Tuesday, September 7, 2021

महंगाई का असर रैलियों पर नहीं

resizedimageलखनऊ।।डीडीसी न्यूज़।।महंगाई भले ही आम आदमी की कमर तोड़ रही है और सियासी दल इसे मुद्दा बना रहे हैं, लेकिन इसका दूसरा पहलू ये भी है कि जहां महंगाई से आम आदमी परेशान हैं, दो जून की रोटी नहीं जुटा पा रहा है, मनरेगा के लिए सरकार के पास बजट कम पड़ जा रहा है और छात्रों की स्कॉलरसिप समाज कल्याण समय पर दे ही नहीं पा रहा है वहीं सियासी दलों की रैलियों पर इसका असर नहीं पड़ रहा है। रैलियों की संख्या और उस पर होने वाला खर्च बहुत तेजी से बढ़ा है। चुनाव आयोग ने भी इस खर्च पर लगाम लगाने से हाथ खड़े कर दिए हैं।

बीजेपी के पीएम कैंडिडेट नरेंद्र मोदी की दिल्ली चुनाव से ठीक पहले होने वाली छह रैलियों के लिए पैसे कौन खर्च कर रहा है, अभी इसका फैसला नहीं हो पाया है। बीजेपी नेता हर रोज रैली की तैयारियों को लेकर मीटिंग कर रहे हैं, लेकिन अब तक यह तय नहीं हुआ है कि रैली में होने वाला खर्च कौन उठाएगा, पार्टी उठाएगी या पार्टी का प्रत्याशी उठाएगा इसका भी खुलासा पार्टी नहीं करना चाहतीं हैं। हालांकि प्रवक्ता विजय बहादुर पाठक बताते हैं कि पार्टी एक संगठन है और उसके एक एक पैसे का आडिट होता है। बीजेपी अभी तक 30 नवंबर और 1 दिसंबर को होने वाली रैली के लिए खर्च का अनुमान लगाने में ही लगी है। कांग्रेस के राहुल गांधी की रैलियों में कितना खर्च आता है इसे कोई भी बताने को तैयार नहीं है। हां इतना तो तय है कि बीते लोकसभा चुनाव से अधिक खर्च होना तय है क्यों कि महंगाई बढ़ी है और डीजल-पेट्रोल के दाम भी बढ़े हैं।

समाजवादी पार्टी भले ही लोहिया के विचारों पर चलने का दावा करती है लेकिन पार्टी की रैलियों और प्रदर्शनों में कहीं भी समाजवाद नहीं बल्कि पूंजीवाद दिखाई देता है। नेता महंगी गाड़ियों से महंगी कंपनी के जूते और जैकेट पहन कर ऐसे चलते हैं कि रोड पर चल रहा आम आदमी सलाम करने की हिम्मत भी नहीं कर पता है। मुलायम सिंह की बरेली और आजमगढ़ की रैलियों का कोई हिसाब नहीं है। प्रदेश की टूटती सड़कों को लेकर केंद्र सरकार पर आए दिन ठीकरा फोड़ने वाले शिवपाल यादव भी यह भूल रहे हैं कि चुनाव से पहले या चुनाव के बाद सदन में सड़कों को दुरुस्त करवाने का वादा उन्होंने अपनी सरकार के भरोसे किया था या केंद्र सरकार के भरोसे।

 आजकल सरकार में या सरकार के बाहर किसी भी सियासी दल में कुछ हो रहा है तो वह है रैली और जश्न। हर कोई रैली और प्रदर्शन से ही वोटरों को लुभाने की ठान ली है। सियासी दलों ने मान लिया है कि इसी से वोट और सत्ता मिलती है। चुनाव आयुक्त उमेश सिन्हा भी रैलियों के खर्च पर कार्रवाई को लेकर असहाय हैं। उनका कहना है कि मुद्दा तो गंभीर है लेकिन आचार संहिता लागू होने के बाद ही आयोग कुछ कर सकता है।  

 

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