Thursday, September 2, 2021

भावनाओं के चादर में राजनीति

लखनऊ। (डीडीसी न्यूज़ नेटवर्क) । राजनीति अब भावनाओं का खेल बनता जा रहा है। नेता अपने आपको जनता से जुड़े होने की प्रमाणिक्ता के लिए नए नए सिगूफें निकाल रहे हैं । राहुल गांधी पार्टी ने कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बनाए जाने पर सत्ता को जहर की संज्ञा दे दी तो सोनिया भावुक हो कर राहुल को सीख देती नज़र आईं। अगर राहुल गांधी को पार्टी का उपाध्यक्ष बनाए जाने को एक हादसा कहें तो इस हादसे को 24 घंटे भी नहीं भूले थे कि लखनऊ में भाजपा ने कल्याण की अगुवानी कर एक अटल संदेश देने की ऐसी कोशिश की कि कल्याण मंच पर ही आंसू छलकाने का मौका पा गए। कल्याण भावुक हुए और बोले अब बाकी जीवन यहीं पर बीतेगा। लेकिन कल्याण ने अगामी एक साल तक अपने आपको भाजपा में शामिल न होकर संसदीय सीट से बचा लिया। कल्याण सिंह में भाजपा भले ही संजीवनी बूटी लाने वाले हनुमान जी की तस्वीर देख रही है लेकिन मंच पर कल्याण को बोल और तौर तरीकों से ऐसा लगा कि कल्याण के करिश्मे को लेकर भी कन्फ्यूजन में हैं। वे खुद भाजपा में शामिल नहीं हुए लेकिन संबोधन में कहा कि मेरी इच्छा है कि दुनिया छोड़ते समय मेरी अर्थी भी भाजपा के झंडे में लिपटकर जाए परमात्मा ने मेरी सुन ली है

भाजपा को कल्याण के साथ ही राम भी याद आए। विनय कटियार कहते हैं कि अब जय श्रीराम नारे के साथ पार्टी आगे बढ़ेगी। यह नारा लेकर पूरा प्रदेश घूमा जाएगा और चुनाव जीता जाएगा। लोकसभा चुनाव को देखते हुए कांग्रेस और भाजपा जनता और कार्यकर्ताओं के साथ भावनात्मक खेल खेलना चाहते हैं। हर मोर्चे पर फेल हो चुके राहुल गांधी अब कद और पद से जनाधार पैदा करना चाहते हैं। लेकिन राहुल की प्रोन्नति के साथ ही अब युवाओं को मौका मिलेगा या दिखावा का ढ़ोंग कर बूढ़े और बातूनी नेताओं को ही मौका मिलेगा ये देखना अहम होगा। राहुल ने बीते कई राज्यों के विधानसभा चुनाव में क्या कुछ किया इसे हर कोई जानता है। राहुल की छवि को मीडिया ने बनाया है न कि राहुल के करिश्मे ने। ये अलग बात है कि राहुल गांधी मीडिया से दूर ही भगते हैं और लोगों को लुभाने की कोशिश करते करते ऐसा कुछ कर जाते हैं कि वही ख़बर बन जाती है।

राहुल गांधी भले ही अपने आपको राजशाही खानदान का युवराज कहने से ख़तरा महशूस करते हों लेकिन हकीकत में वो युवराज होने के एहसास को छोड़ नहीं पाए हैं। तभी तो आम जनता दामिनी के नाम पर हंगामा करती है लेकिन राहुल दिखाई नहीं देते। अन्ना आंदोलन करते हैं राहुल गायब रहते हैं। जवान का सिर काट दिया जाता है लेकिन राहुल ऑफिस से बाहर नहीं निकलते। सवाल ये है कि देशव्यापी धरना-प्रदर्शन, पुतला फूंकने का ऐलान, माफी मांगने, और भावनात्मक ऐलान ने ही राजनीति की चादर
ओढ़ ली है। आख़िर ऐसा कब तक होगा। कब जागेंगे हम और बंद होगा भावनाओं से खिलवाड़।
  

 

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