Monday, September 6, 2021

मुलायम पर भरोसा कौन करेगा

resizedimage (2)लखनऊ।। अखिलेश कृष्ण मोहन ।। यूपीए पार्ट वन में मुलायम ने कांग्रेस के लिए जो कुछ किया उसे कांग्रेस ने दरिया में डाल दिया। यही वजह है यूपीए पार्ट टू में चार साल से अधिक का साथ निभाने वाले मुलायम अब और मुलायम नहीं पड़ना चाहते । कांग्रेस ने हकीकत में मुलायम और मायावती दोनों को यूज किया, चाहे वह जिस डंडे का डर हो, लेकिन दोनों की लगाम कांग्रेस ने अपने हाथों में ही रखी है। कभी सीबीआई का चाबुक दिखाकर तो कभी प्रदेश में विकास के पैकेज का लालच देकर । लेकिन मुलायम को भी अब लगने लगा है कि अब लड़ाई आर-पार की लड़नी होगी, अभी नहीं तो कभी नहीं, उम्र के इस पड़ाव में जब याददास्त साथ छोड़ रही हो और बेटा आगे बढ़ कर प्रदेश की बागडोर संभाल रहा हो और परिवार के एक दर्जन से अधिक लोग मंत्री, सांसद और विधायक हों इससे अच्छा मौका फिर आएगा इसकी उम्मीद मुलायम को भी कम ही है।

सियासत में काठ की हाड़ी बार-बार नहीं चढ़ाई जा सकती। सचिन तेंदुलकर की तरह मुलायम सिंह भी राजनीति के अंतिम दौर में पीएम बनना ही चाहते हैं । जिस तरह सचिन तेंदुलकर संन्यास लेने से पहले विश्वकप जीतना चाहते थे । सचिन तेंदुलकर ने भी विश्वकप जीतने से पहले कई बार कहा था कि विश्वकप जीतना उनके लिए कैरियर का एक सपना है, उसी तरह समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह भी मानते हैं कि पीएम बनना उनके जीवन का एक सपना है अब इस सपने को पूरा होने में उनके ही लालू प्रसाद यादव और शरद यादव एक बार विरोध कर चुके हैं लेकिन इस बार साथ देंगे या नहीं इसे बता पाना मुश्किल है। इस बार का लोकसभा चुनाव मुलायम के लिए कैरियर का फाइनल मैच है, लिहाजा मुलायम सिंह भी इस फाइनल मैंच में विश्वविजेता बनने की गणित बैठा रहे हैं और कांग्रेस से हमेशा नरम रहने वाले मुलायम अब कठोर हो रहे हैं।

मुलायम सिंह ने वाकई में त्याग किया है इससे इनकार नहीं किया जा सकता। भले ही इस त्याग में सियासी फायदा और नुकसान समाजवादी पार्टी को उठाना पड़ा हो। मुलायम ने कभी भी पिछड़ों की राजनीति हकीकत में की ही नहीं । उन्होंने हमेशा कुछ मुसलमानों और अपने परिवार को केंद्र में रखकर राजनीति की है। ये मुलायम सिंह का सौभाग्य और प्रदेश का दुर्भाग्य है कि देश को आठ-आठ प्रधानमंत्री देने वाला यूपी अपने ही प्रदेश को मुलायम का विकल्प नहीं दे पाया, और मुलायम अपनी ढपली आपनी राग बजाते रहे और जानता सुनती रही है। 22 सांसदों के साथ मुलायम सिंह सुर बदल रहे हैं लेकिन विपक्ष और सत्ता पक्ष दोनों जानते हैं कि मुलायम ने कभी भी ऐसा कदम नहीं उठाया है जिससे वो कोई नया समीकरण खड़ा कर सकें। जो नेता राष्ट्रपति चुनाव के दौरान ममता बनर्जी के साथ मिलकर मीडिया में तूफान खड़ा करने के बाद ऐसे बदल गया कि ममता की अकेले ही फजीहत हुई और ममता बनर्जी ही नहीं कई ऐसे नेताओं को भी धक्का लगा जो मुलायम को समझदार नेता मानते रहे हैं। मुलायम सिंह तीसरा मोर्चा बनाने की कवायद शुरू करने का शिगूफा छोड़ रहे हैं, लेकिन उनके साथ कौन खड़ा है ये वे क्यों नहीं बताते। चार साल तक कांग्रेस के साथ गलबहिया करने वाले मुलायम कभी भी चुनाव होने के संकेत तो दे रहे हैं लेकिन तीसरे मोर्चे में उनके साथ कौन खड़ा है ये बताना मुलायम के बस से बाहर है क्यों कि मुलायम किसी का भी भरोसा जीतने में नाकाम रहे हैं। मुलायम के खास माने जाने वाले बाबा रामदेव भी अब कह रहे हैं कि तीसरा मोर्चा असंभव है।

पिछड़ों की नौकरियों के प्रमोशन में आरक्षण का विरोध कर मुलायम बड़ा मुद्दा छेड़ चुके हैं। मुलायम को अगड़े तो नेता मानते ही नहीं अब पिछड़ों के भी नेता मुलायम सिंह नहीं है। मुलायम एक पेंडुलम की तरह हैं जो कभी भी किसी भी तरफ जा सकते हैं, उसकी कोई दिशा नहीं है। कभी नारायण दत्त तिवारी का अति सत्कार करते हैं तो कभी आडवाणी की तारीफों के पुल बांधते हैं। पिछड़ों की राजनीति करने वाले मुलायम अब अगड़ों के सियासी दलदल की ओर बढ़ रहे हैं। जहां से वापस लौटना मुश्किल है।

मुलायम सिंह के हाथ अब आम चुनाव के सिवाय कुछ भी बोलने को नहीं है। क्यों कि कांग्रेस हरियाणा के दिग्गज नेता ओम प्रकाश चौटाला को सलाखों का रास्ता दिखाकर संदेश दे चुकी है कि मुलायम और अखिलेश यादव को अधिक कूदने की जरूरत नहीं है क्यों कि आय से अधिक संपत्ति में दोनों ही पिता-पुत्र घिरे हैं। मुलायम की कमजोरी को कांग्रेस जानती है और कांग्रेस से ही मुलायम डरते भी हैं । चुनाव को लेकर मुलायम भले ही अति उत्साहित हैं लेकिन नतीजे उनके ही मन मुताबिक आएंगे ऐसा न तो समाजवादी पार्टी के सभी नेता मानते हैं और न ही खुद मुलायम सिंह को भरोसा है। मुलायम जातने हैं कि विधानसभा चुनाव की लहर को दोहराना समाजवादी पार्टी के लिए एक चुनौती है यही वजह है कि लाल बत्तियां दबंगों को रेवडियों के भाव दी जा रही हैं। जिससे प्रदेश में सत्ता की लहर बन सके लेकिन इसका असर जनता पर जो पड़ रहा है या लाल बत्ती पाने वाले माननीयों के गाड़ियों की जो रफ्तार है वह समाजवादी पार्टी को केंद्र की सत्ता के पास नहीं दूर ही ले जा रही है।  [book id=” /]

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