Monday, September 6, 2021

मुगालते में नेता और सीमा पर हरकत

dfजब कारगिल युद्ध में घुसपैठियों को हमारी सेना जवाब दे रही थी उसी दौरान की बात है।  टेलीफोनिक वार्ता के दौरान तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन ने प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपयी से कहा था, कि आप न्यूयार्क आए हम यहां पर टी पार्टी का आयोजन कर रहे हैं, जिसमें हम आपकी और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री से बात कर सुलह करवाने की कोशिश करेंगे। तब प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने कहा था जिस देश की सेना सीमा पर लड़ रही हो उस देश का प्रधानमंत्री टी पार्टी मनाने नहीं जाएगा।

दूसरा वकया भी देख लीजिए पोखरण परमाणु परीक्षण के बाद जब अमेरिका ने भारत पर प्रतिबन्ध लगाया तो अटल बिहारी वाजपेयी ने उल्टा अमेरिका पर प्रतिबन्ध लगा कर उनका बाजार बंद कर दिया था। लेकिन आज हालात इस कदर खराब हो रहे हैं कि जवानों का शरीर सरहद पर मिलता है तो सिर गायब रहता है, इसके बाद भी हमारी सरकार का के कानों पर जू नहीं रेंगती।

पाकिस्तान में कैदी पर हमला होता है तो सरकार मौन हो जाती है और चीन कई किलोमीटर देश के अंदर कब्जा कर लेता है तो देश की सबसे बड़ी पार्टी कांग्रेस जिसकी केंद्र में भी सरकार है, कर्नाटक में चुनाव को तवज्जों देती है, प्रधानमंत्री कर्नाटक में चुनावी प्रचार-प्रसार करते हैं, वोट मांगते हैं, सत्ता की चाभी मांगते हैं !, लगता है देश में सत्ता ही सबकुछ है । देश किसी एक पार्टी या किसी एक नेता का नहीं है इसके बाद भी इस देश को लूटने और शर्मसार करने का खेल खेला जा रहा है। चीन के मसले पर केंद्र सरकार इस कदर फेल है कि हालात बिगड़ रहे हैं, न तो हम चीन के सामानों को देश में आने और बिकने को लेकर कोई निर्णय कर पा रहे हैं और न ही सही संदेश दे पा रहे हैं कि हम वास्तव में कुछ करने का जज्बा रखते हैं।

कभी-कभी हमारे आजकल के युवा नेता ऐसे दिखावा करते हैं (चुनावी मेले में) कि जैसे वो सत्ता मिल जाए तो बहुत बड़ा इंकलाब ला देंगे, लेकिन सत्ता पाने के बाद पार्टी की विचारधारा और पद को ही बचाने में अपनी सारी शक्ति लगा देतें हैं। हम युवाओं की बात करते हैं पढ़े लिखे नौजवान नेताओं की बात करते हैं लेकिन अधिकतर देखा जा रहा है कि सबसे ज्यादा कायर और पैसे के पीछे भागने वाला युवा नेता ही है। इसकी वजह भी साफ है, ऐसे ही नहीं ये सब हो रहा है । जब हम वंशवाद, परिवारवाद, जातिवाद, धर्मवाद के खेत की फसल काटेंगे तो अनाज भी वैसा ही होगा । देश में 98 फीसदी युवा नेता ऐसे ही हैं जो विरासत में मिली सत्ता का मजा ले रहे हैं, सत्ता या राजनीति की परिभाषा इनके लिए चंद अंग्रेजी की लाइने, महंगी गाड़ियां और महंगे फोन हैंडसेट और दिखावा है। महंगी कोट और टाई इनकी पहचान है, विचारधारा के नाम पर वही जो पार्टी की विचारधारा है । तो फिर किस बात के ये युवा है ? ऐसे किताबी युवा नेताओं से बेहतर तो हमारे उम्र दराज हो चुके अनुभवी नेता हैं जो कम पढ़े हैं लेकिन गढ़ें तो ज्यादा हैं। यहां तो राष्ट्रपति और पूर्व राष्ट्रपति के बेटे ही चुनावी मैदान में बड़ी हस्ती होते हैं, जीतते भी हैं, राहुल गांधी से लेकर लालू प्रसाद यादव के बेटे तेजश्वी तक और सुप्रिया सुले से लेकर डिम्पल यादव तक के नेताओं से हम किस बदलाव और नेतृत्व की उम्मीद कर सकते हैं ? जिन्होंने सत्ता को विरासत की तिजोरी समझ ली ! देश में सत्ता के लिए घुड़दौड़ का जो सिलसिला चल रहा है, वह चीन में नहीं है।

यहां रेल मंत्री का भतीजा रेलवे में नौकरी लगवाने के लिए घूस के पैसों के साथ पकड़ लिया जाता है, मंत्री के बेटे और बेटियों को ही चुनाव में उम्मीदवार बना कर संसद और विधानसभा पहुंचा दिया जाता है तो क्या ऐसे ही युवाओं को हम युवा कह रहे हैं। पैसों की ताक़त ने मध्य और गरीब तबके के युवाओं के जोश को ठंडा कर दिया है, कमर की हड्डी तोड़ दी है तो इसकी वजह आज के नेताओं की चाल है। आज चीन और पाकिस्तान देश की अस्मिता के साथ भद्दा मजाक कर रहे हैं तो इसके लिए नाकाबिलों की सत्ता ही जिम्मेदार है।

अब्दुल कलाम जैसे वैज्ञानिक को आज देश पहचानता ही नहीं । दोबारा राष्ट्रपति बनाने के लिए देश की सबसे बड़ी पार्टी नाक भौं सिकोड़ने लगती है।  जिन्होंने भारत को आणविक शक्ति में समृद्धि किया, जिसने भारत को परमाणु शक्ति संपन्न बनाया, विश्व के तमाम जासूसी उपग्रह को फेल करने के यंत्र तैयार हुए, सारी दुनिया ने देखा, क्या आज की सरकार के लिए यह संभव हैं ?

20 दिन से चीन भारत में 20 किलोमीटर घुसपैठ कर कब्जा कर रहा है और हमारे नेता ये ही तय नहीं कर पा रहे हैं कि आखिर करना क्या है। पीएम कर्नाटक चुनाव में लगे हैं तो सरकार के बाकी मंत्री पार्टी का बचाव करने में। ऐसे हालात में देश को भारी खामियाजा भुगतना पड़ सकता। हमें मुगालते में नहीं रहना चाहिए, छोटी सी भूल देश की सेना और देशवासियों पर भारी पड़ सकती है । एक चिनगारी ही तो शोला बनकर पूरे वतन को जला डालती है। चीन यदि ऐसी हिमाकत कर रहा है तो इसे गंभीरता से लेना ही होगा। नहीं तो 1962 जैसे हालात कब पैदा होंगे इसे कह पाना मुश्किल है।

 

अखिलेश कृष्ण मोहन

(लेखक डीडीसी न्यूज़ एजेंसी के पत्रकार हैं।)

संपर्क-9554311493

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