Thursday, September 2, 2021

भावनाएं ही कमजोर और बलवान बनाती हैं: श्री श्री

resizedimage (13)लखनऊ ।। (प्रस्तुति-डीडीसी न्यूज़ नेटवर्क) ।। ज़्यादा ज़रूरी क्या है- वस्तुएँ, इन्द्रियाँ, मन या बुद्धि? इन्द्रिय के साधन से इन्द्रियाँ अधिक ज़रूरी हैं। टेलीविज़न से तुम्हारी आँखें अधिक ज़रूरी हैं, संगीत या ध्वनि से तुम्हारे कान अधिक ज़रूरी हैं। स्वादिष्ट खाद्य पदार्थों या आहार से जिह्वा अधिक ज़रूरी है। हमारी त्वचा, जो भी कुछ हम स्पर्श करते हैं उससे अधिक ज़रूरी है।

लेकिन मूर्ख सोचते हैं कि इन्द्रिय सुख देनेवाली वस्तुएँ इन्द्रियों से अधिक ज़रूरी हैं। उन्हें मालूम है कि अत्यधिक टीवी देखना आँखों के लिए अच्छा नहीं है, फिर भी वे परवाह नहीं करते और लंबे समय के लिए टेलीविज़न देखते रहते हैं। उन्हें मालूम है उनकी शरीर प्रणाली को अत्यधिक खाना नहीं चाहिए, लेकिन वे शरीर से आहार को अधिक महत्व देते हैं।बुद्धिमान वह है जो इन्द्रियों की तुलना में मन की ओर अधिक ध्यान देता है। यदि मन का ध्यान नहीं रखा, केवल इन्द्रिय सुख के साधन व इन्द्रियों पर ही ध्यान रहा, तो तुम अवसाद में उतर जाओगे। वस्तुओं के प्रति तुम्हारी लालसा तुम्हारे मन से अधिक आवश्यक हैं।

तुम्हारी बुद्धि, बुद्धिमता मन से परे है। यदि तुम केवल मन के अनुसार चलोगे तो तुम डांवाडोल स्थिति में रहोगे। जीवन में तुम्हारी कोई प्रतिबद्धता नहीं रहेगी तुम और भी दुखी हो जाओगे। जो वस्तु मन की इस प्रकृति को मिटा सकती है, वह है अनुशासन। तुम्हारा मालिक तुम पर दबाव डालता है, तुम्हें इतने दिन काम करना है, सप्ताह के पांच दिन। यदि ये दबाव न हो, तो तुम कभी काम नहीं करोगे।बुद्धि मन से अधिक ज़रूरी है क्यूंकि बुद्धि ज्ञान की मदद से निर्णय लेती है। कहती है: “ये अच्छा है, ये करना चाहिए, ये नहीं करना चाहिए।” जो  बुद्घिमान बुद्धि का अनुसरण करेंगे, मन का नहीं। बुद्धिमता ये है कि तुम भावनाओं की परवाह नहीं करते क्योंकि वे हमेशा बदलती रहती हैं। लोग बैठ कर कहते रहते हैं, “ओह, मुझे अच्छा लग रहा है, ओह, मुझे बुरा लग रहा है, मुझे ऐसा लग रहा है, मुझे वैसा लग रहा है।” तुम अपने लिए नरक बना लेते हो।

तुमने भूतकाल में कुछ लोगों को दुखी किया है और वह दुःख तुम अभी अनुभव कर रहे हो। इस अनुभव को झेलो, उससे भागो मत। जीवन प्रतिबद्धता से चलता है। तुम्हारा जीवन इस ग्रह पर किसी कल्याणकारी हेतु के लिए समर्पित है। ये तुम में निर्भयता, ताक़त, शांति, स्थिरता, जोश, सब कुछ तुम्हारे भीतर से बाहर ले आता है।

औरों की चिंता करो, भावनाओं की ज़्यादा परवाह मत करो। किसी भी बात के लिए विलाप करके बैठे मत रहो। इस संसार की कोई भी वस्तु की कीमत तुम्हारे आंसुओं के बराबर नहीं है। अगर तुम्हें आंसू बहाने ही हैं, तो वे कृतज्ञता के, विस्मय के, प्रेम के  मीठे आंसू होने चाहिए। निरर्थक बात के लिए रोना उचित नहीं है। हमारा जीवन इसके लिए नहीं बना है। हमें यह समझना चाहिए।किसी पद में लिखा है कि चन्दन को जितना घिसा जाए, उस में से उतनी ही अधिक सुगंध उभरती है, सोने पर जितनी चोट लगाई जाए, वह उतना ही अधिक चमकता है, गन्ने को जितना अधिक निचोड़ा जाए, उस में से उतना ही अधिक मीठा रस निकलता है। जीवन को ऐसे रखना चाहिए- एक एकीकृत, सम्पूर्ण व्यक्तित्व की निशानी ये प्रतिबद्धता है- “मैं ये करूंगा, चाहे कुछ भी हो जाए।”

तुम्हारी भावनाएं तुम्हें कमज़ोर बनातीं हैं और यही तुम्हें सशक्त बनातीं हैं। जब तुम्हारी भावनाएं सकारात्मक हों तो वे तुम्हें सत्य, सूक्ष्म और कोमलता के प्रति संवेदनशील बनाती हैं और गहरे ध्यान में ले जाती हैं। लेकिन वही भावनाएं जब रुखी हों, तुम्हारे मन और शरीर को नष्ट कर देती हैं। भावना तुम्हारी शत्रु और मित्र दोनों हैं। वह भावना जो तुम्हें भीतर से कोमल बनाए, वह तुम्हारी मित्र है, जो भावना तुम्हें भीतर से रुखा बना दे, तुम्हारी शत्रु है। यदि तुम में कोई भावना नहीं हैं, तो तुम एक मरे हुए चिथड़े जैसे हो और तुम में दिव्य प्रेम नहीं खिल सकता।

सभी भावनाएं लोगों, वस्तुओं और घटनाओं से जुडी हुई हैं। वस्तुओं, लोगों और संबंधों को पकड़े रहने से मुक्ति, मोक्ष में बढ़ आती है। जब मन सभी प्रभावों और धारणाओं से मुक्त हो, तभी तुम मुक्त हो। जब तुम जान लो कि सभी संबंध, लोग, शरीर, भावनाएँ बदल रहे हैं- अचानक वो मन जो दुःख को पकड़े हुए है, लौट कर स्वयं के पास आ जाता है। मेरे से मैं की वापसी, तुम्हें दुःख से संतोष और मुक्ति दिलाती है। जब हम अपनी भावनाओं की परवाह नहीं करते और भावनाओं की चिंता नहीं करते, तब हम ज्ञान में अधिक स्थापित होते हैं। और ज्ञान में स्थापित हो कर तुम आत्मा की ओर जाते हो। आत्मा शांति, आनंद, प्रेम, शक्ति और सब कुछ है।

स्रोतः आर्ट ऑफ लिविंग

श्री श्री रविशंकर परिचय

मानवीय मूल्यवादी, शांतिदूत और आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रवि शंकर, का जन्म 13 मई 1956 को तमिलनाडु के पापानासम में हुआ था। इनके पिता आरएसवी रत्नम ने इनकी आध्यात्मिक रुचि को देखते हुए इन्हें महर्षि महेश योगी के सान्निध्य में भेज दिया। महर्षि के अनेकों शिष्यों में से रवि उनके सबसे प्रिय थे। 1982 में रवि शंकर दस दिन के मौन में चले गए। कुछ लोगों का मानना है कि इस दौरान वे परम ज्ञाता हो गए और उन्होंने सुदर्शन क्रिया (श्वास लेने की तकनीक) की खोज की।

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