Tuesday, September 7, 2021

मीडिया की ताकत कहां ?

resizedimage (14)समय से संवाद –

आज समाज में विश्वास का संकट है। हर संस्था या इससे जुड़े लोग अपने कामकाज के कारण सार्वजनिक निगाह में हैं। इसलिए मौजूदा धुंध में मीडिया को विश्वसनीय बनने के लिए अभियान चलाना चाहिए। इस दिशा में पहला कदम होगा, ईमानदार मीडिया के लिए नया आर्थिक मॉडल, जिसमें मुनाफा भी हो, शेयरधारकों को पैसा भी मिले, निवेश पर सही रिटर्न भी हो और यह मीडिया व्यवसाय को भी अपने पैरों पर खड़ा कर दे। यह आर्थिक मॉडल असंभव नहीं है।

मीडिया की ताकत क्या है? अगर मीडिया के पास कोई शक्ति है, तो उसका स्रोत क्या है? क्यों लगभग एक सदी पहले कहा गया कि जब तोप मुकाबिल हो, तो अखबार निकालो? सरकार को संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। न्यायपालिका अधिकारों के कारण ही विशिष्ट है। विधायिका की संवैधानिक भूमिका है, उसे संरक्षण भी है। पर संविधान में अखबारों, टीवी चैनलों या मीडिया को अलग से एक भी अधिकार है? फिर मीडिया का यह महत्व क्यों ? जिसके पीछे सत्ता है, जिसे कानूनी अधिकार मिले हैं, सीमित-असीमित, वह तो समाज में सबसे विशिष्ट या महत्वपूर्ण है ही, पर मीडिया के पास तो न संवैधानिक अधिकार है, न संरक्षण। फिर भी उसे लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहा जाता है। क्यों ? मीडिया के पास महज एक और एक ही शक्ति स्रोत है। वह है उसकी साख। मीडिया का रामबाण भी और लक्ष्मण रेखा भी। छपे पर लोग यकीन करते हैं। लोकधारणा है कि शब्द, सरस्वती के प्रसाद हैं। सरस्वती देवी, विद्या, ज्ञान की देवी या अधिष्ठात्री हैं। वे सबसे पूज्य, पवित्र और ईश्वरीय हैं। ज्ञान का संबंध जीवन के प्रकाश (सच, तथ्यपूर्ण, हकीकत, यथार्थ वगैरह) से है, अंधेरे (झूठ, छल, प्रपंच, छद्म वगैरह) से नहीं। सरस्वती हमारे मानस में प्रकाश की, ज्ञान की, मनुष्य के अंदर जो भी सर्वश्रेष्ठ-सुंदर है, उसकी प्रतीक हैं। इसलिए छपे शब्द, ज्ञान या प्रकाशपुंज के प्रतिबिंब हैं। इसलिए हमारे यहां माना गया है कि छपे शब्द गलत हो ही नहीं सकते। सरस्वती के शब्दों पर तिजारत नहीं हो सकती। यही और यही एकमात्र मीडिया की ताकत है। शक्ति- स्रोत है। लोग मानते हैं कि जो छपा, वही सही है। टीवी चैनल, रेडियो, इंटरनेट, ब्लाग्स वगैरह सब इसी प्रिंट मीडिया’ (छपे शब्दों) के एक्सटेंशन’ (विस्तार) हैं। इसलिए इनके पास भी वही ताकत या शक्ति-स्रोत है, जो प्रिंट मीडिया के पास थी।

इस तरह, मीडिया के पास लोक साख की अपूर्व ताकत है। यह संविधान से भी ऊपर है। इसलिए संविधान के अन्य महत्वपूर्ण स्तंभ (जिन्हें संवैधानिक अधिकार प्राप्त हैं) भी मीडिया की इस अघोषित साख के सामने झुकते हैं। न चाहते हुए भी उसकी ताकत-महत्व को मानने-पहचानने के लिए बाध्य हैं। पर, मीडिया जगत को महज अपनी असीमित ताकत, भूमिका और महत्व का ही एहसास है, लक्ष्मण रेखा का नहीं। और लक्ष्मण रेखा के उल्लंघन का बार-बार अवसर नहीं मिलता! यह लोक जीवन का यथार्थ है। मीडिया अपनी एकमात्र पूंजी साख को बार-बार दावं पर लगाने लगे, तो क्या होगा? दावं पर लगाने के लिए फिर कोई दूसरी पूंजी नहीं है। ‘91 के उदारीकरण के दोनों असर हुए, अच्छे व बुरे भी। जीवन-देश के हर क्षेत्र में। मीडिया में भी। 1991 से ही शुरू हुई, पेज-थ्री संस्कृति। यह नयी बहस कि मीडिया का काम मनोरंजन करना है और सूचना देना भर है। इसी दौर में मीडिया में बड़ी पूंजी आयी, नौकरी की शर्तें बेहतर हुईं, पर यह सिद्धांत भी आया कि अब यह शुद्ध व्यवसाय है। विज्ञापन का व्यवसाय। खबरों का धंधा। इसका मकसद भी अधिकतम मुनाफा’ (प्राफिट मैक्सिमाइजेशन) है। 1991 के उदारीकरण के बाद नया दर्शन था, हर क्षेत्र में निवेश पर कई गुणा रिटर्न या आमद यानी प्राफिट मैक्सिमाइजेशन। पर, जीवन के यथार्थ कुछ और भी हैं। जैसे रेत से तेल नहीं निकलता। उसी तरह मीडिया व्यवसाय में भी नैतिक ढंग से, वैधानिक ढंग से, स्वस्थ मूल्यों के साथ अधिकतम वैधानिक कमाईकी सीमा थी। चाहे प्रिंट मीडिया हो या न्यूज चैनल या रेडियो वगैरह।

* तब शुरू क्या हुआ ?

साख से सौदेबाजी। अपनी एकमात्र नैतिक ताकत की नीलामी! हुआ तो बहुत कुछ है, पर इसके पहले बताते चलें कि हो क्या सकता था? ईमानदारी से मीडिया के धुरंधर और बड़े लोग कोशिश करते कि मीडिया का ईमानदार आर्थिक मॉडलढ़ूंढ़ा जाये। इसके रास्ते थे, बड़ी तनख्वाहों पर पाबंदी लगती या कटौती होती। अखबारों की कीमतें बढ़ायी जातीं। समाज को बताया जाता कि ईमानदार मीडिया चाहते हैं, तो अखबार की अधिक कीमत देनी पड़ेगी। मुफ्त अखबार (दो-तीन रुपये में) चाहिए और ईमानदार पत्रकारिता, यह संभव नहीं। पाकिस्तान के अखबार आज भारत के अखबारों से काफी महंगे है, पर वे बिकते हैं। यह उल्लेख करना सही होगा कि पाकिस्तान की मीडिया ने वहां के तानाशाहों के खिलाफ जो साहस दिखाया, वह साहस तो भारत में है ही नहीं। वह भी भारतीय लोकतंत्र के अंदर। फिर भी गरीब पाकिस्तानी अधिक कीमत देकर अपनी ईमानदार मीडिया को बचाये हुए है। लेखक-हरिवंश जी (साभार-प्र.ख़)

 

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