Friday, September 3, 2021

महिलाओं को सुरक्षा चाहिए तो क्या करें ?

resizedimage llतकरीबन एक साल से देश के जनमानस को कई मसले समय-समय पर झकझोरते रहे हैं, लेकिन कुछ दिनों के हंगामे के बाद सब कुछ अपनी पुरानी लीक पर लौट जाता है। फिलहाल दिल्ली में हुआ बलात्कार कांड लोगों के जनमानस पर हावी है, लेकिन कुछ दिन में वह भी इसी अंजाम पर पहुंच जाएगा। इसकी वजह सिर्फ यही है कि लोगों के लिए अपनी रोजमर्रा की जिंदगी को आगे बढ़ाते रहना भी एक बड़ा मसला है। ऐसी चीजों के लिए जो कदम सुझाए जाते हैं, वे अक्सर समस्या के मूल कारण तक नहीं पहुंचते। इसके लिए अभी तक जो भी कदम उठाए गए हैं, वे ‘अबला’ की रक्षा भर के लिए हैं। इन प्रयासों में यह कोशिश कहीं नहीं है कि महिलाओं का सशक्तीकरण इस तरह से किया जाए कि उन्हें ‘अबला’ कहने के हालात ही न रह जाएं।
लंबे समय तक काम आने वाला महिलाओं के सशक्तीकरण का अकेला तरीका है, उनका आर्थिक सशक्तीकरण। दूसरे शब्दों में कहें, तो हमें अगर दीर्घकाल के लिए संरचनात्मक बदलाव लाने हैं, तो महिलाओं के हाथों में ज्यादा संपत्ति को सौंपना होगा। यह कई अध्ययनों से भी साबित हुआ है कि जिन समाजों में लैंगिक विभिन्नता बराबरी के स्तर की होती है, वे न सिर्फ ज्यादा सुरक्षित होते हैं, बल्कि आर्थिक तौर पर भी तरक्की करते हैं। ऐसे राज्य, जहां कामकाजी महिलाओं के संख्या ज्यादा है, वे लगभग हर पैमाने पर बेहतर स्थिति में हैं। भारत जैसे देश में महिलाओं के सामने तीन गुनी अधिक बाधाएं हैं। सबसे पहले तो जन्म लेने के अधिकार में ही उनके साथ भेदभाव होता है। भ्रूण की अवस्था में ही भारतीय समाज उनकी हत्या में जुट जाता है। अगर वे खुशकिस्मत हुईं और किसी तरह इससे बच गईं, तो ज्यादा आशंका यही रहती है कि वे अपने जैसे लड़कों की तुलना में ज्यादा कुपोषित होंगी।
इसके बाद का भेदभाव आता है शिक्षा के स्तर पर। पढ़ाई बीच में ही छोड़ देने वाली लड़कियों की संख्या लड़कों के मुकाबले कई गुना तक ज्यादा होती है। जो लड़कियां इस बाधा को भी किसी तरह पार कर जाती हैं, उनके लिए कहीं बड़ी चुनौती काम की जगह पर खड़ी होती है। विडंबना यह है कि ग्रामीण और शहरी मजदूरों में महिलाओं और पुरुषों की संख्या लगभग बराबर है, लेकिन महिलाओं को पुरुषों के मुकाबले मजदूरी काफी कम मिलती है। शहरी और अर्ध-शहरी हालात में यह समस्या और भी बड़ी हो जाती है। हालांकि अध्यापन और बैंकिंग जैसे क्षेत्रों में महिलाओं की संख्या ठीकठाक है, लेकिन उत्पादन जैसे क्षेत्र में उनकी संख्या न के ही बराबर है। ऐसे क्षेत्रों को उनसे दूर ही रखा जाता है। बेटी के लिए पोषण और छात्रवृत्ति जैसी योजनाएं इस दिशा में एक भूमिका निभाती हैं, लेकिन यह भी जरूरी है कि शहरी और अर्ध-शहरी कार्यबल में महिलाओं की संख्या बढ़ाने के लिए योजनाबद्ध ढंग से अवसर पैदा किए जाएं। यही वह जगह है, जहां निजी क्षेत्र की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है।
यहां हम उन कुछ तरीकों की चर्चा करेंगे, जिनसे यह काम किया जा सकता है। अलग-अलग क्षेत्र के हिसाब से निजी कंपनियों को एक निश्चित समयावधि के लिए महिलाओं का प्रतिनिधित्व बढ़ाने हेतु प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। ये प्रोत्साहन करों में रियायत के रूप में भी हो सकते हैं और ब्याज दरों में कमी के रूप में भी। काम की जगहों में शिशु देखभाल केंद्र की स्थापना, काम के समय में थोड़ी रियायत और घर से ही काम करने की सुविधा जैसी चीजों से महिला कर्मचारियों की संख्या को रातोंरात बढ़ाया जा सकता है। इन्हीं सब सुविधाओं का अभाव अभी बहुत-सी महिलाओं को काम के लिए जाने से रोकता है। कंपनियां बहुत-सी चीजों की ब्रांडिंग इस तरह से कर सकती हैं, जिसमें यह दिखाया जाए कि अमुक चीज महिलाओं द्वारा तैयार की गई है। अगर उत्पादों पर इस तरह की लेबलिंग होती है, तो बहुत से लोग ऐसे उत्पाद ही खरीदना पसंद करेंगे, जो महिलाओं द्वारा तैयार किए गए हों। ऐसा कदम प्रतिस्पद्र्धी कंपनियों में महिला कर्मचारियों की संख्या को बढ़ा सकता है।
लैंगिक न्याय की ऐसी कोशिशों को कंपनियां कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसबिलिटी की तरह भी पेश कर सकती हैं। लेकिन इस तरह से कि उसमें खैरात का भाव न हो, बल्कि एक व्यावसायिक रणनीति हो। इससे निवेशकों की भी ऐसी कंपनियों में दिलचस्पी बढ़ेगी। बदकिस्मती से फिलहाल जो सोच है, वह उलटी दिशा में जाती है। बलात्कार और उत्पीड़न की हर घटना के बाद आम प्रतिक्रिया यही होती है कि एक निश्चित समय के बाद महिलाओं से काम न करवाया जाए या उन्हें घर तक छोड़ आने के इंतजाम किए जाएं। ऐसे फैसलों के पीछे नीयत चाहे जितनी भी अच्छी हो, मगर महिला कर्मचारी पर होने वाला कंपनी का खर्च बढ़ जाता है और दीर्घकाल के हिसाब से देखें, तो अंत में यह महिला कर्मचारियों की संख्या को कम करने का काम ही करता है।
हर उपभोक्ता निजी तौर पर यह महसूस नहीं करता कि ऐसी हर घटना की उसे क्या कीमत चुकानी पड़ती है। अब हम देखेंगे कि यह कैसे होता है। आदर्श व्यावसायिक माहौल में तीसरी और चौथी श्रेणी के शहर यानी कस्बों में शिक्षा हासिल करने वाला युवा प्रथम श्रेणी के शहर में रोजगार हासिल करता है। इस तरह से उसके कस्बे में उसकी पढ़ाई और लालन-पालन में जो खर्च हुआ था, वह उससे कई गुना ज्यादा कमाई करता है। लेकिन जब इस तरह की घटना घटती है, तो अभिभावक अपने बच्चों खासकर बच्चियों को प्रथम श्रेणी के शहरों में भेजने से हिचकते हैं। उनका डर वाजिब भी होता है। इससे वह प्रक्रिया टूटती है, जिसमें हम कम लागत में प्रतिभा को तैयार करके उसे अधिक गुणवत्ता वाले काम में इस्तेमाल करते हैं।
इसके साथ ही सुरक्षित ट्रांसपोर्टेशन जैसे दूसरे खर्च भी जुड़ जाते हैं। इन सारे बढ़े हुए खर्चो का भार अंत में उपभोक्ता पर ही पड़ता है। देश की आधी आबादी की रक्षा करना हमारी राष्ट्रीय और निजी जिम्मेदारी है। इस जिम्मेदारी को महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण से ही पूरा किया जा सकता है। अगर हम महिलाओं की भागीदारी को बेहतर आर्थिक फैसले के रूप में नहीं पेश करेंगे, तो इसे या तो खैरात माना जाएगा या लागत का बढ़ना। (ये लेखक के अपने विचार हैं) सा.दै.हिदुस्तान

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