Sunday, September 5, 2021

हिन्दी साहित्य का मोगैम्बो खामोश हो गया

resizedimageनई दिल्ली।। हिन्दी साहित्य का हंस अपने विद्रोही तेवर, बेबाक विचार से इस दुनिया को झकझोरने के बाद अचानक दूसरी दुनिया के लिए उड़ गया। हिन्दी साहित्य के प्रमुख हस्ताक्षर राजेंद्र यादव का सोमवार की देर रात निधन हो गया। राजेंद्र यादव ने हिन्दी साहित्य में मोहन राकेश और कमलेश्वर के साथ नई कहानी आंदोलन की शुरुआत की। बाद में राजेंद्र यादव ने मुंशी प्रेमचंद की शुरू की गई साहित्यिक पत्रिका हंस का पुनर्प्रकाशन शुरू किया और इसे हिन्दी साहित्य का एजेंडा तय करने वाले मंच में बदल दिया। उनके उपन्यास और कहानियों में गहरा समाजशास्त्रीय अध्ययन दिखाई देता है।

एक ऐसा साहित्यकार संपादक जिसके नीर-क्षीर विवेक, बेबाकी और जिंदादिली की दूसरी मिसाल नहीं थी, जिसके बगैर हिन्दी साहित्य के मौजूदा परिदृश्य पर चर्चा ही नहीं हो सकती थी, वो राजेंद्र यादव अचानक दीवार में जड़ी एक तस्वीर में बदल गए। सोमवार रात दिल्ली के मयूर विहार मोहल्ले के आकाश दर्शन अपार्टमेंट में 84 साल की उम्र में खुद को युवा समझने वाले राजेंद्र यादव ने आखिरी सांस ली। राजेंद्र की बेटी रचना यादव ने बताया कि तबियत तो ज्यादा खराब नहीं थी। सांस की प्रॉबल्म थी, शुगर भी था। मेडिटेशन के कारण कंट्रोल में था। दफ्तर जाते थे। कल थोड़ा ब्रीदिंग बढ़ गई थी। कल हालत खराब होने पर अस्पताल ले कर गए लेकिन रास्ते में उन्होंने शरीर छोड़ दिया।

राजेंद्र यादव ऐसे लेखक थे जिन्होंने हमेशा साहित्य के मोर्चे को बेहतर दुनिया बनाने की कोशिशों का हिस्सा माना। लेखन और जीवन में उन्होंने कभी किसी सीमा में बंधना मंजूर नहीं किया। हमेशा उनकी कोशिश रही कि बेजुबान की जबान कैसे बना जाए। तमाम सीमाओं को तोड़कर मुक्त कैसे हुआ जाए।  1929 को आगरा में जन्मे राजेंद्र यादव के लिए जिंदगी आसान नहीं थी। 14 साल की उम्र में एक टांग टूट गई जिसके बाद वे जीवन भर दौड़ नहीं सके, लेकिन साहित्य के जनपथ पर उनकी दौड़ देखने लायक थी। इसका जरिया बनी हंस। इस पत्रिका को 1930 में कलम के सिपाही प्रेमचंद ने स्थापित किया था लेकिन ये अरसे से बंद पड़ी थी। 1986 से राजेंद्र यादव ने इसका संपादन शुरू किया और देखते ही देखते उन्होंने इसे एक ऐसे मंच में तब्दील कर दिया जहां हिन्दी जगत की सबसे तेजस्वी बहसें हो रही थीं।

अस्सी के दशक में जब हिन्दी की पत्रिकाएं एक-एक करके दम तोड़ रही थी तो राजेंद्र यादव ने साहित्यक मासिक हंस निकालने का जोखिम उठाया। बगैर किसी संस्थागत पूंजी के 28 साल तक मासिक पत्रिका निकालना राजेंद्र यादव जैसा जिगरवाला का ही कर सकता था।

मुंशी प्रेमचंद कहते थे कि साहित्य को राजनीति से आगे चलने वाली मशाल बनना चाहिए। राजेंद्र यादव ये बात कभी नहीं भूले। इसीलिए हिन्दी जगत में आए तमाम सामाजिक परिवर्तनों को उन्होंने तब पहचाना जब इसकी राजनीतिक अभिव्यक्ति इतनी मुखर नहीं थी। हंस ने दलित और स्त्री को साहित्य के केंद्र में स्थापित कर दिया। यही नहीं, हंस में बड़े पैमाने पर ऐसी कहानियां भी छपीं,जिसमें अल्पसंख्यक अपने नजरिए से घटनाओं और परिघटनाओं को व्याख्या कर रहे थे जो पहले कभी-कभार ही होता था।

समाजशास्त्री रामशरण जोशी कहते हैं कि उन्होंने राजेंद्र  इससे पहले किसी ने दलित साहित्य को महत्त्व नहीं दिया। राजेंद्र जी ने न सिर्फ साहित्य बल्कि दलित जीवन को भी महत्व दिया। इसका श्रेय यादव जी को देना चाहूंगा कि उन्होंने स्त्री विशेषांक निकाला। हिन्दी साहित्य में उनका प्रमुख योगदान रहा है। राजेंद्र यादव की एक और खास पहचान सांप्रदायिकता विरोध को लेकर थी। हंस का सफर और भारतीय राजनीति में सांप्रदायिक जहर का बढ़ना लगभग साथ-साथ चला। वे अल्पसंख्यक सांप्रदायिकता का भी विरोध करते थे लेकिन बहुसंख्यक सांप्रदायिकता में उन्हें फासीवाद की आहट सुनाई पड़ती थी और उन्होंने इसके खिलाफ जमकर कलम चलाई। उनके विचारोत्तेजक संपादकीय ऐसी राजनीति का जीवंत प्रतिपक्ष रचते थे।

हंस के संपादकीय के माध्यम से राजेन्द्र यादव ने सांप्रदायिकता और कठमुल्लापन के खिलाफ जंग छेड़ी थी। कट्टरपंथियों ने हंस के दफ्तर पर प्रदर्शन किया, उसकी प्रतियां जलाई और लगने लगा था यादव जी तो जेल जाना पड़ सकता है। लेकिन राजेन्द्र यादव ने हार नहीं मानी और लगातार अपने स्टैंड पर कायम रहे। उन्होंने हिन्दू कट्टरपंथ के खिलाफ आवाज उठाई। यादवजी ने हनुमान जी को लेकर कहा था के वो पहले आतंकवादी थे लेकिन उनकी बात का एक कांटेस्ट था। आजादी कि लड़ाई में जिसे हम आतंकवादी कह रहे हैं वही हमारे क्रांतिकारी हैं, हिन्दी में उनके जैसी आवाज होना मुश्किल है।

राजेंद्र यादव पर उम्र ने कभी असर नहीं दिखाया। वे सोच-विचार में हमेशा युवा रहे। यही नहीं, युवा प्रतिभाओं को जितना अवसर उन्होंने दिया, उतना उनसे पहले शायद ही किसी संपादक ने दिया होगा। हंस पत्रिका से यादव जी ने हिन्दी के लेखकों की एक नहीं दो नहीं चार पीढ़ियां तैयार की। साहित्यकार बलवंत कौर बताते हैं कि राजेंद्रजी नए लेखकों को हमेशा प्रोत्साहित करने पर जोर देते थे।

हंस के संपादन के साथ राजेंद्र यादव का अपना लेखन काफी कम हो गया था। कहा जाता है कि संपादक ने उनके लेखक को पीछे कर दिया। इससे पहले वे बतौर महत्वपूर्ण लेखक स्थापित हो गए थे। उनके मशहूर उपन्यास ‘सारा आकाश’ पर बासु चटर्जी ने फिल्म भी बनाई थी। इसके अलावा उनके कई कहानी संग्रह भी प्रकाशित हुए थे। इनमें देवताओं की मृत्यु, खेल-खिलौने, जहां लक्ष्मी कैद है, छोटे-छोटे ताजमहल, किनारे से किनारे तक और वहां पहुंचने की दौड़ प्रमुख हैं। इतना ही नहीं, उन्होंने मोहन राकेश और कमलेश्वर के साथ मिलकर नई कहानी आंदोलन को जन्म दिया था। ये उस दौर के साहित्यिक चौखटों को तोड़ने की एक बड़ी कोशिश थी जिसमें व्यक्ति या समाज एक दूसरे की ओर पीठ करके खड़े थे।

राजेंद्र यादव खुद को मार्क्सवादी मानते थे, लेकिन कभी कम्युनिस्ट पार्टी के कार्डहोल्डर नहीं बने। अपने इर्द-गिर्द वे किसी भी सीमा से परहेज करते थे। चौखटों को तोड़ना और नंगी सच्चाइयों को अपने लेखन से उघाड़कर रख देना राजेंद्र यादव के लेखन और संपादन की सबसे बड़ी पहचान थी। राजेंद्र यादव के असंतोष के केंद्र व्यक्ति भी था और समाज भी। दोनों की बेहतरी उनका लक्ष्य था।

बचपन में बिस्तर पर पड़े बीमार राजेंद्र को पिता ने दुनिया भर के तिलस्मी किस्से सुनाए थे जिन्होंने उनमें साहित्य के प्रति रुचि जगाई। जब राजेंद्र यादव ने खुद कलम उठाया तो पहचान तिलिस्म तोड़ने वाले लेखक की बनी। दस भाइयों मे सबसे बड़े राजेंद्र यादव ने शुरुआत में कलकत्ता को मुकाम बनाया। सोचते थे कि कलकत्ता लेखन के लिए मुफीद जगह है। वहीं मुलाकात मन्नू भंडारी से हुई जो खुद भी मशहूर लेखिका हैं। लेकिन दो लेखकों की ये मशहूर जोड़ी का दांपत्य सफल नहीं रहा। राजेंद्र जी खुद मानते थे कि वे दोस्त तो रह सकते थे लेकिन साथ रहना मुश्किल था। राजेंद्र यादव निजी प्रसंगों पर भी बेबाकी से बोलने में हिचकते नहीं थे।

ये संयोग नहीं कि बतौर लेखक अपनी चमक बढ़ाने के बजाय उन्होंने हंस को चमकाने में खुद को खपा दिया। ये आसान काम नहीं था। हंस की सफलता के पीछे उनकी दृष्टि के साथ उनकी जी तोड़ मेहनत भी थी। उनके साथ काम कर चुके लोग उनकी जिद और मेहनत को कभी नहीं भूल पाएंगे। हंस के कार्यकारी संपादक संगम पांडेय उनको याद करते हुए कहते हैं कि यादवजी बहुत काम किया करते थे। साहित्य के क्षेत्र में उनका बड़ा योगदान है, वे महान साहित्यकार थे। लेखिका अर्चना वर्मा हंस के संपादन पर आनेवाली दिक्कतों पर बताती हैं कि वाकई चौथाई सदी से भी ज्यादा वक्त तक हंस को जीवंत और लोकप्रिय बनाए रखना आसान नहीं था। तमाम साहित्यिक खेमेबाजी के बावजूद हंस साहित्यप्रेमियों के लिए जरूरी पत्रिका बनी रही।

सवाल ये है कि इस आंदोलन का राजेंद्र यादव के बाद क्या होगा। मंगलवार को लोदी रोड श्मशान में उन्हें अंतिम विदा देने के लिए मौजूद साहित्यकारों और साहित्यप्रेमियों के मन को यही सवाल मथ रहा था कि हिन्दी साहित्य ही नहीं, हिन्दी जगत में भी वैचारिक उथल-पुथल लाने वाले राजेंद्र यादव की परंपरा आगे बढ़ेगी या फिर हंस की उड़ान थम जाएगी।

Leave a Reply