Sunday, September 5, 2021

लिखित शब्दों का महत्व और ‘दलित दस्तक’ का एक वर्ष

vv30 जून को दलित दस्तक ने अपने एक साल पूरा होने का जश्न मनाया. विश्व के किसी भी देश में रह रहे वंचितों की स्वतंत्रता एवं उद्धार के लिए लिखित सामाग्री की महती आवश्यकता एवं भूमिका होती है. लिखित सामग्री किसी भी विधा में हो सकती है. वह कविता, कहानी, आलेख आत्मकथाएं आलोचना से लेकर उपन्यास में आपको रौशनी दे सकती है. इसे बेहतर तरीके से समझा जा सकता है कि वंचितों के उद्धार के लिए मुद्रित शब्द, मौखिक शब्दों से अधिक कारगर होते हैं. क्योंकि इनको हमेशा के लिए संजोकर रखा जा सकता है. मौखिक शब्द और विचार जब तक व्यक्ति जीवित रहता है तब ही तक रह सकते हैं और व्यक्ति के साथ-साथ वे भी मर जाते हैं. लिखित शब्द ज्ञान की धारा की तरह एक जगह से दूसरी जगह तक पहुंचाए जा सकते हैं. यह संभव नहीं है कि व्यक्ति हर जगह पहुंच पाए; पर उनके लेख, विचार एवं रचनाएं देश ही नहीं दुनिया के किसी भी कोने में पहुंच सकतीं हैं. इसीलिए वंचितों की लड़ाई, आंदोलन तथा संघर्ष में लिखित सामग्री की हमेशा जरूरत महसूस की जाती रहेगी.

 

लिखित सामग्री की आवश्यकता को पूरा करने के लिए उसे संकलित रूप में प्रकाशित करना भी अति आवश्यक है. परन्तु लिखने वाले से प्रकाशित करने वाले की जिम्मेदारी आंदोलन एवं संघर्ष की दृष्टि से कई गुना अधिक होती है. अगर वह लिखने वालों को मंच दे रहा है तो उसे यह तय करना पड़ेगा कि जो प्रकाशित हो रहा है वह वैचारिक रूप से वंचितों के आंदोलन एवं संघर्ष को बढ़ाने में मदद करता है या नहीं. ‘दलित दस्तक’ ने पिछले एक वर्ष में इन बातों और विचारों को दलित, वंचित, बहुजन एवं मूलनिवासियों के बीच स्थापित करने में भरपूर सफलता पायी है. पहला तो ‘दलित दस्तक’ ने लोगों को बार-बार यह बताया कि लिखे हुए शब्द मौखिक शब्दों से कितने ज्यादा प्रभावशाली और महत्वपूर्ण हैं. दूसरी ओर ‘दलित दस्तक’ ने अनेक दलित पत्र-पत्रिकाओं के लेखकों को एक मंच दिया. मंच के अभाव में कई नए लेखक नहीं उभर पाते हैं. तीसरी बात ‘दलित दस्तक’ ने वंचितों, दलितों, बहुजनों और मूलिनिवासियों की विचारधारा को और भी विस्तार दिया है. इसको और गहरा किया है. ‘दलित दस्तक’ की विचारधारा गौतम बुद्ध से शुरू होकर संत रैदास, कबीर, दाद्दू चोखा मेला से होते हुए 19वीं शताब्दी के जोतिबा फुले, नरायणा गुरू, बिरसा मुण्डा, साहूजी महराज, पेरियार ई.वी रमास्वामी और सर्वोपरि बाबासाहेब तक आती है. वंचित समाज में महिलाओं का आंदोलन में योगदान माता सावित्री बाई फुले, माता रमाबाई अम्बेडकर, उदा देवी झलकारी बाई, सुखरौ भंगी आदि को भी ‘दलित दस्तक’ नहीं भूली है.

 

 1970 के पश्चात बहुजनों तथा मूलनिवासियों के आंदोलन को काशी राम का सहारा मिला. उन्होंने अपनी वैचारिकी से पिछड़ों, दलितों, आदिवासियों और अल्पसंख्यकों का जो बड़ा युग्म तैयार किया, उससे फुले-अम्बेडकरी विचारधारा को नया आयाम मिला है. ‘दलित दस्तक’ ने इन नायकों की विचारधारा को अपनाया है. अर्थात विचारधारा के धरातल पर ‘दलित दस्तक’ बुद्ध के मध्यमार्ग, समता, स्वतंत्रता, बंधुत्व (शील, मैत्री एवं प्रजना) से होते हुए रैदास के मनचंगा कठौती में गंगा, से होते हुए फुले के मनुवाद के विरूद्ध सिंहनाद, साहूजी की प्रजातान्त्रिक पहल, रामास्वामी की सच्ची रामायण और बाबा साहेब के प्रजातान्त्रिक संवैधानिक मूल्यों पर आधारित सामाजिक व्यवस्था पर ही अपनी विचारधारा को निर्मित करने का प्रयास कर रही है. ऐसा मेरा मानना है.

 

बुद्ध के साथ-साथ संत रविदास, संतकबीर दास, दद्दू, चोखा मेला, ज्योतिबा फुले, शाहूजी महाराज, नारायणा गुरू, पेरियार ई.वी रामास्वामी बाबासाहेब अम्बेडकर, बिरसा मुंडा आदि अनेक नायकों ने अपने मंच को विचार का केंद्र बनाया है. नायकों को उनके सही संदर्भ में स्थापित करने का काम ‘दलित दस्तक’ ने बखूबी किया है, और आगे भी जारी रहेगा ऐसा मेरा अनुमान है. नायक ही नहीं बहुजन तथा मूलनिवासी समाज की नायिकाओं को भी ‘दलित दस्तक’ अपने पन्नों में जगह देती रही है. यद्यपि इसकी संख्या, सामग्री एवं वैचारिकी और भी बढ़नी चाहिए. अतः हम देखेंगे कि ‘दलित दस्तक’ के पांच सरोकार हो गए हैं. एक- लिखित शब्दों के महत्व को उजागर करना. दूसरा- वंचितों की लेखनी को मंच देना, तीसरा- उनकी विचारधारा को एतिहासिकता एवं प्रासंगिकता देना. चौथा बिन्दु ‘दलित दस्तक’ ने मूलनिवासी बहुजन समाज के नायकों को पुनःस्थापित करने की कोशिश की और पांचवां इस समाज की नायिकाओं को भी अपने पन्नों पर जिंदा किया.

 

dd ‘दलित दस्तक’ की एतिहासिक विशिष्टता यह है कि यह केवल वैचारिक पत्रिका नहीं है. बल्कि समाचार पत्रिका भी है. पत्रकारिता की कसौटी पर यह पहली ऐसी पत्रिका होगी. अब सवाल उठता है कि ख़बरों की दुनिया की भीड़ में हमें आखिर ‘दलित दस्तक’ क्यों चाहिए? ऐसी क्या आवश्यकता है?  सभी कहेंगे कि हमारा एक मीडिया होना चाहिए लेकिन शुरू कोई दूसरा करे. अगर कोई दूसरा शुरू भी करे तब भी लोग सहयोग नहीं करेंगे-विचार एवं पैसे दोनों से. ऐसी स्थिति में अगर हमें अपना मीडिया चाहिए तो हमें वैचारिक एवं आर्थिक सहयोग भी देना होगा. ‘दलित दस्तक’ कम समय में यानी पिछले एक साल में बहुत लोगों का विश्वास जीतने में सफल रही है और बहुत लोगों का विश्वास जीतना अभी बाकी है. मुझे आशा है कि आने वाले समय में लोग दलित-दस्तक का सहयोग करेंगे.

 

मेरा और मेरे उन मित्रों का विश्वास है कि अगर हम थोड़ा सा भी उत्साह दिखाएंगे तो हम ‘दलित दस्तक’ को राष्ट्रीय स्तर पर पढ़ी जाने वाली पत्रिका बना सकते हैं. लेकिन केवल पत्रिका की वार्षिक सदस्यता लेकर यह कार्य नहीं किया जा सकता. इसके लिए स्पॉनसरशिप एवं इस्तेहार की महती आवश्यकता पड़ेगी. शादी-विवाह, जन्मदिन, महापुरुषों की तिथियों के दिवसों पर संदेश आदि से पत्रिका की मदद की जा सकती है. अपने सगे-संबंधियों, रिश्तेदारों को वार्षिक सदस्यता भेंट में देकर भी इसके पढ़ने वालों की संख्या बढ़ाई जा सकती है. आशा है कि 85 फीसदी आबादी वाला यह समाज ‘दलित दस्तक’ का सहयोग कर अपना मीडिया बनाएगा.

(डीडीसी न्यूज़ नेटवर्क)

लेखक प्रो. विवेक कुमार, जेएनयू में समाजशास्त्र के प्रोफेसर हैं और वर्तमान में जर्मनी, बर्लिन स्थित हमबोल्ट विश्वविद्यालय में विजिटिंग प्रोफेसर हैं।

 

 

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