Wednesday, September 8, 2021

सरबजीत के लिए सरकार ने क्या किया

dead sarabjeet“प्रधानमंत्री की कुर्सी पर मिट्टी का खिलौना बैठा हुआ है। वह उसके आगे प्रार्थना ही कर सकती हैं। मैं कितनी बदनसीब हूं कि पति से मिली भी तो वह ज़िंदगी और मौत के बीच झूल रहे थे, उनके साथ कोई बात नहीं कर पाई” ये दर्द सरबजीत की पत्नी सुखप्रीत कौर का है जो पाकिस्तान से वापस आकर रो-रो कर मीडिया से कह रही हैं। हालात इस क़दर थे कि सुखप्रीत की बेटियां स्वपन दीप और पूनम मां को ढाढस क्या बधातीं वो खुद भी फफक कर रोने लगीं” ।

आज सरबजीत हमारे बीच नहीं हैं। अब सरबजीत वापस देश तो लौटेगा लेकिन जिंदा नहीं मुर्दा। सरबजीत ने सरकार से चिट्ठी लिखकर जान से मारे जाने या हमला किए जाने की आशंका जाहिर की थी लेकिन हमारी सरकार ने कोई ध्यान नहीं दिया। सवाल सरबजीत की ज़िंदगी का ही नहीं है सवाल हमारे देश की सुरक्षा और हमारे देश में चल रहे बर्बाद नेतावादी सिस्टम का है। जिस देश में चंद आतंकवादी विमान हाईजैक कर जेल से खूंखार आतंकवादियों को छुड़ा ले जाते हैं, दो चार लोगों की हत्याएं भी कर देते हैं और रुपए पैसे भी ले जाते हैं, और ये सब देश की सरकार मजबूरी में, दूसरे देशों के दबाव में करती है, उसी देश में 1989 में तत्कालीन गृह मंत्री मुफ्ती सईद की बेटी रुबैया सईद के अपहरण के बाद आतंकवादियों को छोड़कर रुबैया सईद को रिहा करवाया जाता है, क्यों कि वो राजनेता की बेटी थी । वहीं देश के एक नागरिक को पाकिस्तान में पहले धमाके के आरोप में फांसी की सजा सुनाई जाती है फिर जेल में ही जंगल राज पैदा कर हमला करवाकर मौत के घाट उतारने की कोशिश की जाती है, लेकिन हमारी सरकार मौन रहती है। कितना फर्क है आम नागरिक होने और नेता की औलाद होने या उनसे जुड़ा होने में। सरबजीत की बहन दलबीर कौर चीखचीख कर कहतीं हैं कि सरकार ने सरबजीत को भारत लाने के लिए कोई ठोस क़दम नहीं उठाए। सवाल ये भी है कि सजा तो एक कानूनी अधिकार है उस देश का, उस देश के संविधान का लेकिन सरबजीत पर हमले के बाद उसके इलाज के लिए हमारी सरकार ने क्या किया ?

मुंबई में सैकड़ों लोगों को लाशों में तबदील कर देने वाले कसाब को तो हम पकड़ कर दवा-दारू ही नहीं करवाते हैं बल्कि जेल में वो सब सुविधाएं देते हैं जो उसे नहीं मिलनी चाहिए थीं, दूसरी तरफ हम पाकिस्तान में अपने ही देश के एक निर्दोष कैदी के ऊपर हमले को लेकर स्पष्ट रुख अख्तियार नहीं कर पाते हैं। सरकार ने पाकिस्तान में सरबजीत पर हमले के बाद इलाज को लेकर भारत नहीं किसी दूसरे देश में भेजने की पहल क्यों नहीं की ये समझ से परे है।

पाकिस्तान से लौटने के बाद सरबजीत की बहन दलबीर कौर ने अटारी सीमा पर भाई के इलाज में कोताही बरतने का आरोप लगाते हुए पाकिस्तान को तो कोसा ही साथ ही ढुलमुल नीति के लिए भारत सरकार को भी कटघरे में खड़ा किया था। दलबीर ने कहा था कि सरबजीत पर दोनों देशों ने मिलकर हमला करवाया है। दलबीर ने ये भी कहा कि “सरकार ने सरबजीत को भारत लाने के लिए कोई ठोस कदम नहीं उठाए हैं। अपने ही देश के नागरिक की सुरक्षा करने में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह नाकाम रहे हैं। उन्हें अपनी कुर्सी छोड़ देनी चाहिए। सरकार ने सरबजीत के मुद्दे पर एक परिवार से नहीं, पूरे देश के साथ धोखा किया है” 

हम राजनयिक स्तर पर वार्ता का ढोंग करते हैं, क्या राजनयिक इंसान नहीं होते, अगर चीन मसले को लेकर विदेश मंत्री समेत कई नेताओं के पास फुरसत नहीं थी तो क्या राजनयिक स्तर पर बात कर विदेश में सरबजीत का इलाज करवाने की कोशिश नहीं की जा सकती थी ? किसी पत्रकार ने पाकिस्तानी मानवाधिकार की किशोरी कार्यकर्ता मलाला यूसुफ जई का जिक्र किया था, पाकिस्तान के नागरिक की ज़िंदगी बचाने के लिए उसे पाकिस्तान से बाहर ले जाया जा सकता है तो फिर उस कैदी को क्यों नहीं जो भारत का है। कैदी को कानून के मुताबिक सजा दी जा सकती है लेकिन इस तरह खुलेआम मरने के लिए छोड़ दिया जाए ये कहां कि कानून है। केंद्र सरकार और खास कर कांग्रेस, जिसकी अगुवाई में सरकार चल रही है, उसे इसका जवाब देना होगा । राहुल गांधी को भी ऐसे मामलों पर कन्फ्यूज रहने की क़ीमत चुकानी पड़ सकती है क्यों कि पीएम के लिए पोस्टर और बैनर में दावे कर देने, और कुछ नेताओं की तरफदारी से काम चलने वाला नहीं है देर से ही सही देश जाग रहा है, जवाब तो मांगेगा ही।

 हकीकत में कसाब और अफजल गुरू की फांसी के बाद से ही लगने लगा था कि सरबजीत को रिहा करवापाना अब काफी कठिन होगा। सरकार ने पाकिस्तान से सरबजीत मसले पर गंभीरता से बात किए बिना ही दोनों को लटका दिया, इसका गलत संदेश पाक को चला गया। सरकार बातचीत से यदि सरबजीत के मसले को पहले हल करती और तब दोनों की फांसी की फाइलों पर कार्रवाई करती तो तस्वीर दूसरी होती। सरबजीत निर्दोष था या नहीं यह मामला अब नहीं है मामला तो यह है कि जब वह उम्र कैद से अधिक सजा जेलों में काट चुका है तो फिर दो टूक बात कर सरकार पाकिस्तान से उनकी राय क्यों नहीं ली। सरबजीत की मौत बेकार नहीं जानी चाहिए। क्या भारत आतंकवाद पर कठोर रुख अख्तियार करेगा। अगर नहीं तो इसके परिणाम भयंकर होंगे देश में कब क्या होगा इसके बारे में अंदाजा लगापाना भी मुश्किल होगा। 

अखिलेश कृष्ण मोहन

लेखक डीडीसी न्यूज़ एजेंसी के पत्रकार हैं।

संपर्क-9554311493

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