Friday, September 3, 2021

स्मारक घोटाले में दागी एस.के अग्रवाल ईडी की जांच को प्रभावित करने में जुटा

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लखनऊ.  पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के शासनकाल में हुए स्मारक घोटाले की सही जांच होगी, इसकी संभावना अब कम ही दिखाई दे रही है। इस जांच को रद्दी की टोकरी में डालने का काम सपा सरकार के नाकाबिल अफसर ही कर रहे हैं। इसमें सबसे अहम भूमिका निभा रहे हैं एस.के अग्रवाल, जो इस समय राजकीय निर्माण निगम (दिल्ली अंचल) में अतिरिक्त महाप्रबंधक हैं और ईडी एवं अन्य जाँच एजेंसियोंको जरूरी दस्तावेज मुहैया कराने की ज़िम्मेदारी भी उन्हीं पर है। ऐसे में यह खेल चल रहा है कि ऐसी पत्रावलियों को जांच एजेंसी से दूर रखा जा सके जो कटघरे में खड़ा करती हैं। एसके अग्रवाल पर घोटाले को लेकर लखनऊ के गोमतीनगर थाने में दो एफआईआर दर्ज हैं।

Captureyसूत्रों से यह भी सामने आया है कि एसके अग्रवाल ऊंचे ओहदे पर बैठकर जांच को गलत दिशा में मोड़ रहे हैं। पूरे जांच की पिछले दो साल से लीपापोती करवाई जा रही है, जिससे उनके साथ मिलकर घोटाला करने वाले अधिकारियों को बचाया जा सके, यही वजह है कि मामले की जांच कर रही इंफोर्समेंट डायरेक्टोरेट (ईडी) को जरूरी दस्तावेज नहीं मिल रहे हैं। सूत्रों की मानें, तो एसके अग्रवाल अन्य दोषी अधिकारियों के साथ मिलकर इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं, क्यों कि उनके ऊपर भी एफआईआर दर्ज है। यदि पोल खुलती है, तो उन्हें भी जेल जाना पड़ सकता है।

हजारों करोड़ रुपए के स्मारक घोटाले में राजकीय निर्माण निगम विजिलेंस को दस्तावेज देने में आनाकानी क्यों कर रहा है, इसे तो समझा जा सकता है, लेकिन एफआईआर होने के बाद भी एस.के अग्रवाल जैसे अधिकारी प्रमोशन पर प्रमोशन पा रहे हैं, यह यूपी सरकार की घोटालेबाजों के प्रति उदासीनता है। स्मारक घोटाले के समय एसके अग्रवाल नोएडा में परियोजना प्रबंधक के पद पर रहे हैं।इसके बाद उन्हें पदोन्नत कर निर्माण निगम में अतिरिक्त महाप्रबंधक (दिल्ली अंचल) बना दिया गया।

जरूरी दस्तावेज नहीं मिलने पर अब यह भी आशंका जताई जा रही है कि कहीं इन्हें गायब तो नहीं कर दिया गया। हालांकि विजिलेंस राजकीय निर्माण निगम के दफ्तरों में टीम भेजकर कागजातों कोकब्जे में लेने में लगा है, लेकिन उसकी यह कोशिश नाकाम साबित हो रही है। इससे ईडी की जांच पर भी पानी फिर सकता है और असली स्मारक घोटालेबाजों को पकड़ना भी मुश्किल होगा। इसके पहले  इकोनामिक आफेंस विंग (ईओडब्ल्यू) ने जो रिपोर्ट लोकायुक्त और सरकार को सौंपी थी उसको लेकर लोकायुक्त भी फाइनल रिपोर्ट सरकार और राज्यपाल को भेज चुके हैं। इसके बाद भी यूपीसरकार कार्रवाई करने में नाकाम रही है।

इन अधिकारियों के ऊपर दर्ज हुई है एफआईआर

राजकीय निर्माण निगम के जिन अधिकारियों के ऊपर एफआईआर हुई है उसमें तत्कालीन प्रबंध निदेशक सीपी सिंह, निर्माण निगम के इंजीनियर एस.के अग्रवाल, एस.के सक्सेना, के.आर सिंह, राजीव गर्ग, एस.पीगुप्ता, पी.के जैन,  आर.के सिंह, बी.डी त्रिपाठी, मुकेश कुमार, हीरालाल, एस.के चंदेल, एस.पी सिंह, मुरली मनोहर और एस.के शुक्ला शामिल हैं।

स्मारक घोटाले में निर्माण निगम का क्या है रोल

स्मारक बनाने के दौरान पत्थरों की खरीद और आपूर्ति में राजकीय निर्माण निगम की अहम भूमिका रही। स्मारक घोटाले में पत्थरों का रेट तय करने में सबसे ज्यादा घपला किया गया। निर्माण निगम के अधिकारियों ने पत्थरों के रेट, बाजार के रेट से तीन गुने तक तय किए। इसमें पत्थरों की कटिंग, कार्विंग और मोल्डिंग पर जो खर्चा आना था, वह सब निर्माण निगम ने तय किए थे। जिन पत्थरों को मिर्जापुर से राजस्थान और फिर वहां से लखनऊ व नोएडा लाना दिखाया गया है, वह सब भी राजकीय निर्माण निगम के ट्रकों से ही किया जाना बताया गया था।

गौरतलब है कि लोकायुक्त न्यायमूर्ति एनके मेहरोत्रा ने इसी साल 20 मई को मुख्यमंत्री को सौंपी गई जांच रिपोर्ट में कहा था कि पूर्ववर्ती मायावती सरकार के कार्यकाल में लखनऊ तथा नोएडा में 14 स्मारकों के निर्माण में खर्च किए गए पांच हजार 919 करोड़ रुपए में से 14 अरब 10 करोड़ 50 लाख 63 हजार 200 रुपए का घोटाला किया गया, जो पत्थर लगवाने के लिए आवंटित कुल बजट का करीब 34 फीसदी है।