Wednesday, September 8, 2021

यूपी कैबिनट में महिलाओं की संख्या जीरो

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मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की सियासत में महिलाओं की दखलंदाजी और प्रतिनिधित्व केवल डिंपल यादव और जया बच्चन पर ही आकर क्यों ठहर जाती है। डिंपल को निर्विरोध लोकसभा पहुंचाने के लिए मुलायम ने क्या-क्या दाव पेंच नहीं खेला, लेकिन जब यूपी विधान सभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात आती है को इन्हीं नेताओं को जनता के द्वारा और भीड़ में संघर्ष कर चुनी गईं महिलाएं दिखाई ही नहीं देती ।

लखनऊ।।(डीडीसी न्यूज़ नेटवर्क)।। महिला दिवस पर सियासी दल किस तरह चिल्लाते हैं और हकीकत में क्या करते हैं इसे जानकार आप हैरत में पड़ जाएंगे। 403 सीटों वाली यूपी विधान सभा में 35 महिलाएं विधायक हैं लेकिन कैबिनेट में एक भी महिला को शामिल नहीं किया गया। समाजवादी पार्टी महिलाओं के सशक्तीकरण का राग भले ही अलापती रही है लेकिन कभी भी अपने वादों और दावों पर खरी नहीं उतरती । ये हम नहीं कह रहे हैं बल्कि हर बार महिलाओं को आगे कर सियासत करने वाली समाजवादी पार्टी की हकीकत भी देख लीजिए। सत्ता से दूर रहने पर समावादी पार्टी महिलाओं की मजबूती और न जाने क्या-क्या नारे लगाती है, लेकिन हकीकत जानकर आप भी चौक जाएंगे।

403 सीटों वाली यूपी विधानसभा में भले ही 35 महिला विधायक हैं लेकिन कैबिनेट में किसी भी महिला को शामिल नहीं किया गया। जी है यही है यूपी के युवा मुख्यमंत्री का फैसला। आजादी के बाद विधानसभा पहुंचने वाली महिलाओं की संख्या इस बार सबसे अधिक है। इसके पहले कभी भी 35 महिलाएं विधानसभा में चुनकर नहीं आई थीं । मीडिया ने कैबिनेट मंत्री से कैबिनेट में महिलाओं के नहीं शामिल किए जाने को लेकर सवाल किया तो सरकार का जवाब भी सुन लीजिए। सुना आपने कैबिनेट मंत्री ही महिलाओं की सख्या कैबिनेट में न होने को सीएम का विशेषाधिकार बता रहे हैं। लेकिन यही सीएम का विशेषाधिकार और विशेषाधिकार की परिभाषा समाजवादी पार्टी के लिए तब बदल जाती है जब वो सत्ता से दूर होती है और सड़कों पर संघर्ष कर रही होती है। इतना ही नहीं मुख्यमंत्री ये दलील भी नहीं दे सकते कि हमारी पार्टी में महिला विधायकों की संख्या सबसे कम है, क्यों कि चुनी गईं कुल 35 महिला विधायकों में 20 महिला विधायक केवल समाजवादी पार्टी की ही हैं। यही वजह है कि सरकार की दलील किसी के गले नहीं उतर रही है। प्रमोद तिवारी का तो यहां तक कहना है कि कैबिनेट में जब महिला मंत्री हैं ही नहीं तो महिलाओं की बेहतरी का फैसला कैसे होगा और महिलाओं का प्रतिनिधित्व कौन करेगा।

 

पार्टी वार यूपी विधानसभा में महिलाओं की तादात भी देख लीजिए समाजादी पार्टी में 20 महिला विधायक हैं तो बीजेपी से सात महिला विधायकों ने 16 वीं विधानसभा में जीत दर्ज की है। बीएसपी और कांग्रेस से तीन-तीन महिला विधायक हैं तो अपना दल से अनुप्रिया पटेल इकलौती विधायक हैं, और एक निर्दलीय महिला विधायक हैं। हाई प्रोफाइल महिला चेहरों में बुंदेलखंड के चरखरी से विधायक उमाभरती का नाम आता है। लखनऊ के कैंटोनमेंट से विधायक रीता बहुगुणा जोशी भी महिलाओं की आवाज को उठाने वाली चर्चित चेहरों में गिनी जाती हैं। लेकिन यूपी में न तो सरकार महिलाओं को तवज्जो दे रही है और न ही विपक्ष महिलाओं को आगे ला रहा है।

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इसके पहले 2007 में 23 और 2002 में 26 महिलाएं विधानसभा चुनाव में जीत दर्ज की थीं। अब तक की 35 महिला विधायकों की संख्या के बाद दूसरे नंबर पर 1985 में 31 महिला विधायक चुनीं गईं थीं। 1980 में 23 महिला विधायक चुनी गईं थीं तो वहीं इसके पहले 1974 में 21 महिला विधायक विधानसभा पहुंची थीं। 1996 और 1962 में बीस बीस महिला विधायकों ने विधान सभा तक की दूरी तय की थी, तो वहीं 1989, 1969 और 1957 में 18 विधायकों ने विधानसभा चुनाव जीता था। 1993 में जहां 14 महिला विधायक विधानसभा पहुंची थीं तो वहीं इसके पहले क्रमशः 1977 में 11, 1991 में 10, 1967 में छह-छह और पहली विधानसभा में सबसे कम 5 महिला विधायकों ने जीत दर्ज की थी।    

सबसे बड़ा सवाल तो ये है कि मुलायम सिंह और अखिलेश यादव की सियासत में महिलाओं की दखलंदाजी और प्रतिनिधित्व केवल डिंपल यादव और जया बच्चन पर ही आकर क्यों ठहर जाती है। डिंपल को निर्विरोध लोकसभा पहुंचाने के लिए मुलायम ने क्या-क्या दाव पेंच नहीं खेला, लेकिन जब यूपी विधान सभा में महिलाओं के प्रतिनिधित्व की बात आती है को इन्हीं नेताओं को जनता के द्वारा और भीड़ में संघर्ष कर चुनी गईं महिलाएं दिखाई ही नहीं देती । सवाल ये भी है कि ये हमारे राजनीतिक दलों की कौन सी मर्दानगी है जहां अपने परिवार की महिलाओं को ग्रीन सिंगनल और बाकी समाज की जुझारू चुनी गईं महिलाओं को रेड सिंगनल दिखाया जाता है।   

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