Wednesday, September 1, 2021

समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष की पुण्यतिथि पर जानिए उनका जीवन

लखनऊ. समाजवादी पार्टी के प्रदेश कार्यालय में पूर्व प्रदेश अध्यक्ष एवं कैबिनेट मंत्री रहे रामशरण दास की 9वीं पुण्यतिथि मनाई गयी। इस अवसर पर उनके चित्र पर माल्यार्पण एवं पुष्पांजलि अर्पित की गयी। – dainikdunia.com

समाजवादी पार्टी

आजीवन समाजवादी मूल्यों को मजबूत करते रहे

समाजवादी पार्टी के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष रामशरण दास की 9वीं पुण्यतिथि के अवसर पर समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय सचिव एवं मुख्य प्रवक्ता राजेंद्र चौधरी ने कहा कि रामशरण दास आजीवन समाजवादी मूल्यों को मजबूत करते रहे। समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पद पर रहते हुए उन्होंने कर्तव्यनिष्ठा और ईमानदारी का उदाहरण पेश किया।

कार्यक्रम में एमएलसी एसआरएस यादव, अरविन्द कुमार सिंह, सतीश दीक्षित, लखनऊ महानगर अध्यक्ष फाकिर सिद्दीकी मुख्य रूप से उपस्थित रहे।

रामशरण दास उस सियासी जमात के आखरी लोगों में थे, जिन्होंने देश और समाज की बेलौस खिदमत की, लेकिन अपने लिए एक अदद आशियाना भी न बना सके।

जय प्रकाश नारायण के साथ भी काम किया

रामशरण दास, रफी अहमद किदवई, जयप्रकाश नारायण, आचार्य नरेंद्र देव, राजनारायण, सीताराम केसरी जैसे नेताओं की कड़ी में थे, जिनका नाम लेकर तो तमाम लोग सत्ता और दौलत के शिखर पर पहुंच गए, परंतु जो स्वयं अपने या अपने परिवार के लिए कुछ नहीं कर पाए।

2006 में जब विधान परिषद सदस्यों का चुनाव होना था, किसी ने अधयक्ष जी से कह दिया कि बलराम यादव (पूर्वांचल के मिनी मुलायम) ने सुझाव दिया है कि अध्यक्ष जी अब बुजुर्ग हो गए हैं और इस बार उनके पुत्र जगपाल को विधान परिषद भेज दिया जाए, ताकि अध्यक्ष जी के सामने ही उनका पुत्र स्थापित हो जाए। कोई और राजनेता होता तो बलराम के सुझाव पर जमकर गोटें बिछाता, लेकिन अध्यक्ष जी तो अध्यक्ष जी थे, सो उखड़ गए और कहने लगे कि बलराम तो मेरा दुश्मन निकला। मेरी जिंदगी भर की राजनीति पर पानी फेरना चाहता है। जगपाल को सदन में जाना है, तो काम करे, चुनाव लड़े, रामशरण दास का लड़का होने की वजह से विधान परिषद में नहीं जाएंगे। ऐसा चरित्र कितने सियासी लोगों में है?

 

पूरी जिंदगी एक साइकिल तक नहीं खरीद पाए

राम शरण दास का लखनऊ का घर समाजवादी आंदोलन के पूर्णकालिक कार्यकर्ताओं का स्थायी रैन बसेरा था। जिसे कहीं जगह नहीं उसका सहारा राम शरण दास का घर होता था। समाजवादी पार्टी के स्थापना के दिन से ही प्रदेश अध्यक्ष बने. लेकिन मरते दम तक गाड़ी तो दूर साइकिल भी न खरीद पाए। सरकार में हुए, तो सरकारी गाड़ी, नहीं हुए तो पार्टी ने गाड़ी दे दी वरना अपने किसी एक सेवक को साथ लिया और रिक्शे पर चल दिए। कोई बनावट नहीं, कोई दिखावा नहीं। जैसे हैं सामने हैं ? कब किसे क्या कह दें, भरोसा नहीं, लेकिन जो कहेंगे सो सोलह आना सच। एक दिन अपने घर पर टिकटार्थियों और कार्यकर्ताओं से घिरे बैठे थे।

एक कार्यकर्ता बोला- ‘अध्यक्ष जी (उस समय समाजवादी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष थे।) आप देखिए न कार्यकर्ताओं के साथ टिकट में नाइंसाफी हो रही है, आप दखल दीजिए ना।’ एक मिनट चुप रहे फिर बोले तो बेसुरा लेकिन कड़वा सच। बोले-‘देखो किसी की नहीं चल रही है। सब अमर सिंह के यहां से तय हो रहा है। शिवपाल सबसे ज्यादा काम करते हैं, लेकिन उनके कंधे पर रखकर बंदूक चलाई जा रही है।’ फिर समझाने लगे- ”हमारे देहात में ‘टपका’ कहलाता है, पका हुआ आम जो पेड़ से टपक जाता है। ये ‘टपका’ साबित होंगे और बाद में बदनाम शिवपाल को करेंगे।”