Tuesday, August 31, 2021

मुनव्वर से मां ने मुंह मोड़ लिया, कुछ इस तरह मां पर लिखी थी उन्होंने शायरी

mrलखनऊ ।। भारतीय उर्दू साहित्य में मुनव्वर राना एक ऐसा लोकप्रिय नाम है, जिसके बिना आज ग़ज़ल की दुनिया आबाद नहीं हो सकती। उनकी जुबान आम आदमी की जुबान है, जहां लफ्ज़ों में सजे अशार खुद-बखुद जज़्बात को बयान करते चले जाते हैं। नीचे लिखी चंद लाइने राना साहब के मां शायरी से ही हैं। आज जब मुनव्वर राना की मां का इंतकाल हो गया है, तो बरबस ही ये लाइनें याद आ रही हैं। 

हंसते हुए मां बाप की गाली नहीं खाते
बच्चे हैं तो क्यों शौक़ से मिट्टी नहीं खाते

हो चाहे जिस इलाक़े की ज़बां बच्चे समझते हैं
सगी है या कि सौतेली है मां बच्चे समझते हैं

हवा दुखों की जब आई कभी ख़िज़ां की तरह
मुझे छुपा लिया मिट्टी ने मेरी मां की तरह

सिसकियां उसकी न देखी गईं मुझसे ‘राना’
रो पड़ा मैं भी उसे पहली कमाई देते

सर फिरे लोग हमें दुश्मन-ए-जां कहते हैं
हम जो इस मुल्क की मिट्टी को भी मां कहते हैं

मुझे बस इस लिए अच्छी बहार लगती है
कि ये भी माँ की तरह ख़ुशगवार लगती है

मैंने रोते हुए पोंछे थे किसी दिन आंसू
मुद्दतों मां ने नहीं धोया दुपट्टा अपना

भेजे गए फ़रिश्ते हमारे बचाव को
जब हादसात माँ की दुआ से उलझ पड़े

लबों पे उसके कभी बद्दुआ नहीं होती
बस एक मां है जो मुझसे ख़फ़ा नहीं होती

तार पर बैठी हुई चिड़ियों को सोता देख कर
फ़र्श पर सोता हुआ बेटा बहुत अच्छा लगा