Sunday, September 5, 2021

विधानसभा चुनाव 2018 : अमित शाह की इस गलती से भाजपा की हुई करारी हार !

New Delhi. 5 राज्यों के चुनाव परिणाम कांग्रेस के प्रदर्शन को खुश करने वाले हैं। वहीं भारतीय जनता पार्टी के लिए खतरे की घंटी बजती दिखाई दे रही है।यह तो होना ही था। कांग्रेस का पुनर्जन्म और भारतीय जनता पार्टी के लिए ख़तरे की घंटी। उत्तर भारत के तीन खांटी हिंदी राज्यों में उसकी हार सिर्फ़ व्यवस्था के प्रति नकारात्मक वोटों का ही नतीज़ा नहीं है।

अमित शाह

यह प्रादेशिक और केंद्रीय नेतृत्व के लिए भी गंभीर संदेश है कि प्रचार की जिस शैली पर वह गर्व करता था, वह अब अजेय नहीं रही। साबित हो गया कि कांग्रेस उसी की शैली में मात भी दे सकती है, इसलिए आने वाले लोकसभा चुनाव के लिए अपने अंदर आमूलचूल बदलाव करने होंगे।

इन राज्यों में भाजपा के लिए अलर्ट

तेलंगाना और मिजोरम में तो बीजेपी किसी बड़े चमत्कारिक प्रदर्शन की उम्मीद नहीं कर रही थी। अलबत्ता मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ से उसे बड़ी आस थी। राजस्थान का किला तो ढहना ही था। दो राज्यों में प्रचार के अंतिम दिनों में उसने पराजय का अंतर यकीनन कम किया, मगर छत्तीसगढ़ की पराजय इतनी शर्मनाक है कि लंबे समय तक नहीं भुलाई जा सकेगी। सवाल यह है कि गड़बड़ कहां हुई?

दरअसल, तीनों राज्यों में पार्टी का आधार बहुत मज़बूत रहा है, लेकिन चुनाव के दौरान केंद्र और प्रादेशिक इकाइयों में तालमेल की कमी रही। प्रदेश सरकारों और संगठन से असंतुष्ट पार्टी नेताओं ने केंद्रीय नेतृत्व का भरोसा जीता और पार्टी साफ साफ दो खेमों में बंटी रही। आलाकमान ने उम्मीदवारों के चुनाव में अनावश्यक हस्तक्षेप किया। इसका परिणाम भी अच्छा नहीं रहा।

राष्ट्रीय नीतियां रहीं हावी

इसके अलावा तीनों प्रदेशों में स्थानीय मुद्दों पर राष्ट्रीय नीतियां हावी रहीं। परंपरा के मुताबिक विधानसभा चुनाव प्रादेशिक मसलों और चेहरों पर लड़े जाते रहे हैं। राष्ट्रीय मुद्दों को चुनाव का हिस्सा बनाने का नुकसान यह हुआ कि केंद्र सरकार की असफ़लताएं भी मतदाताओं के सामने रहीं। अब पार्टी नेतृत्व हार का ठीकरा प्रादेशिक क्षत्रपों पर नही फोड़ सकता।

बीजेपी ने जिस तरह चुनाव के ठीक पहले राम मंदिर निर्माण और अन्य धार्मिक प्रतीकों का सहारा लिया, वह भी महंगा पड़ा। आज के जवान होते हिंदुस्तान में बुनियादी समस्याओं के सामने मंदिर जैसे मुद्दे हाशिए पर जा चुके हैं। पार्टी को लोकसभा चुनाव के पहले अपने काम का ठोस नज़राना पेश करना होगा। निजी निंदा और चिल्ला-चिल्ला कर गाल बजाने से लोग अब चिढ़ने लगे हैं।

कांग्रेस के लिए भी है सबक दूसरी ओर कांग्रेस के लिए छत्तीसगढ़ को छोड़कर दोनों राज्यों में कलेजे की फांस की तरह नतीजे आए हैं। पंद्रह साल में पार्टी ने एक तरह से लड़ना छोड़ दिया था,संगठन बिखर गया था और इन परिणामों ने उसके लिए संजीवनी का काम किया है। राजस्थान और मध्यप्रदेश में शिखर नेताओं का आपसी घमासान अभी थमा नहीं है। अगर लोकसभा चुनाव से पहले अंदरुनी लड़ाई नहीं थमी तो गंभीर परिणाम हो सकते हैं।