रहा था। बाद में बीजेपी विधायक दल का नेता बनाने की भी आवाज उठी थी। बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष लक्ष्मीकांत बाजपेई भी का हाल भी कुछ अलग नहीं है एक दो-दिन सदन में झलक दिखलाने वाले बाजपेई जी के पास वैसे तो सरकार को घेरने के कई मुद्दे हैं लेकिन सदन में बोलना जरूरी नहीं समझा। इसे माननीयों भले ही अपनी गरिमा बताते हों लेकिन जनता से वोट लेकर सत्र में न आना रोड़ और दफ्तर में सियासत करना जनता के साथ छलावा नहीं है।

सवाल ये है कि जब सदन सबसे अधिक दिनों तक चला हो ऐसे में बड़े चेहरों वाले ये माननीय कहां हैं। जनता इन्हें सदन में आवाज उठाने के लिए चुनती है लेकिन ये सदन से ही गायब रहेंगे तो भले इलाके की समस्याओं और पीड़ितों की आवाज को कौन उठाएगा। सवाल ये भी है कि क्या यही वजह तो नहीं है कि हर पार्टी में नए और युवा नेता इन पुराने और अनुभवी नेताओं को धूल चटाकर न केवल सदन में पहुंच रहे हैं बल्कि मंत्री भी बन रहे हैं । सदन में न पहुंचने का जवाब आज नहीं तो कल जनता माननीयों से तो मांगेगी ही। और जवाब देना ही होगा।

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