Friday, September 3, 2021

Martyrs’ Day : जेलर और गांधी ने इस तरह लिखी थी भगत सिंह के फांसी की चिट्ठी

लखऩऊ ।। क्या महात्मा गांधी ने भगत सिंह व अन्य क्रांतिकारियों को बचाने का प्रयास किया था? उपरोक्त प्रश्न प्राय: समय-समय पर उठता रहा है। बहुत से लोगों का आक्रोश रहता है कि गांधी ने भगत सिंह को बचाने का प्रयास नहीं किया। यह भी कहा जाता है कि भगत सिंह स्वयं किसी प्रकार की क्षमा याचना नहीं चाहते थे और उनका पूरा विश्वास था कि उनकी शहीदी देश के हित में होगी, लेकिन प्रश्न यह है कि गांधी ने क्रांतिकारियों को बचाने का प्रयत्न क्यों नहीं किया। जेलर ने जो चिट्ठी लिखी थी वह भी अपने आप में अहम है। आज के ही दिन देश के तीनों लाल को फांसी दे दी गई थी। ऐसे में इन्हें याद करना जरूरी है।BhagatSingh_DeathCertificate कहा जाता है कि गांधी ने 23 मार्च, 1931 को वायसराय को एक निजी पत्र में इस प्रकार लिखा था-page-333-gcw

“१ दरियागंज, दिल्ली
२३ मार्च, १९३१

प्रिय मित्र,
आपको यह पत्र लिखना आपके प्रति क्रूरता करने-जैसा लगता है, पर शांति के हित में अंतिम अपील करना आवश्यक है। यद्यपि ‍‌आपने मुझे साफ-साफ बता दिया था कि भगतसिंह और अन्य दो लोगों की मौत की सज़ा में कोई रियायत किए जाने की आशा नहीं है, फिर भी आपने मेरे शनिवार के निवेदन पर विचार करने को कहा था। डा सप्रू मुझसे कल मिले और उन्होंने मुझे बताया कि आप इस मामले से चिंतित हैं। हालांकि इसके बाद इस बारे में क्या जवाब गांधी को मिला इसकी जानकारी का उल्लेख कहीं पर नहीं है।
भगतसिंह ने देश की आज़ादी के लिए जिस साहस के साथ शक्तिशाली ब्रिटिश सरकार का मुक़ाबला किया, वह आज के युवकों के लिए एक बहुत बड़ा आदर्श है। इन्होंने केंद्रीय संसद (सेंट्रल असेम्बली) में बम फेंककर भी भागने से मना कर दिया, जिसके फलस्वरूप इन्हें 23 मार्च 1931 को इनके दो अन्य साथियों, राजगुरु तथा सुखदेव के साथ फांसी पर लटका दिया गया। सारे देश ने उनके बलिदान को बड़ी गंभीरता से लिया।

एसेंबली में बम फेंकना

कहा जाता है कि भगत सिंह यद्यपि रक्तपात के पक्षधर नहीं थे, परन्तु वे कार्ल मार्क्स के सिद्धान्तों से पूरी तरह प्रभावित थे। यही नहीं, वे समाजवाद के पक्के पोषक भी थे। इसी कारण से उन्हें पूंजीपतियों की मजदूरों के प्रति शोषण की नीति पसंद नहीं आती थी। उस समय चूंकि अंग्रेज ही सर्वेसर्वा थे तथा बहुत कम भारतीय उद्योगपति उन्नति कर पाये थे, अतः अंग्रेजों के मजदूरों के प्रति अत्याचार से उनका विरोध स्वाभाविक था। मजदूर विरोधी ऐसी नीतियों को ब्रिटिश संसद में पारित न होने देना उनके दल का निर्णय था। सभी चाहते थे कि अंग्रेजों को पता चलना चाहिये कि हिन्दुस्तानी जाग चुके हैं और उनके हृदय में ऐसी नीतियों के प्रति आक्रोश है। ऐसा करने के लिये ही उन्होंने दिल्ली की केन्द्रीय एसेम्बली में बम फेंकने की योजना बनायी थी।

भगत सिंह चाहते थे कि इसमें कोई खून खराबा न हो और अंग्रेजों तक उनकी ‘आवाज़’ भी पहुंचे। हालांकि प्रारम्भ में उनके दल के सब लोग ऐसा नहीं सोचते थे पर अन्त में सर्वसम्मति से भगत सिंह तथा बटुकेश्वर दत्त का नाम चुना गया। निर्धारित कार्यक्रम के अनुसार 8 अप्रैल 1929 को केन्द्रीय असेम्बली में इन दोनों ने एक ऐसे स्थान पर बम फेंका जहां कोई मौजूद न था, अन्यथा उसे चोट लग सकती थी। पूरा हाल धुएं से भर गया। भगत सिंह चाहते तो भाग भी सकते थे पर उन्होंने पहले ही सोच रखा था कि उन्हें दण्ड स्वीकार है चाहें वह फांसी ही क्यों न हो; अतः उन्होंने भागने से मना कर दिया। उस समय वे दोनों खाकी कमीज़ तथा निकर पहने हुए थे। बम फटने के बाद उन्होंने “इंकलाब-जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद-मुर्दाबाद!” का नारा लगाया और अपने साथ लाये हुए पर्चे हवा में उछाल दिये। इसके कुछ ही देर बाद पुलिस आ गयी और दोनों को ग़िरफ़्तार कर लिया गया।

प्रस्तुतिः अखिलेश कृष्ण मोहन