Tuesday, September 7, 2021

शिक्षा प्रणाली समान और सुलभकारी होः सुनील सिंह साजन

कोई भी देशCuddalore-India-2009-A-025 सामाजिक और आर्थिक मोर्चे पर तभी आगे बढ़ सकता है, जब वहां की शिक्षा प्रणाली समान और सुलभकारी हो। हमारे देश में 68 सालों से शिक्षा पर बहस तो जरूर हो रही है कि शिक्षा नीति सुधारी जाए पर गुणवत्ता पूर्ण शिक्षा की नीति नहीं बनी। इसीलिए शहर और गांव में शिक्षा बट गयी और गांव/शहर की शिक्षा में असामानता बढ़ती गयी। गांव के छात्र कस्बे की ओर भागने लगे तो कस्बे के छात्र शहरों और शहर के छात्र दूसरे राज्यों या देशों की ओर रूख करने लगे।

इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि देश की आबादी के 60 करोड़ नौजवानों के लिए उच्च शिक्षा को लेकर कोई बेहतर माहौल नहीं बन पाया। बीते दो दशक में आर्थिक उदारीकरण और तमाम प्रयासों के बावजूद भारत विकसित देश का दर्जा हासिल करने में विफल रहा। मौजूदा
केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति की पहल की है और यह कहते हुए की है कि अब तक बनाई गई शिक्षा नीतियों से यह बिल्कुल ही अलग है। इसमें आम लोगों की राय को भी शुमार किया गया है, लेकिन राय किस तरह से बनाई जाएगी इसको लेकर सरकार के पास कोई रोडमैप नहीं है। यहां तक ‌कि शिक्षा के केंद्रीय बजट में भी सरकार ने कटौती कर दी। शोध करने वाले छात्रों को दी जाने वाली रकम या तो कम कर दी गई या बंद कर दी गई। छात्रों ने विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के दफ्तर के बाहर प्रदर्शन किया, लेकिन क्या मिला, सिवाय आश्वासन के। छात्रों का आंदोलन लंबे समय तक चला। मौजूदा केंद्र सरकार को आंदोलन से कोई लेना-देना नहीं है। मानव संसाधन विकास मंत्री ट्वीट करके जानकारी देती रहीं कि आंदोलनरत छात्रों की बातों पर गौर किया जा रहा है, लेकिन सवाल गौर करने तक ही सीमित नहीं है। क्या शिक्षा के मद में जो बजट में कटौती की गई है उसे आने वाले बजट में पूरा किया जाएगा। या फिर पिछले बजट की तरह ही कटौती जारी रहेगी। दूसरा सवाल यह है कि जो नई शिक्षा नीति बनाने की बात हो रही है, वह कब तक क्रियान्वयन हो जाएगी। क्योंकि पहले यह कहा जा रहा था कि दिसंबर माह तक हो जाएगी ‌लेकिन अभी तक इसका कुछ पता नहीं चल पा रहा है।Pre-primary_1

शिक्षा के कई रूप देश में देखने को मिलते है। घर की शिक्षा, बाहर की शिक्षा, सामाजिक शिक्षा, स्कूली शिक्षा आदि-आदि, लेकिन जब सरकारें शिक्षा की बात करें तो उसमें असमानता नहीं होनी चाहिए क्योंकि जब शिक्षा में असमानता होगी तो समाज में स्वाभाविक है, उसकी प्रतिक्रिया होगी। शिक्षा का पैमाना स्कूल और कॉलेज से लगाया जाता है। देश के बड़े घरानों ने शिक्षा पर कब्ज़ा कर लिया और शिक्षा को व्यवसाय बना दिया। कल तक छोटे स्कूल चलाने वाले आज विश्वविद्यालयों, प्रबंधन संस्थानों के मालिक बन गए। इस व्यवसाय को बनाने में अब तक की केंद्रीय सरकारें सहयोग करती गई। क्योंकि बिना केंद्रीय सरकारों के शिक्षा का बाजारीकरण नहीं हो सकता। भारत सरकार ने 2009 में अनिवार्य शिक्षा विधेयक पेश किया था। पर उसमे भी गुणवत्ता कहीं नहीं है।

समाजवादियों ने हमेशा सामान शिक्षा की बात की है। क्योंकि जब तक सामान शिक्षा नहीं लागू होगी समानता की कल्पना करना बेकार है। समान शिक्षा प्रणाली को लेकर लंबे समय से मांग होती भी रही है, लेकिन उसका कोई ठोस हल नहीं निकला। आज शिक्षा को लेकर इतनी असमानता है कि एक तरफ ऊंची इमारतों में बने स्कूल हैं तो दूसरी ओर खुले आसमान में ‌पढ़ते हुए बच्चे मिल जाएंगे। इससे बच्चों में भी हीन भावना आती है और आगे की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। शिक्षा ही एक ऐसा माध्यम है, जो देश के आर्थिक विकास से लेकर सामाजिक विकास, औद्योगिक विकास में सहायक हो सकती है। क्योंकि जब व्यक्ति शिक्षित होगा तो समाज शिक्षित होगा। समाज शिक्षित होगा तो आर्थिक विकास की ओर लोगों का ध्यान भी जाएगा। आज आजादी के बाद से ही गरीबी हटाओ की गूंज सुनने को मिलती रही है, लेकिन गरीबी तो हटी नहीं। यदि गरीबी हटाओं की जगह शिक्षित बनाओं का नारा दिया गया तो शायद गरीबी और शिक्षा दोनों ही समस्याओं पर काबू पा लिया गया होता। जो लोग देश में सामान शिक्षा के खिलाफ है वो इस देश के किसानों, कमजोरों, गरीब, मजदूर और गांव में रहने वाले लोगों के खिलाफ है। अगर इस देश की आत्मा गांव में बसती है तो गांव के बच्चों को भी सामान शिक्षा देनी होगी। ये देश तब तक तरक्की नहीं कर सकता, जब तक देश के सभी बच्चों को सामान शिक्षा नहीं मिलेगी।

(लेखक समाजवादी छात्रसभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं, वर्तमान में लखनऊ-उन्नाव क्षेत्र से सपा समर्थित प्रत्याशी के रूप में एमएलसी के लिए चुनाव लड़ रहे हैं।)

फोटोः फाइल।