Monday, August 30, 2021

UP ELECTION @ 2017 : गठबंधन या जनादेश, उठने लगे सवाल

लखनऊ ।। (मनोज कृष्णन ।। यूपी विधानसभा चुनाव होने में अभी लगभग एक साल का वक्त है, लेकिन राजनीतिक पंडितों और मीडिया ने सरकार के कामकाज के आधार पर अपना-अपना विश्लेषण और सर्वे जारी करना शुरू कर दिया है। अखिलेश यादव ने बतौर मुख्यमंत्री चार साल पूरे कर लिए हैं और डंके की चोट पर सरकार चलाई है। फिरकापरस्त ताकतों ने कमजोर करने की कोशिश तो बहुत की, लेकिन उन्हें कामयाबी नहीं मिली और अखिलेश के चेहरे की चमक कभी फीकी नहीं पड़ी।

कहा जाता है कि अखिलेश ने जब उत्तर प्रदेश की सत्ता संभाली थी, तो सरकार के सामने बड़ी चुनौतियां थी और उनके पास सरकार चलाने का अनुभव नहीं था। इसके बाद भी उन्होंने बहुत कुछ सीखा और पार्टी के चुनावी वादे भी पूरा करते हुए प्रदेश की जनता की शिकायतें सुनीं और समस्याओं का निराकरण भी बखूबी किया। इसकी वजह वे आज भी प्रदेश की जनता के सबसे चहेते मुख्यमंत्री बने हुए हैं। यह उनकी दूरदर्शी सोच का नतीजा कहा जा सकता है।

सरकार के चार साल पूरे होने पर प्रदेश के कोने-कोने में जाकर जब लोगों से विभिन्न मुद्दों पर बातचीत की गई तो जो परिणाम निकलकर आए हैं। वो बहुत चौंकाने वाले नहीं हैं। अभी भी अखिलेश यादव की छवि सब पर भारी है। 1989 के बाद से परिवर्तन की लहर जब से चली है। कोई भी पार्टी लगातार दो बार प्रदेश में बहुमत जुटाने में सफल नहीं हुई। उसके बाद से जनादेश सरकार के खिलाफ रहा है, लेकिन इस बार सत्ता के खिलाफ लहर नहीं बनती दिख रही है। हां इतना जरूर है कि अखिलेश यादव ने जिस समय सत्ता संभाली थी उस समय उनके पास खोने के लिए कुछ नहीं था, परंतु इस बार अगर जनादेश पार्टी के खिलाफ जाता है तो उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी गंवानी पड़ेगी।

मायावती के शासन से आजिज थी जनता

अखिलेश के हाथों में जब प्रदेश की बागडोर आई उस समय मायावती के शासन के खिलाफ प्रदेश की जनता ने वोट किया। मायावती सरकार में हो रहे भ्रष्टाचार से प्रदेश की जनता आजिज आ चुकी थी। प्रदेश की जनता को एक मजबूत विकल्प की तलाश थी और लोगों में यह उम्मीद जगी थी कि अखिलेश यादव एक मजबूत विकल्प के तौर पर उभरे हैं, जो एक युवा हैं और प्रदेश को विकास के रास्ते पर ले जाने के लिए बहुत कुछ कर सकते हैं। इसके साथ अखिलेश यादव परंपरावादी सोच से हटकर युवाओं को लुभाया और उनमें एक नई ऊर्जा का संचार किया। लिहाजा अपनी पार्टी को एक नई ऊंचाई पर पहुंचा दिए। तकरीबन 225 सीटें जीतकर उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हुए थे।

लोकसभा चुनाव में नहीं मिली कामयाबी

लगभग दो साल पहले हुए लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश में 80 में से 73 सीटें भारतीय जनता पार्टी जीत गई। ऐसा लगने लगा कि अखिलेश का जनाधार खिसकने लगा है। वे केवल अपने परिवार के पांच लोगों को ही लोकसभा में पहुंचा सके। बाकी सभी प्रत्याशियों को पराजय का सामना करना पड़ा। उस समय तो यहां तक कहा जाने लगा था कि यदि विधानसभा में बहुमत साबित करावाया जाए तो सरकार अल्पमत में आ जाएगा।

जीत का लय जारी रखने में भाजपा असफल

भाजपा जीत का लय जारी रखने में नाकामयाब होती दिख रही है, जिसका कारण है कि जो झूठे वादे करके भाजपा केंद्र की सत्ता पर काबिज हुई थी और उनको पूरा करने में वह नाकामयाब रही है। जिसके बलबूते भाजपा ने केंद्र में बहुमत हासिल किया था, उनका ग्राफ बहुत तेजी से गिरा है। लोगों को घोर निराशा हाथ लगी है। अभी तक तो पिछली किसी भी समस्या से निजात नहीं मिली है। उनका कहना है कि विगत 22 महीनों में भ्रष्टाचार का कोई मामला सामने नहीं आया है। लेकिन यह कहने से पहले वे यह भूल जाते हैं कि अरुण जेटली का दिल्ली में क्रिकेट संघ का मामला क्या था, जिसके खिलाफ खुद उनकी ही पार्टी के सांसद खड़े हो गए, जिन्हें धकेल कर हासिये पर कर दिया गया।

सत्ता का विकेंद्रीकरण जरूरी

केंद्र की सत्ता व्यक्ति विशेष के हाथों में सिमटती नजर आ रही है और सरकार विपक्षियों के साथ तालमेल बैठाने में असफल रही है। सरकार में अहंकार की भावना पनपी है, जिससे वह किसी के साथ संवाद नहीं करना चाहती है। चुनावी सभाओं में हाथ हिलाकर लोगों को अपना बनाने वाले नेता पार्टी की जीत से इतना इतराते हैं कि काम करने की जगह पर किसी की सुनते ही नहीं हैं।

लोगों मन में पनपी असुरक्षा की भावना

लोकसभा चुनावों में मिली जीत से गदगद भाजपा अब धरातल पर नहीं सोचती। भाजपाइयों के पैर हवा में रहते हैं। उन्हें अब आम जनता से कोई सरोकार नहीं है। महंगाई सुरसा की तरह मुंह बाए खड़ी है। अंतराराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के भावों में गिरावट के बावजूद उसका फायदा आम जन तक नहीं पहुंच रहा है। डीजल और पेट्रोल के भाव अभी लगभग वहीं पर हैं जहां कांग्रेस के समय में थे, जबकि कच्चे तेल के भावों में बहुत अधिक गिरावट दर्ज की गई है। साथ ही लोगों के मन में असुरक्षा की भावना पैदा हो रही है जिससे असहिष्णुता का मुद्दा पनपा और जोरशोर से देशभर में विरोध हुआ और अभी भी हो रहा है। लेखक और तमाम बुद्धिजीवी सरकार के खिलाफ आवाज उठाने लगे।

बसपा के पास मुद्दे का अकाल

पिछले चार साल से सत्ता से दूर रहकर मायावती भी फिर से उत्तर प्रदेश में सरकार बनाने की ललक मन में पाल रही हैं। उनकी पार्टी से ताल्लुक रखने वाले या उनकी जैसी सोच रखने वाले लोगों के मन में यह विचार पनपने लगे हैं कि 2017 में उत्तर प्रदेश में बसपा की सरकार बनने जा रही है। लेकिन पिछले चार साल में अखिलेश का निराधार विरोध करने के अलावा बसपा के पास किसी गंभीर मुद्दे का अकाल रहा है। इसके साथ मायावती की धार अब कुंद होने लगी है।

भाजपा से आंतरिक समझौता बसपा को पड़ेगा भारी

सीबीआइ जांच की डर से बसपा की भाजपा के साथ नजदीकियां किसी से छुपी नहीं हैं। ऐसे में मुस्लिमों का वोट हासिल कर पाना बसपा के लिए टेढ़ी खीर साबित होगी, क्योंकि बसपा को यह लग रहा है कि मुस्लिमों का सपा से मोह भंग हो रहा है तो उनके पास बसपा के अलावा कोई विकल्प नहीं होगा और मुस्लिम बसपा का समर्थन करेंगे, दलित मुस्लिम और कुछ अगड़ी जाति के लोगों के वोट के बल पर वह फिर से उत्तर प्रदेश की सत्ता पर काबिज हो सकती है। परंतु यह बहुत दूर की बात होगी।

ओवैसी के बयान से हिंदू वोट के ध्रुवीकरण की आशंका

एआइएमएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी जिस तरह आजकल बयान दे रहे हैं। उससे यह साफ जाहिर होता है कि यह सब कुछ भाजपा के इशारे पर हो रहा है और यह संदेश मुसलमानों तक जाने लगा है तभी तो कई मुस्लिम संगठन खुलकर ओवैसी के बयान का विरोध कर रहे हैं। हालांकि यह भाजपा की चाल है। लेकिन अब यह बात लोगों के समझ में बहुत अच्छी तरह से आने लगी है कि देश में एंटीनेशनल एक्टिविटी भाजपा के अलावा कोई नहीं करवाता है और उसके आधार पर वह हिंदू वोट का ध्रुवीकरण करवाकर सत्ता का सुख भोगना चाहती है।

पंचायत और विधान परिषद चुनाव में मिली जीत से सपा के हौसले बुलंद

हाल ही में पंचायत और विधान परिषद चुनावों में मिली सफलता से समाजवादी पार्टी गदगद है और उसके हौसले बुलंद हैं और पूरे आत्मविश्वास के साथ चुनाव में उतरेगी। 36 में से 31 विधान परिषद की सीटें जीतकर सपा ने विधान परिषद में भी बहुतम हासिल कर लिया है। सपा को जिन सीटों पर कामयाबी नहीं मिल पाई उसका कारण स्थानीय राजनीति है।

विभीषणों को निकाल करें बाहर

समाजवादी पार्टी विधान परिषद की जो सीटें नहीं जीत पाई। उन जगहों पर सपा के विभाषण जिम्मेदार हैं। कहा तो यह जा रहा है कि प्रदेश के कई काबीना मंत्री अपनी ही पार्टी के प्रत्याशियों को हराने के लिए जोरशोर से लगे हुए थे, जो अखिलेश यादव के लिए एक संदेश भी है कि ऐसे लोगों से सख्ती से निपटें और उन्हें पार्टी से बाहर करें या उन्हें उस पद से हटाकर उनकी औकात बताएं। इससे एक सकारात्मक संदेश जाएगा कि पार्टी के साथ छल करने वालों के लिए पार्टी में कोई जगह नहीं।

अगली बार गठबंधन की सरकार!

सरकार के चार साल पूरे होने पर कराए गए सर्वे में यह बात उभर कर सामने आई है कि 2017 के विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी को स्पष्ट जनादेश नहीं मिल पाएगा। हालांकि अभी तक जो आंकड़े आ रहे हैं उससे स्पष्ट बहुमत से बहुत अधिक दूर तो नहीं हैं। परंतु इस पर गौर करना जरूरी है। वहीं, बसपा दूसरे नंबर की पार्टी बनती देखी जा रही है। बसपा की कुछ सीटें तो बढ़ने का अंदाजा लगाया जा रहा है। परंतु वह दूसरे नंबर पर बनी रहेगी। भाजपा के तीसरे और कांग्रेस के चौथे नंबर पर रहने का अनुमान लगाया जा रहा है। वहीं अन्य के खाते में भी कुछ सीटें जा सकती हैं। हांलांकि अभी चुनाव होने में अभी लगभग एक साल का वक्त है, तो बहुत से समीकरण बनेंगे और बिगड़ेंगे। कांग्रेस भी अपनी रणनीति बनाने में लगी है। ऐसे में किसी को भी स्पष्ट जनादेश की उम्मीद नहीं की जा रही है।

लेखक दिल्ली के वरिष्ठ पत्रकार और मीडिया विश्लेषक हैं। 

फोटोः फाइल।