Monday, August 30, 2021

जिन्हें पहाड़ों पर ही रहना है उनकी सुध कौन लेगा

1Uttarakhand_Floods_PTIउफनती नदी और उजाड़ केदारनाथ जी हां यही तस्वीर है आज की। टुकड़ों में फंसे श्रद्धालु और पर्यटक। जमीन से आसमान तक मार्च करती सेना। उत्तराखंड में  बीते सात दिनों का सच यही है। लेकिन इस सच से इतर एक दूसरा खौफनाक सच अब भी त्रासदी की चादर में ही लिपटा हुआ है। क्योंकि यह ना तो केदारनाथ के दर्शन करने आये और ना ही इन्हें दर्शन करके लौटना था। यह पर्यटक भी नहीं है जो खुली आबो-हवा में जिन्दगी तर कर लौटे। इनका सच ही इनकी त्रासदी है और इन्हें कहीं लौटना नहीं है तो अभी तक किसी की नजर यहां गई भी नहीं है। खासकर उत्तराखंड में गढवाल इलाके के तीन जिले उत्तरकाशी, रुद्रप्रयाग और चामोली और इन तीन जिलो के करीब 250 से ज्यादा गांव औसतन हर गांव की आबादी 300 से 400 लोगों की और सौ से कम आबादी वाले करीब 500 से ज्यादा गांव। अब ना छत है और ना ही सपाट जमीन। जिस जमीन पर गांववाले खड़े हैं उस जमीन पर दो जून का अनाज भी बचा नहीं है जो पेट भर सके। इन तीन जिलों के करीब-करीब पचास हजार लोगों के सामने संकट यह है कि बादल के फटने से लेकर नदी के उफान और पहाड़ों के टूट कर गिरने के बाद जिन्दगी जीने का हर रास्ता बंद हो गया है। जो गांव तबाह हुये हैं। जहां जिन्दगी अब दो जून की रोटी के लिये तरस रही है उनके सामने सबसे बडा संकट यह है कि अगले 15- 20 दिनों में फंसे लोगों को तो निकाल लिया जायेगा लेकिन उसके बाद शुरु होगी मौतों से होने वाली बीमारियों की त्रासदी। साथ ही बीतते वक्त के साथ जिन्दगी जीये कैसे यह संकट गहरायेगा और अभी तक मदद के लिये कोई हाथ गांववालों के लिये उठा नहीं है। क्योंकि खेती की जमीन पर गाद भर चुकी है तो खेती हो नहीं सकती। तीन महिनों के लिये चार घाम के खुलने वाले कपाट पर अब ताला लग चुका है और  इसी दौर में पर्यटन से होने वाली कमाई रास्तों के  टूटने  से ठप हो चुकी है। यानी पहाड़ का जीवन जो यूं भी संघर्ष के आसरे चलता है उस पर शहरी विकास की अनूठी दास्तान ने स्वाहा कर दिया है। प्राकृतिक त्रासदी ने इन तीन जिलों में खेती लायक करीब सौ स्कावयर किलोमीटर जमीन को पूरी तरह खत्म कर दिया है। करीब दस हजार परिवार जो पूरी तरह पर्यटन और चार घाम को सफल बनाने के दौरान साल भर की कमाई दो-तीन महिनों में करता है वह बंद हो चुकी है।
असल में कैसे उतराखंड को दोहा गया और जिन्दगी की अनदेखी की गई यह अपने आप में मिसाल है। क्योंकि केदारनाथ से निकलने वाली मंदाकिनी नदी के दो फ्लड वे हैं। कई दशकों से मंदाकिनी सिर्फ पूर्वी वाहिका में बह रही थी। लोगों को लगा कि अब मंदाकिनी बस एक धारा में बहती रहेगी। जब मंदाकिनी में बाढ़ आई तो वह अपने पुराने पथ यानी पश्चिमी वाहिका में भी बढ़ी। जिससे उसके रास्ते में बनाए गए सभी निर्माण बह गए। गांव के गांव इसलिए बहे हैं क्योंकि पुराने गाँव ढालों पर बने होते थे। पहले के किसान वेदिकाओं में घर नहीं बनाते थे। वे इस क्षेत्र पर सिर्फ खेती करते थे। लेकिन अब इस वेदिका क्षेत्र में नगर,  गाँव, संस्थान, होटल सब कुछ बना दिए गए हैं। ऐसे गांव के लोग चारधाम करने आये लोगों से कमाते और घर चलाते। लेकिन अब घरवाले को प्रलय ने लील लिया तो गांव में बचे है सिर्फ आंसू।

और अब इन आंसूओं को भी सरकार से ही आस है उसी सरकार से जिसने पर्यटकों के लिए, तीर्थ करने के लिए या फिर इन क्षेत्रों में पहुँचने के लिए सड़कों का जाल बिछाया  है। लेकिन यह नहीं देखा कि  ये सड़कें ऐसे क्षेत्र में बनाई जा रही हैं जहां दरारें होने के कारण भू-स्खलन होते रहते हैं। भू-स्खलन के मलबे को काटकर सड़कें बनाना आसान और सस्ता होता है। इसलिए तीर्थ स्थानों को जाने वाली सड़कें इन्हीं मलबों पर बनी हैं। ये मलबे अंदर से पहले से ही कच्चे थे। ये राख, कंकड़-पत्थर, मिट्टी, बालू से बने होते हैं। ये अंदर से ठोस नहीं होते। लेकिन सरकार, राजनेता, इंजिनियर, ठेकेदार सभी ने आसान रास्ता बना कर मौत को ही आसान कर दिया।

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जबकि इंजीनियरों को चाहिए था कि वे ऊपर की तरफ़ से चट्टानों को काटकर सड़कें बनाते। उसमें मुश्किल आती क्योंकि  चट्टानें काटकर सड़कें बनाना आसान नहीं होता। यह काफी महँगा भी होता है यानी कमाई नहीं होती लेकिन जिन्दगी मजबूत होती। लेकिन इंजीनियरों ने इन सड़कों को बनाते समय बरसात के पानी की निकासी के लिए समुचित उपाय तक नहीं किया। उन्हें नालियों का जाल बिछाना चाहिए था  रपट्टा की जगह पुल बनने चाहिए जिससे बरसात का पानी। अपने मलबे के साथ स्वत्रंता के साथ बह सके। लेकिन कुछ नहीं किया गया। इसके उलट  पर्यटकों से कमाई के कारण दुर्गम इलाकों में होटल खोलने की इजाजत सरकार ने दी तो  रईसों के लिये बालकोनी खोल कर नदी और खुली हवा का मजा लेने का धंधा पैदा किया गया। ये सभी निर्माण समतल भूमि पर बने जो मलबों से बना थी।  नदी ने मलबों को बहाया तो जिन्दगी बह गयी।

और इस दौर में वहा तक किसी बचाववाले की नजर अभी तक गई नहीं है क्योंकि यह लोग बाहर से आकर फंसे नहीं हैं बल्कि यही रहते हुये कभी पेड को बचाने के लिये चिपको आंदोलन तो कभी अलग और अपना राज्य बनाने के लिये संघर्ष कर चुके हैं। लेकिन अब इनके हाथ और हथेली दोनों खाली हैं। बावजूद सबके  इन्हें यही रहना है। जो दुनिया के मानचित्र में सबसे भयावह प्रकृतिक विपदा का ग्राउड जीरो बन चुका है।

पुण्य प्रसून बाजपेयी

लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं

(साभार ब्लाग)

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