Wednesday, September 1, 2021

यूपी विधानपरिषद में इस तरह होगी चुनावी गणित

vidhansabahaलखनऊ।। विधानसभा उपचुनाव के बाद विधानपरिषद में भी सपा को फायदा होने जा रहा है। 12 विधान परिषद की सीटें खाली हो रही हैं। इसके लिए संख्या बल से अधिक उम्मीदवार होने पर चुनाव करवाए जा सकते हैं। इसमें से सपा को जहां चार सीटों का फायदा हो रहा है वहीं, बसपा को पांच सीटें खोनी पड़ रही हैं।

यूपी विधान परिषद के 12 सदस्यों का कार्यकाल 30 जनवरी को समाप्त हो रहा है। रिक्त पदों के चुनाव के लिए केंद्रीय निर्वाचन आयोग ने एक जनवरी को चुनाव अधिसूचना और कार्यक्रम को जारी कर दिया है। नामांकन की प्रक्रिया छह जनवरी से शुरू हो कर 13 जनवरी तक चलेगी। नामांकन पत्रों की जांच 14 जनवरी और 16 जनवरी तक नाम वापस लिए जा सकते हैं।

उम्मीदवारों की संख्या 12 से अधिक होने पर 23 जनवरी को चुनाव कराया जाएगा। विधान परिषद चुनाव में सपा के तीन, बसपा के सात, भाजपा के दो सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है और विधान सभा में संख्या बल के हिसाब से सपा को तीन की बजाय सात। बसपा को सात की बजाय दो सदस्य विधान परिषद में भेजने की स्थिति है। भाजपा इस बार दो सदस्यों की जगह मात्र एक सदस्य ही भेज सकती है। विधान परिषद चुनाव-2015 में सपा को जहां चार सीटों का बड़ा फायदा हो रहा है वहीं बसपा को पांच और भाजपा को एक सीट का नुकसान हो रहा है।aditya

लोक सभा चुनाव में अति-पिछड़ों की बदौलत यूपी में अप्रत्याशित सफलता पाने वाली भाजपा इन वर्गों को हर हाल में अपने साथ जोड़ने की कवायद में जुटी है। भाजपा की नजर गैर यादव पिछड़ों और गैर जाटव दलितों पर विशेष रूप से है। यूपी की कार्यकारिणी में 35 पदाधिकारियों में भाजपा ने 12 पिछड़ों और छह अति-दलितों को पदाधिकारी बनाकर सपा और बसपा को असमंजस में डाल दिया है। सपा की प्रदेश कार्यकारिणी घोषणा के लिए पूरी तरह तैयार हो गयी थीं, लेकिन भाजपा की कार्यकारिणी घोषित होने के बाद नए सिरे से कवायद शुरू हो गयी है, जिसमें अति-पिछड़ों, अति-दलितों व अल्पसंख्यकों को स्थान देने के लिए फिर से कमेटी गठन पर काम चल रहा है।

अति-दलित मतों का झुकाव भाजपा की तरफ तो है ही सपा सरकार से उपेक्षित अति-पिछड़ा वर्ग भी भाजपा में भविष्य तलाश रहा है। बसपा अपने परम्परागत जाटव, चर्मकार व मुस्लिम वोट बैंक को अपनी तरफ आकर्षित करने काम में जुटी हुयी है। बसपा अपने दो सदस्य विधान परिषद में भेजेगी, जिसमें राष्ट्रीय महासचिव व विधान परिषद में प्रतिपक्ष के नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी का फिर से जाना तो निश्चित ही है, दूसरे सदस्य के रूप में किसी दलित या अति-पिछड़े को भेजा जा सकता है।

भाजपा 41 विधायकों की मदद से एक सदस्य को आसानी से भेजेगी। भाजपा के विनोद पांडे और बाबू राम एमकॉम का कार्यकाल पूरा हो रहा है, लेकिन इस बार विधान परिषद में जाने से ये दोनों मोदी और शाह फार्मूला के कारण वंचित होंगे। भाजपा सूत्रों की माने, तो भाजपा किसी अति-पिछड़े को ही विधान परिषद में भेजेगी, जिसमें प्रकाश पाल, बहोरन लाल मौर्य, स्वतंत्रदेव सिंह के साथ अति दलित वर्ग के लक्ष्मण आचार्य में से किसी एक के नाम पर मुहर लग सकती है।

समाजवादी पार्टी के जिन तीन सदस्यों का कार्यकाल पूरा हो रहा है, उनमें स्वास्थ्य मंत्री अहमद हसन, रमेश यादव और डॉ. सरोजनी अग्रवाल का नाम शामिल है। इनमें से अहमद हसन का फिर से विधान परिषद जाना निश्चित है। सपा अपने आधार वोट यादव को दुरुस्त करने के लिए एक या दो नामों पर विचार कर सकती है। इनमें पार्टी सूत्रों के आधार पर काशी विद्यापीठ छात्रसंघ व समाजवादी पार्टी छात्र सभा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ. उमाशंकर सिंह यादव तथा इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व कार्यकारी अध्यक्ष रामवृक्ष यादव का नाम चर्चा में है। यदि पार्टी किसी वैश्य समुदाय को प्रतिनिधित्व देती है, तो उनमें से संजय गर्ग, संदीप बंसल, गोपाल अग्रवाल या सुरेन्द्र मोहन में से किसी के नाम पर मुहर लगायी जा सकती है। अल्पसंख्यक वर्ग में आशु मलिक, जफर अमीन व जावेद आब्दी में से किसी एक युवा नेता को अल्पसंख्य चेहरा के रूप में विधान परिषद में प्रवेश दिया जा सकता है।

पंकज शर्मा
(लेखक- सामाजिक-राजनीतिक समीक्षक हैं)

फाइल फोटोः यूपी विधान भवन।