Tuesday, September 7, 2021

यूं लिखी गयी इस फांसी की पटकथा

भारतीय संसद पर हमले के मुख्य आरोपी अफजल गुरु को शनिवार की सुबह फांसी की सजा दे दी गयी. फांसी की इस सजा की तामील जिस तरह से की गयी, वह किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं. अफजल गुरु को फांसी दिये जाने की खबर कुछ उसी तरह रहस्यात्मक आवरण लपेटे हुए आयी, जैसे मुंबई आतंकवादी हमले में एकमात्र जीवित पकड़े गये आतंकवादी अजमल आमिर कसाब की फांसी की खबर आयी थी. यह खबर भले अचानक आयी हो, लेकिन इसकी भूमिका काफी पहले से तैयार होने लगी थी. कसाब को फांसी दिये जाने के बाद गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने 10 दिसंबर, 2012 को कहा था कि वे संसद के शीतकालीन सत्र के बाद अफजल गुरु की फांसी पर विचार-विमर्श करेंगे.

20 जनवरी, 2013 को गृहमंत्री शिंदे ने अफजल गुरु की फांसी से संबंधित फाइल अपने पास मंगवायी. 21 जनवरी, 2013 को गृहमंत्री ने अफजल की दया याचिका नामंजूर करने की फाइल राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के पास भेज दी. राष्ट्रपति ने तीन फरवरी, 2013 को दया याचिका को औपचारिक रूप से खारिज कर दिया. फिर, चार फरवरी, 2013 को गृहमंत्री सुशील कुमार शिंदे ने इस फाइल पर दस्तखत कर मामला आगे बढ़ा दिया. आठ फरवरी को अदालत से अफजल गुरु को फांसी दिये जाने संबंधी डेथ वारंट जारी करवाया गया. इस डेथ वारंट की जानकारी आठ फरवरी को ही अफजल गुरु और तिहाड़ जेल के डीजी को दी गयी. इसी के बाद फांसी की तैयारी शुरू कर दी गयी.

अफजल गुरु को फांसी के फंदे पर लटकाने के लिए दिल्ली पुलिस और तिहाड़ जेल के आला अफसरों की एक कोर कमेटी शुक्रवार रात को ही बनायी गयी. कोर कमिटी ने ही फांसी की तैयारी का इंतजाम किया. फांसी से पहले अफजल गुरु दिल्ली की तिहाड़ जेल के कारागार संख्या तीन में बंद था. सुबह साढ़े चार बजे इस कारागार के सामने के पांचों बैरकों को खाली करा दिया गया और उनमें मौजूद कैदियों को दूसरी जगह शिफ्ट किया गया.

अफजल गुरु को फांसी से एक दिन पहले शुक्रवार की शाम यानी आठ फरवरी को बता दिया गया कि उसे अगले दिन यानी नौ फरवरी की सुबह फांसी दी जायेगी. जानकारी के मुताबिक इस खबर के बाद अफजल गुरु काफी बेचैन हो गया. रात में उसके सेल में खाने-पीने की कई चीजें भी रखी गयीं. लेकिन, उसने कुछ भी नहीं खाया. उसने महज दो-तीन गिलास पानी पीया. शनिवार छह बजे तिहाड़ जेल की डीआइजी विमला मेहरा जेल सुपरीटेंडेंट डॉक्टरों एवं अन्य अधिकारियों के साथ तिहाड़ जेल नंबर तीन पहुंची. उन्होंने संतरी से पूछा कि क्या अफजल जाग गया है. संतरी ने बताया कि वह रातभर जागता रहा है. सुबह सात बजे अफजल गुरु का ब्लड टेस्ट किया गया. डॉक्टरों ने उसका ब्लड प्रेशर और स्वास्थ्य सही पाया. फिर, उसे जेल नंबर तीन के ही फांसी घर की ओर ले जाया गया. उस वक्त अफजल ने बिना कॉलर वाला कुरता पहन रखा था और उसके हाथ पीछे की ओर बंधे थे. फांसी घर ले जाने के बाद उसे डेथ वारंट पढ़कर सुनाया गया. इस पर उसने कुछ भी जवाब नहीं दिया. फिर उससे उसकी अंतिम इच्छा पूछी गयी. उसने अंतिम इच्छा के रूप में कुरान की एक प्रति मांगी. हालांकि, उसके पास इसकी एक प्रति पहले से ही थी.

* क्या कहा था सुप्रीम कोर्ट ने..
इसमें कोई शक नहीं कि इस मामले में सबसे उचित सजा मौत की सजा है, जैसा कि ट्रायल कोर्ट और हाइकोर्ट द्वारा भी सुनायी गयी है. भारतीय गंणतंत्र में मौजूदा मामले जैसा कोई दूसरा उदाहरण देखने को नहीं मिलता. इस प्रकार यह बिलकुल साफ है कि यह रेयरेस्ट ऑफ रेयर (विरलों में विरलतम) मामला है. यह रेयरेस्ट ऑफ रेयर मामलों में भी अपने आप में एक अलग मामला है. संप्रभु लोकतांत्रिक संस्था पर खतरनाक हथियारों व विस्फोटकों के साथ बंधक बनाने के मकसद से हमला किया गया.

षड्यंत्रकर्ता(अफजल) ने गंभीर अपराध की साजिश रची. यह साजिश ज्यादा से ज्यादा लोगों को मारने, सरकारी कामकाज में बड़ी बाधा और भारत के लोगों की सामान्य जिंदगी को तबाह करने के उद्देश्य से रची गयी. परिणाम यह हुआ कि इस घटना ने बड़े पैमाने पर जानमाल के नुकसान के साथ ही पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. समग्र तौर पर समाज को तभी संतुष्ट किया जा सकता है, जब दोषियों को मौत की सजा दी जाये. याचिकाकर्ता जो कि आत्मसमर्पण कर चुका आतंकी है और जो लगातार देशद्रोह की कार्रवाई में शामिल रहा है, समाज के लिए नासूर बन चुका है, इसलिए उसकी जिंदगी समाप्त हो जानी चाहिए. इस आधार पर हम उसकी मौत की सजा को बरकरार रखते हैं.’’

न्यायाधीश पी वेंकटरमन रेड्डी और न्यायाधीश पीपी नावलेकर (04 अगस्त, 2005)

फांसी देते समय जेल नंबर 3 में अफजल गुरु के अलावा सिर्फ छह लोग ही मौजूद थे. इनमें जल्लाद, मजिस्ट्रेट, डॉक्टर और जेल के तीन अधिकारी शामिल थे. फांसी से पहले जल्लाद ने अफजल गुरु के पैर छुए और कहा कि वह उसे नहीं मार रहा है. वह भारतीय संविधान द्वारा निर्धारित कानून और नियमों का पालन कर रहा है. इसके बाद मजिस्ट्रेट ने अफजल को फांसी देने का आदेश दिया. फांसी दिये जाने के दस मिनट बाद डीआइजी विमला मेहरा और डॉक्टर सुरंग में गये. वहां डॉक्टर ने दो बार अफजल गुरु की शरीर की जांच की और अंतत: सुबह आठ बजे उसे मृत घोषित कर दिया. डॉक्टरों द्वारा अफजल गुरु को मृत घोषित किये जाने के तकरीबन 15 मिनट बाद यानी सवा आठ बजे सरकार की ओर से भी इसकी पुष्टि कर दी गयी. फांसी के बाद मौलवी की मौजूदगी में अफजल गुरु को जेल नंबर तीन में ही दफनाया गया.

* बक्सर की मनीला रस्सी से दी फांसी!

चर्चा है कि अफजल को बक्सर जेल से सात साल पहले लायी गयी रस्सी से फांसी दी गयी. अक्तूबर, 2006 में तिहाड़ के अधिकारी बिहार के बक्सर जेल से यह रस्सी लाये थे. अंगरेजी हुकूमत के समय से ही किसी भी जेल में फांसी देने के लिए बक्सर केंद्रीय कारागार के पुनर्वास प्रशिक्षण केंद्र में फंदेवाली मनीला रस्सी बनायी जाती है. ब्रिटिश हुकूमत में पहले फिलीपींस की राजधानी मनीला में फांसी के लिए रस्सी तैयार होती थी. बाद में बक्सर जेल में भी वैसी ही रस्सी बनने लगी. अंगरेजों ने ही इसे मनीला रस्सी नाम दिया. वर्ष 1884 में पहली बार यहां बने फंदे से भारतीय नागरिक को फांसी दी गयी. उसके बाद से यहीं से तैयार फंदों का इस्तेमाल होने लगा. इस रस्सी से अंतिम फांसी कोलकाता में 14 अगस्त, 2004 को दुष्कर्मी व हत्यारे धनंजय को दी गयी थी.

* मनीला रस्सी ही क्यों

गले में लिपट कर बिना तकलीफ मौत की नींद सुलानेवाली मनीला रस्सी खास विधि से बनती है. पहले कच्चे सूत के एक-एक कर 18 धागे तैयार किये जाते हैं. सभी को मोम में पूरी तरह संतृप्त किया जाता है. फिर सभी धागों को मिला कर मोटी रस्सी तैयार की जाती है. 168 किलोग्राम वजन उठाने की क्षमतावाली विशेष प्रकार की रस्सी की कीमत महज 182 रुपये है.

* अजब संयोग

शनिवार को तिहाड़ के जिस जेल नंबर-3 में अफजल गुरु को फांसी दी गयी और दफना दिया गया. वहीं 11 फरवरी, 1984 को जेकेएलएफ के अलगाववादी नेता मकबूल बट्ट को भी फांसी देने के बाद दफना दिया गया था. जेल प्रशासन ने बट्ट की कब्र के पास ही अफजल गुरु को भी दफना दिया, ऐसी चर्चा है.

* आतंक के डॉक्टर!

9/11 के बाद दुनिया ने आतंक का नया चेहरा देखा. दुनिया के सामने यह साफ हो गया कि डॉक्टर और इंजीनियर भी आतंकवादी हो सकते हैं. अमेरिकी रिसर्च में कहा गया है कि यूनिवर्सिटी के रिसर्च डॉक्टर भी ऐसी गतिविधियों में लिप्त हैं. 9/11 में कई हमलावर या तो डॉक्टरेट की डिग्री ले चुके थे या ले रहे थे. 1960 के दशक में फिलीस्तीन में बनाये गये एक खतरनाक आतंकी ग्रुप का लीडर जॉर्ज हैबश भी पेशे से डॉक्टर था. ओसामा बिन लादेन पेशे से एक पढ़ा-लिखा इंजीनियर था.

* अफजल गुरु: एक साल एमबीबीएस कोर्स किया. वह जैश-ए-मोहम्मद जैसे संगठन की बातों में आकर आतंकी बन गया. देश पर ही हमले की साजिश में शामिल हो गया.
* अयमान अल जवाहिरी : ओसामा बिन लादेन का सहयोगी रहा अयमान अल जवाहिरी पेशे से सर्जन है. वह दुनिया का मोस्ट वांटेड आतंकवादी है.
* ब्रिटेन के ग्लासगो में हुए आतंकी हमले में गिरफ्तार आठ लोगों में छह किसी न किसी मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े हैं.
* बनारस में वर्ष 2010 में हुए र‘ ब्लास्ट में गिरफ्तार आतंकवादी भी एक डॉक्टर था.

* 2008 में अफजल गुरु ने कहा था

नहीं लगता कि मेरे मामले में यूपीए सरकार कभी फैसला कर पायेगी
जेल में मेरी जिंदगी दोजख बन गयी है. मैंने सरकार से गुजारिश की है कि मेरे मामले में जल्द फैसला करें. नहीं, तो तब तक कश्मीर जेल में शिफ्ट कर दें, जब तक फैसला नहीं हो जाता. मैं जेल में जीवित मुर्दा की तरह नहीं रहना चाहता. लेकिन, मुझे नहीं लगता कि यूपीए सरकार कभी मेरे मामले में अंतिम फैसला कर पायेगी. कांग्रेस दोमुंही बातें करती है. वह डबल गेम कर रही है. मैं चाहता हूं कि एलके आडवाणी देश के अगले प्रधानमंत्री बनें. वही मेरी सजा पर निर्णय कर सकते हैं.

पांच और आतंकवादियों को फांसी का इंतजार

* देविंदर पाल भुल्लर : उस बम धमाके का दोषी है, जिसमें मनिंदरजीत सिंह बिट्टा को निशाना बनाया गया था.
* बलवंत सिंह राजोआना : पंजाब के मुख्यमंत्री बेअंत सिंह की हत्या के आरोप में मिली है फांसी की सजा.
* मुरुगन, संथान और पेरारिवलन : देश के भूतपूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या के आरोपी इन तीनों को भी सुनायी गयी है फांसी की सजा.

कबूलनामे पर भारी पड़े साक्ष्य

सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा दाखिल किये गये अफजल गुरु के कबूलनामे को गलत करार दिया था. साथ ही मीडिया में उसके साक्षात्कार को प्रकाशित और प्रसारित करने में पुलिस की भूमिका पर भी नाराजगी व्यक्त की थी. हालांकि, कोर्ट ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को स्वीकार किया था.

दिल्ली पुलिस के अनुसार अफजल गुरु ने संसद पर हमले में अपनी भागीदारी को कबूल करनेवाला बयान दिया था. इस बयान के अनुसार, वह 1989-90 में आतंकी संगठन जेकेएलएफ का सदस्य बना. उसने पाक अधिकृत कश्मीर में आतंकी प्रशिक्षण लिया और भारत में हथियारबंद लड़ाके के रूप में दाखिल हुआ.

1993 में गुरु बीएसएफ के समक्ष आत्मसर्पण कर चुका था. इसके बाद वह पढ़ाई के लिए अपने चचेरे भाई शौकत के साथ दिल्ली आया. दिल्ली विश्वविद्यालय से पढ़ाई करने के दौरान उसकी जान-पहचान एसआर गिलानी से हुई. इस दौरान वह अंनतनाग के तारिक नाम के एक व्यक्ति के साथ संपर्क में आया. तारिक ने उसे जिहाद में शामिल होने के लिए उकसाया. इसी तारिक ने अफजल को गाजीबाबा से मिलवाया था. गाजीबाबा ने अफजल को बताया था कि उसका मकसद भारत के किसी महत्वपूर्ण प्रतीक संस्थान, जैसे- संसद पर हमला करना है. इस मकसद को पूरा करने के लिए अफजल को हमलावरों के रहने का इंतजाम करने और जरूरत के सामान मुहैया कराने की जिम्मेवारी सौंपी गयी.

अक्तूबर 2001 में उसने अपने भाई शौकत को फोन कर दिल्ली में रहने के लिए एक ठिकाना खोजने को कहा. नवंबर के पहले सप्ताह में वह मोहम्मद के साथ एक लैपटॉप और 50 हजार रुपये के साथ दिल्ली आया. अफजल ने शौकत को बताया कि मोहम्मद जैश-ए-मोहम्मद का आतंकी है. इसके बाद संसद पर हमले की साजिश रची गयी. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस द्वारा दाखिल किये गये अफजल गुरु के इस कबूलनामे को गलत करार दिया था. साथ ही मीडिया में उसके साक्षात्कार को प्रकाशित और प्रसारित करने में पुलिस की भूमिका पर भी नाराजगी व्यक्त की थी.

हालांकि, कोर्ट ने पुलिस द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को स्वीकार किया था. संसद पर हमले को बड़ी साजिश का का हिस्सा माना गया और अफजल को साजिशकर्ताओं में से एक. अफजल घटना को अंजाम देने के हरेक वाकये से वाकिफ था. उसके खिलाफ सबसे पहला परिस्थितिजन्य साक्ष्य यह पेश किया गया कि उसने मृत पाकिस्तानी फिदाइन हमलावरों की पहचान की. अफजल ने लेडी हार्डिग मेडिकल कॉलेज के शवगृह में रखे गये पांचों पाकिस्तानियों की पहचान की थी. अफजल ने ही इनके पोस्टमार्टम रिपोर्ट में पहचानकर्ता के तौर पर दस्तखत किये थे.

अदालत में भी उसने या उसके वकील ने कभी इस बात से इनकार नहीं किया कि ऐसा करने को लेकर उस पर पुलिस का दबाव था. दूसरे साक्ष्य के तौर पर अफजल का लगातार संसद हमले के दौरान मोहम्मद के साथ फोन पर संपर्क बनाये रखने के रिकॉर्ड को पेश किया गया. हमले के कुछ मिनट पहले भी दोनों के बीच बातचीत हुई थी. मारे जाने के बाद मोहम्मद के शरीर से बरामद मोबाइल फोन से इस बात की पुष्टि हुई थी.

अफजल के दिल्ली में ठिकानों को भी साक्ष्य के तौर पर पेश किया गया. इतना ही नहीं जिन दुकानों से संसद पर हमले में इस्तेमाल में लाये गये विस्फोटकों की सामग्री की खरीद की गयी थी, उन दुकानदारों ने भी अफजल की पहचान की. पुलिस द्वारा बरामद लैपटॉप भी अफजल के खिलाफ बड़ा साक्ष्य बना. इसी लैपटॉप के माध्यम से फर्जी पहचान पत्र और गृह मंत्रालय का फर्जी स्टीकर बनाया गया था. ये पहचान पत्र हमले के दौरान मारे गये आतंकियों से बरामद किये गये थे. जिस कार का हमले के लिए इस्तेमाल में लाया गया था, उसमें वही स्टीकर लगा मिला था.

कभी डॉक्टर बनना चाहता था यह गुरु
कश्मीर घाटी में छोटा लंदन कहे जाने वाले सोपोर शहर से कुछ किलोमीटर की दूरी पर झेलम नदी के किनारे सीर जागिर गांव स्थित है. इसी गांव में अफजल गुरु का जन्म हुआ और वह वहीं पला-बढ़ा. अफजल के दो मंजिला घर में कसाब की फांसी के बाद ताला लटका हुआ है. दरअसल, अफजल का छोटा भाई हिलाल परिवार के साथ कसाब की फांसी लगने वाले दिन जल्दबाजी में घर छोड़ कर कहीं चला गया. उस दिन को याद करते हुए गांव के लोग बताते हैं कि हिलाल ने अपनी पत्नी से कहा था, ‘अगली बारी अफजल की हो सकती है.’

वहीं अफजल का बड़ा भाई एजाज कुछ वर्ष पहले ही गांव छोड़ चुका है. अफजल की गिरफ्तारी के तुरंत बाद ही उसकी पत्नी तबस्सुम अपने पिता के पास बारामुला के अजाद गंज चली गयी. गांव वालों के अनुसार, तबस्सुम कभी-कभार आती है. पिछले वर्ष बीमारी के कारण अफजल की मां की मृत्यु हो गयी, जबकि उसके पिता हबीबुल्ला का देहांत 35 वर्ष पूर्व हो चुका है. जब गांव वालों को रोजमर्रा की जिंदगी गुजर-बसर करने में परेशानी हो रही थी. तब अफजल के पिता के पास एंबेसडर कार हुआ करती थी. इतना ही नहीं गांव में एक मात्र टीवी भी उसी के घर में थी.

दरअसल, हबीबुल्ला का ट्रांसपोर्ट और लकड़ी का कारोबार था. लेकिन उसकी मौत के बाद परिवार का सारा भार अफजल से बड़े भाई एजाज ने उठाया. इसी बीच अफजल के चार भाइयों में सबसे छोटा दिल्ली में छोटा-मोटा व्यवसाय चलाने वाले रियाज की अचानक मौत हो गयी. मां की बीमारी के समय अफजल ने घर के कामकाज का सारा बोझ उठा लिया था. लेकिन इसके बावजूद भी उसने पढ़ाई में कोताही नहीं बरती.

अफजल के मित्रों के अनुसार, वह खेल, रंगमंच और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया करता था. स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर वह स्कूल के परेड का कमांडर हुआ करता था. अफजल के पिता उसे बचपन में डॉक्टर कह कर बुलाते थे. अफजल के गांव वाले उसके संसद पर हमले का मास्टरमाइंड होने की बात पर अभी भी विश्वास नहीं करते. जब अफजल को मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला था, तो गांव वालों ने जश्न मनाया था. अफजल की आयु जब 10 वर्ष की थी, तब कश्मीर में दहशतगर्दी का आलम आज के जैसा नहीं था.

90 के दशक के शुरुआती दौर में घाटी के युवा हाथों में बंदूक उठाने लगे थे और सीमा पार पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर की ओर मुखातिब होने लगे. धीरे-धीरे सोपोर और सीर जागिर दहशतगर्दो की जद में आने लगा. इसी दौरान अफजल में भी बंदूक के प्रति दीवानगी बढ़ती गयी. और वह आतंकी संगठन जम्मू कश्मीर लिबरेशन फंट्र (जेकेएलएफ) का हिस्सा बन गया.

दरअसल, अफजल अपने चचेरे मामा डॉ अब्दुल अहद गुरु से काफी प्रभावित था. डॉक्टर के तौर पर अहमद काफी प्रसिद्ध थे. उन्हीं की प्रेरणा के कारण अफजल ने 1988 में झेलम मेडिकल कॉलेज में दाखिला लिया था. कॉलेज के दिनों में गजल और संगीत के प्रति लगाव के कारण अफजल लड़कियों का चहेता हुआ करता था.

अहमद को 1994 में दहशतगर्दों ने मौत के घाट उतार दिया. इसी बीच अफजल पाक अधिकृत कश्मीर चला गया और जब लौटा तो वह डॉक्टरी की पढ़ाई छोड़ चुका था. इसके बाद वह दिल्ली चला आया. उसने दिल्ली विश्वविद्यालय से पत्राचार माध्यम से राजनीतिशास्त्र से स्नातक की डिग्री हासिल की. वह दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में दाखिला लेना चाहता था. इस दौरान वह अपने चचेरे भाई शौकत गुरु के पास रहकर टय़ूशन पढ़ाने का काम करता था. इसी बीच उसने अपनी मां की संबंधी तबस्सुम से निकाह किया.

वर्ष 1999 में पैदा हुए अपने बेटे का नाम गालिब रखा, क्योंकि वह गालिब का प्रशंसक था. संसद पर हमले के बाद पुलिस ने इसी शौकत और उसकी पत्नी सहित दिल्ली विश्वविद्यालय में प्रोफेसर एसएआर गिलानी को गिरफ्तार किया था. तबस्सुम इन दिनों सोपोर में गुरु नर्सिंग होम में काम करती है. हालांकि वह कभी भी मीडिया से बात नहीं की, लेकिन कुछ दिन पहले उसने कहा, ‘मैं सब कुछ अल्लाह पर छोड़ती हूं.’ नर्सिंग होम के कर्मी उसे प्यारी दीदी कह कर संबोधित करते हैं. वहीं अफजल का बेटा गालिब आठवीं कक्षा में पढ़ रहा है.
(द वीक से साभार)

* अफजल के गांव वाले उसके संसद पर हमले का मास्टरमाइंड होने की बात पर अभी भी विश्वास नहीं करते. जब अफजल को मेडिकल कॉलेज में दाखिला मिला था, तो गांव वालों ने जश्न मनाया था.

* जब हुआ देश की संप्रभुता के प्रतीक पर हमला..

दिसंबर महीने का वह एक सामान्य-सा सर्द दिन था. देश की राजधानी दिल्ली की जिंदगी अपनी रफ्तार से दौड़ रही थी. यह ख्याल किसी के मन में शायद ही कहीं था कि इस दिन ने अपने आगोश में एक ऐसी साजिश को छिपा रखा है, जिसे आनेवाले दशकों तक देश की संप्रुभता पर सबसे बड़े हमले के तौर पर जाना जायेगा.

13 दिसंबर, 2001 को आम दिनों की तरह संसद की कार्यवाही चल रही थी. संसद भवन में देश का शीर्ष नेतृत्व बैठा था. तभी संसद भवन की अभेद्य सुरक्षा के मिथक को तोड़ते हुए और सारे सुरक्षा इंतजामों को धता बताते हुए पांच दुस्साहसी आतंकवादी संसद परिसर में दाखिल हो गये. यह सुबह लगभग 11 बजकर 25 मिनट का वक्त था. पांच हथियारबंद आतंकवादी गृह मंत्रालय और संसद के स्टीकर वाली एक सफेद कार में संसद परिसर में घुस जाने में कामयाब हो गये.

इन पांचों आतंकवादियों की घुसपैठ के कुछ ही वक्त पहले राज्यसभा और लोकसभा को 40 मिनट के लिए स्थगित किया गया था. अधिकांश सांसद और सरकारी अधिकारी संसद में ही थे. तत्कालीन गृहमंत्री लालकृष्ण आडवाणी और गृह राज्यमंत्री हिरेन पाठक भी संसद भवन में मौजूद थे. हालांकि, प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और विपक्ष की नेता सोनिया गांधी संसद के स्थगित होने के बाद संसद से चले गये थे.

पांचों हथियार आतंकवादी अपनी कार को तत्कालीन भारतीय उपराष्ट्रपति कृष्णकांत की ओर ले गये और कार से उतर कर ताबड़तोड़ गोलीबारी करने लगे. उपराष्ट्रपति के सुरक्षाकर्मियों ने आतंकवादियों पर जवाबी हमला किया और संसद भवन परिसर के प्रवेशद्वार को बंद कर दिया.

संसद भवन की सुरक्षा में लगी कॉन्सटेबल कमलेश कुमारी ने सबसे पहले आतंकवादी दस्ते को देखा. इन आतंकवादियों में आत्मघाती हमलावर था. सुरक्षाबलों की गोलीबारी में उसके मारे जाने के बाद एक जबरदस्त धमाका हुआ. इसके बाद, जवाबी कार्रवाई में चार अन्य आतंकवादी भी मारे गये. संसद भवन पर इस हमले और जवाबी कार्रवाई में किसी भी मंत्री या सांसद को कोई नुकसान नहीं हुआ.

हालांकि देश की संप्रभुता के सबसे बड़े प्रतीक और देश के नेतृत्व की रक्षा करते हुए पांच पुलिसवाले, संसदभवन की सुरक्षा में लगा एक सुरक्षाकर्मी और एक माली शहीद हो गये. जबकि 18 अन्य लोग जख्मी हुए। (सा.प्र. ख़.)

संसद हमले के शहीदों को सलाम

*
जगदीश प्रसाद यादव सिक्योरिटी असिस्टेंट
(
राज्यसभा सचिवालय)


*
मतबर सिंह नेगी,
सिक्योरिटी असिस्टेंट (राज्यसभा सचिवालय)


*
कमलेश कुमारी,
कॉन्सटेबल(सीआरपीएफ)


*
नानकचंद
असिस्टेंट सब इंसपेक्टर


*
रामपाल
असिस्टेंट सब इंसपेक्टर


*
ओम प्रकाश
हेड कॉन्सटेबल (दिल्ली पुलिस)


*
बिजेंदर सिंह
हेड कॉन्सटेबल (दिल्ली पुलिस)

* देशराज
संसद भवन में माली.

 

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