Tuesday, September 7, 2021

सीजेएम ने यूपी आईपीएस एसोसिएशन पर मांगी रिपोर्ट

लखनऊ।। ias-officers-2-1_102112023107डीडीसी न्यूज।। सीजेएम लखनऊ प्रमोद कुमार ने उत्तर प्रदेश आईपीएस एसोसियेशन के विधि विरुद्ध होने पर एफआईआर संबंधी अमिताभ ठाकुर के प्रार्थनापत्र पर थाना महानगर, लखनऊ से रिपोर्ट मंगवाई है. मामले की अगली सुनवाई 04 जुलाई को होगी.

मैंने प्रार्थनापत्र में कहा कि यूपी पुलिस रेगुलेशन के पैरा 398 के अनुसार आईपीएस अधिकारी पुलिस बल के सदस्य हैं, अतः पुलिस बल (अधिकारों का शमन) एक्ट 1966 की धारा 3(1) के अनुसार वे बिना केन्द्र अथवा राज्य सरकार की स्पष्ट अनुमति के कोई  ऐसी संस्था नहीं बना सकते जो पूर्णतया सामाजिक,धार्मिक एवं मनोरंजक नहीं हो.  आरटीआई से प्राप्त सूचना के अनुसार इस एसोसियेशन को किसी स्तर पर कोई अनुमति नहीं मिली हुई है.

 

अमिताभ ठाकुर ने यूपी आईपीएस एसोसियेशन के पुलिस बल (अधिकारों का शमन) एक्ट की धारा 4 के अंतर्गत अपराध होने के नाते इसके पदाधिकारियों के विरुद्ध एफआईआर  दर्ज कराने की मांग की.

थाना महानगर द्वारा एफआईआर दर्ज नहीं कर मात्र पीली पर्ची की रसीद दी गयी. तब मैंने धारा 154(3) सीआरपीसी के तहत एसएसपी लखनऊ को एफआईआर दर्ज करने के लिए प्रार्थनापत्र भेजा और उसके बाद धारा 156(3) सीआरपीसी के तहत कोर्ट में आवेदन किया.

 

Copy of application before CJM–

मा० न्यायालय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट-       जनपद लखनऊ

प्रार्थना पत्र संख्या-          /2013

                                                थाना- महानगर,  जनपद- लखनऊ

प्रार्थी का नाम और पता-
अमिताभ ठाकुर, पुत्र- श्री तपेश्वर नारायण ठाकुर, निवासी- 5/426, विराम खंड, गोमतीनगर, लखनऊ # 94155-34526

विपक्षीगणों के नाम-
1. उत्तर प्रदेश सरकार

2. उत्तर प्रदेश आईपीएस एसोसियेशन के पदाधिकारीगण

धारा 156(3) सीआरपीसी के अंतर्गत मुक़दमा पंजीकृत करने के आदेश देने हेतु आवेदन पत्र

श्रीमान,

कृपया आपसे विनम्र निवेदन है-
1. कि मैं अमिताभ ठाकुर, पुत्र- श्री तपेश्वर नारायण ठाकुर, निवासी- 5/426,विराम खंड, गोमतीनगर, लखनऊ # 94155-34526 पेशे से एक आईपीएस अधिकारी हूँ जो वर्तमान में रूल्स एवं मैनुअल्स कार्यालय, उत्तर प्रदेश, लखनऊ में तैनात हूँ. मैं यह प्रार्थनापत्र अपनी निजी हैसियत में प्रस्तुत कर रहा हूँ.

2. कि मैंने दिनांक-24/06/2013 को अपने पत्र संख्या-  AT/UPPA/FIR दिनांक-24/06/2013 के माध्यम से विभिन्न तथ्य रखते हुए प्रभारी निरीक्षक के समक्ष एक प्रार्थनापत्र दिया था और यह निवेदन किया था कि मेरे प्रार्थनापत्र में प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर यूपी आईपीएस एसोसियेशन के प्रथमद्रष्टया विधिविरुद्ध संगठन होने तथा इसके द्वारा पुलिस बल (अधिकारों का शमन) एक्ट1966 की धारा चार के अंतर्गत आपराधिक कृत्य कारित करने के कारण इस सम्बन्ध में यूपी आईपीएस एसोसियेशन के पदाधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर अग्रिम कार्यवाही किये जाने की कृपा करें.

3. कि प्रार्थनापत्र में कहा गया था कि पुलिस बल (अधिकारों का शमन) एक्ट1966 की धारा 3(1) के अनुसार कोई भी पुलिस अधिकारी बिना केन्द्र सरकार अथवा सक्षम प्राधिकारी के रूप में राज्य सरकार की स्पष्ट अनुमति प्राप्त किये किसी भी प्रकार के ट्रेड यूनियन, लेबर यूनियन, राजनैतिक संगठन आदि अथवा किसी ऐसी संस्था, संस्थान, एसोसियेशन आदि का सदस्य नहीं हो सकता है जो पूर्णतया सामाजिक, धार्मिक एवं मनोरंजक नहीं हो.
4. कि प्रार्थनापत्र के अनुसार उत्तर प्रदेश के कई आईपीएस अधिकारियों द्वारा एक संस्था उत्तर प्रदेश आईपीएस एसोसियेशन बनाया गया है. मेरी जानकारी और आरटीआई से प्राप्त सूचना के अनुसार इस एसोसियेशन को केन्द्र सरकार अथवा उत्तर प्रदेश शासन से कोई अनुमति नहीं मिली हुई है. यहाँ तक कि मुख्यालय पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश के पास भी इस संस्था को अनुमति मिलने अथवा इसके संगठन के सम्बन्ध में कोई जानकारी अथवा अभिलेख नहीं हैं.
5. कि प्रार्थनापत्र में अंकित किया गया था कि विधिक स्थिति यह है कि यूपी पुलिस रेगुलेशन के 398 के अनुसार आईपीएस अधिकारी “पुलिस बल के सदस्य” परिभाषित हैं. अतः पुलिस बल के सदस्य होने के नाते वे कोई भी एसोसियेशन उत्तर प्रदेश सरकार से के अंतर्गत अनुमति लेने के बाद ही बना सकते हैं.

6. कि मैंने इस सम्बन्ध में रिट याचिका संख्या 9173/ 2012 (एम/बी) अमिताभ ठाकुर बनाम यूपी आईपीएस एसोसियेशन आदि दायर किया था. इस याचिका में मैंने मा० उच्च न्यायालय से प्रमुख सचिव, गृह एवं डीजीपी, यूपी को यूपी आईपीएस एसोसियेशन तथा यूपी पीपीएस एसोसियेशन की समस्त गतिविधियों को रोकने हेतु आदेश देने की प्रार्थना की थी. इस याचिका में मा० उच्च न्यायालय ने दिनांक 10/12/2012 को आदेशित किया कि- “If petitioner has any grievance against the Uttar Pradesh I.P.S. Association, as it exists today, he may approach concerned authorities for appropriate decision/action in accordance with law” अर्थात यदि वादी को यदि कोई शिकायत है तो वह सम्बंधित अधिकारियों के पास विधि के प्रावधानों के अनुरूप प्रार्थना कर सकता है.

7. कि मैंने मा० न्यायालय द्वारा दिये गए इस आदेश के सन्दर्भ में सक्षम प्राधिकारी के रूप में प्रमुख सचिव, गृह, उत्तर प्रदेश शासन को इन समस्त तथ्यों से अवगत कराते हुए कहा था कि यदि यह तथ्य सही है कि उत्तर प्रदेश में आईपीएस एसोसियेशन पुलिस बल (अधिकारों का शमन) एक्ट 1966 की धारा3(1) के अंतर्गत किसी भी प्रकार से उत्तर प्रदेश शासन से अनुमति लिए बिना ही बने हुए हैं और लगातार कार्य कर रहे हैं तो इनकी गतिविधियों को तत्काल प्रभाव से रोका जाये अथवा इस एसोसियेशन को विधिक स्वरुप प्रदान कर दिया जाये. मैंने यह भी निवेदन किया था कि यदि यूपी आईपीएस एसोसियेशन इस प्रकार से नियमानुसार अनुमति नहीं प्राप्त करता है तो इस एसोसियेशन के पदाधिकारियों के विरुद्ध पुलिस बल (अधिकारों का शमन) एक्ट 1966 की धारा चार तथा/अथवा अन्य उचित विधिक प्रावधानों में कार्यवाही की जाए.

8. कि मैंने इस सम्बन्ध में कई अनुस्मारक प्रेषित किये थे और अंत में यह स्पष्ट कर दिया था कि यदि दिनांक 15/06/2013 तक इस सम्बन्ध में नियमानुसार आवश्यक कार्यवाही नहीं की जाती है तो किसी अन्य विकल्प के अभाव में मैं अपनी जानकारी के अनुसार विधिविरुद्ध ढंग से कार्यरत यूपी आईपीएस एसोसियेशन के विरुद्ध नियमानुसार आवश्यक विधिक कार्यवाही करूँगा.

9. कि किसी भी अन्य विकल्प के अभाव में तथा मा० उच्च न्यायालय के रिट याचिका संख्या 9173/ 2012 (एम/बी) में दिनांक 10/12/2012 को निर्गत आदेश के परिप्रेक्ष्य में मैंने यह प्रार्थनापत्र प्रभारी निरीक्षक, महानगर के समक्ष इस अनुरोध के साथ प्रस्तुत किया कि कृपया यूपी आईपीएस एसोसियेशन के प्रथमद्रष्टया विधिविरुद्ध संगठन होने तथा इसके द्वारा पुलिस बल (अधिकारों का शमन) एक्ट 1966 की धारा चार के अंतर्गत आपराधिक कृत्य कारित करने के कारण इस सम्बन्ध में यूपी आईपीएस एसोसियेशन के पदाधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर अग्रिम कार्यवाही करने की कृपा करें.

10. कि प्रभारी निरीक्षक, महानगर द्वारा मेरे प्रार्थनापत्र पर संज्ञेय अपराध बनने के बाद भी प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित नहीं किया गया है जबकि पुलिस महानिदेशक, उत्तर प्रदेश के दिनांक 03/11/2011 के नागरिक अधिकार पत्र के अनुसार स्पष्ट निर्देश हैं कि प्रत्येक मामले में तत्काल एफआईआर दर्ज की जाए और समाचारपत्रों में आपकी तरफ से प्रकाशित खबरों में भी अनिवार्यतः एफआईआर दर्ज करने की बात कही गयी है. इसके विपरीत थाने द्वारा उत्तर प्रदेश पुलिस प्राप्ति शिकायत रसीद शिकायती प्रार्थनापत्र क्रम संख्या 18375दिनांक-24/06/2013 ही दिया गया जबकि मेरे प्रार्थनापत्र के अनुसार स्पष्टतया संज्ञेय अपराध कारित हो रहा था और तदनुसार धारा 154(1) सीआरपीसी के अंतर्गत इसमें तत्काल एफआईआर दर्ज किया जाना चाहिए था.

11. कि अतः मैंने वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक, लखनऊ के पास धारा 154(3)सीआरपीसी के प्रावधानों के अधीन एक प्रार्थना पत्र प्रस्तुत किया कि कृपया इस धारा में निहित शक्तियों और उत्तरदायित्व के अधीन तत्काल प्रभारी निरीक्षक, महानगर को एफआईआर दर्ज कर अग्रिम विवेचना किये जाने हेतु निर्देशित करें.

12. कि वहाँ भी एफआईआर दर्ज करने के आदेश नहीं दिये जाने के कारण बाध्य हो कर अन्य कोई विकल्प नहीं होने की दशा में मैं आपके समक्ष धारा 156(3)सीआरपीसी के तहत मुक़दमा पंजीकृत करने हेतु यह आवेदन पत्र प्रस्तुत कर रहा हूँ.

21. कि उपरोक्त तथ्यों एवं संलग्नक साक्ष्यों से यह स्पष्ट है कि विपक्षी संख्या दो द्वारा एक संज्ञेय अपराध कारित किया गया है जिस पर उनके विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित कर विवेचना किया जाना अत्यंत आवश्यक है, क्योंकि इसमें तमाम साक्ष्य पुलिस द्वारा ही एकत्रित किया जा सकता है. अतः कृपया विनयपूर्वक यह अनुरोध है कि इस प्रार्थनापत्र में प्रस्तुत तथ्यों के आधार पर जो संज्ञेय अपराध कारित होता बताया जा रहा है, कृपया उसे उचित धाराओं में पंजीकृत कर अग्रिम विवेचना किये जाने हेतु थानाध्यक्ष, महानगर, जनपद लखनऊ को आदेशित करने की कृपा करें. मैं इसके लिए आपकी अत्यंत आभारी होउंगा.

प्रार्थना

समस्त साक्ष्यों के दृष्टिगत प्रस्तुत प्रार्थनापत्र के आधार पर प्रथम सूचना रिपोर्ट अंकित करने  एवं विवेचना किये जाने हेतु थानाध्यक्ष, महानगर, जनपद लखनऊ को आदेशित करने की कृपा करें.
भवदीय,

स्थान- लखनऊ                                          अमिताभ ठाकुर
दिनांक-      /06/2013                                           प्रार्थी

 

 

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