Wednesday, September 1, 2021

‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ की निष्क्रियता बढ़ी, ‘यादव मंच’ से जुड़ रहे लोग

516522774लखनऊ ।। पूरे देश के यादव समाज की आवाज को जोरदार तरीके से उठाने वाली ‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ की निष्क्रियता लगातार बढ़ती जा रही है। यह यादव समाज और समाजवादी पार्टी दोनों के लिए शुभ संकेत नहीं है। इससे दोनों को भारी नुकसान हो रहा है। इसका खामियाजा आने वाले दिनों में भारी कीमत देकर चुकाना पड़ सकता है। यूपी विधानसभा चुनाव में भी इसका असर देखने को मिलेगा। महासभा की सुस्ती की वजह से सक्रियता के साथ काम करने वाले लोग अब ‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ की ओर से मुंह मोड़ रहे हैं। वह लखनऊ में एक संस्था ‘यादव मंच’ बनाकर लोगों की समस्याओं को उठा रहे हैं और आपस में जुड़ भी रहे हैं। ‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ की निष्क्रियता बढ़ने का ही नतीजा है कि ‘यादव मंच’ की ओर तेजी से लोगों का झुकाव बढ़ा है। हालांकि ‘यादव मंच’ के संरक्षक आकाशवाणी के पत्रकार अनुराग यादव कहते हैं कि ऐसा नहीं है, ‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ अपनी जगह है, ‘यादव मंच’ अपनी जगह। वह पूरे मामले को लेकर कुछ भी कहने से बचने की कोशिश करते हैं।

क्यों उठ रहे हैं सवाल?

‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ की निष्क्रियता को लेकर जो सवाल किए जा रहे हैं, उसे कोई भी बड़ी ही आसानी से समझ सकता है। महासभा का काम लोगों को एकजुट कर उनकी समस्याओं को दूर करना है, लेकिन ‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ इसमें एक दम पिछड़ रही है। हालात तो यह है कि इस संस्था के राष्ट्रीय अध्यक्ष उदय प्रताप सिंह खुद लखनऊ में रहते हैं। वह यूपी में बहुमत की सपा सरकार में कैबिनेट मंत्री हैं। यह समय उनके लिए और प्रदेश के लिए भी स्वर्णिम युग कहा जा सकता है। क्योंकि ऐसा मौका उनके जीवन में भी कभी नहीं आया था। इसके बाद भी यूपी की राजधानी लखनऊ में इस अखिल भारतवर्षीय संस्था का कोई कार्यालय तक नहीं खुल पाया। यह संस्था का अपमान भी है। उदय जी खुद कैबिनेट मंत्री बनने के साथ ही अपने बेट असीम को एमएलसी बनवाने में कामयाब रहे, लेकिन यह संस्था पीछे छूटती चली गई। महासभा के लोग उदय जी जिंदाबाद करते रह गए। आज भी हालात यह है कि उदय जी के लखनऊ में होने के बाद भी चार से छह महासभा के प्रतिनिधि बड़ी ही मुश्किल से मिलते हैं। इससे अधिक लोग तो इसी संस्था के राष्ट्रीय महासचिव प्रमोद चौधरी से मिलकर अपनी बात रखते हैं।

‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ की निष्क्रियता का हाल तो यह है कि अध्यक्ष महोदय से आसानी से मिलना दूभर होता है। यदि किसी ने मिलने के लिए ठान ली, तो उसे पहले यह बताना होगा कि उसका मिलने का मकसद क्या है। वह उदय जी को कैसे जानता है। राजधानी में कार्यालय नहीं होने से उदय जी से मिलना और भी मुश्किल हो जाता है। वैसे वह रहते हैं गोमती नगर में, जहां लोगों का जाना और मिलना नामुम्किन है। हिन्दी साहित्य संस्थान में कार्यकारी अध्यक्ष होने की वजह से वह यहां पर बैठते तो हैं, लेकिन बहुत ही कम समय के लिए और यदि बैठते भी हैं, तो मिलना इस लिए मुश्किल होता है। क्योंकि यहां पर ‘यादव महासभा’ के प्रतिनिधि ही नहीं, बल्कि बाकी लोग भी होते हैं, ऐसे में आपनी बात कह पाना आसान नहीं होता है।

अखिलेश कृष्ण मोहन
अखिलेश कृष्ण मोहन, पत्रकार (लखनऊ)

सरकार का उपयोग और सरकार को मदद दोनों ही नहीं कर पाए महासभा के अध्यक्ष

समाजवादी सरकार में कई बार यह सवाल उठता है कि यादव जाति-समाज के लोगों का सबसे अधिक भला हो रहा है, वह नौकरियों में मलाईदार पदों पर हैं। हाल ही में जब इसको लेकर भाजपा ने राज्यपाल राम नाईक के माध्यम से यूपी सरकार पर जोरदार हमला बोला, तो इसका जवाब महासभा को देना चाहिए था, लेकिन उदय जी की निष्क्रियता का ही नतीजा रहा कि न तो वह खुद बोले और न ही संस्था का कोई भी प्रतिनिधि बोल पाया और इस झूठ का जवाब मजबूती के साथ राज्यसभा सांसद राम गोपाल यादव को देना पड़ा। इसके बाद राज्यपाल और भाजपा के नेताओं की गलत बयानबाजी में बदलाव आया। ऐसा नहीं है कि समाजवादी पार्टी सरकार के यादव नेता-मंत्री महासभा का समर्थन नहीं करते हैं, बल्कि वह हर कदम पर साथ देते हैं, मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तो खुद ही अध्यक्ष जी के पैर छूकर नमस्कार करते हैं, लेकिन महासभा इसका उपयोग नहीं कर पा रही है। यही नहीं महासभा सपा को मदद देने में भी नाकाम साबित हो रही है।

बर्बाद हो जाएगी महासभाः सुखराम यादव

हाल ही में दिल्ली में हुए राष्ट्रीय अधिवेशन के दौरान मंच से यह बात भी उठी थी। यूपी विधान परिषद के पूर्व सभापति सुखराम यादव ने अपनी वेदना मंच से ही लोगों के सामने रखी थी। उन्होंने कहा था कि ‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ बर्बाद हो जाएगी। समाज के लिए महासभा की इस कदर की निष्क्रियता ठीक नहीं है। शिवपाल यादव को ‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बना दिया जाना चाहिए। शिवपाल यादव खुद सक्रियता के साथ इसका बेहतर तरीके से नेतृत्व कर सकते हैं।

जब भी यादवों पर हमला हुआ मौन रही महासभा

‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ कहने के लिए तो यादव जाति, समाज के लिए न्याय पूर्ण तरीके से लड़ाई लड़ने का काम करती है, लेकिन हकीकत यह है कि जब-जब यादवों पर हमला हुआ, यह महासभा मौन रही। हाल ही में भाजपा के यूपी अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य ने कहा कि मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जातिवादी और सांप्रदायवादी चश्मे को उतार कर देखें, तो उन्हें खुद ही केंद्र सरकार के काम दिखाई देंगे। यहां जातिवादी आरोप लगा, तब भी महासभा मौन रही। जबकि सरकार ने ‘यादव महासभा’ के अध्यक्ष उदय प्रताप जी को कैबिनेट स्तर का दर्जा देकर मंत्री बना रखा है। इसके बाद भी वह सरकार और महासभा का संरक्षण करने में निष्क्रिय बने हुए हैं। मुख्यमंत्री को सरकार के स्तर पर तो मोर्चा संभालना पड़ता ही है, वह संभालते भी हैं, लेकिन महासभा अपने काम में फेल हो रही है।

लखनऊ में पत्रकार भी परेशान

जब भी मीडिया की बात होती है, तो एक मुद्दा सबसे पहले उभर कर सामने आता है कि पत्रकारिता में अपने लोग नहीं हैं, इस लिए खबरें नहीं लिखी जाती हैं, लेकिन हकीकत यह है कि इस महासभा ने अपने लोगों को कभी पैदा होने ही नहीं दिया। पत्रकारों तक से ‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष इस कदर दूर हैं कि यह चर्चा चलने लगी है कि वह नहीं मिलेंगे और मिलेंगे तो तानाशाह की तरह से, ऐसे में मिलना ठीक नहीं। हाल ही में उदय प्रताप जी से मिलने के लिए एक पत्रकार महोदय पहुंचे और उनसे सरकारी घर को लेकर पैरवी करने के लिए निवेदन किया, तो उदयजी का जवाब था कि मैं यह काम नहीं करवा सकता, फला कवि और पत्रकार आस्थाना के लिए मैं नहीं करवाया तो आपके लिए कैसे करूं। यहां अस्थाना जी पहले आ गए। ऐसे में सवाल उठता है कि पत्रकार भी यदि महासभा के अध्यक्ष के पास खुद का काम लेकर नहीं जा सकते, अध्यक्ष खुद कैबिनेट मंत्री हैं और उनकी ही सरकार है, तो फिर वह कब खुलकर काम करेंगे। शायद कभी नहीं… यही वजह है कि लोग दुखी होकर अब ‘यादव मंच’ की ओर रुख कर रहे हैं। जहां अपनी बात को वह खुलकर रख सकें, अपनी लड़ाई वह लड़ तो सकें।

नोटः इस ग्राउंड रिपोर्ट पर पाठकगण को ऐतराज हो सकता है, वह हकीकत जानने के लिए ‘अखिल भारतवर्षीय यादव महासभा’ के राष्ट्रीय अध्यक्ष से मिल लें या फोन पर बात कर लें, हकीकत उनको पता चल जाएगी। इस संगठन की उदासीनता से लोग भटक रहे हैं और समाजवादी पार्टी के लिए यह ठीक नहीं है। हकीकत कड़वी लग सकती है, ठीक उसी तरह जिस तरह से दवा मरीज को कड़वी लगती है, लेकिन इससे मुंह मोड़ा नहीं जा सकता है। इस संस्था को सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव जैसे लोगों ने सींचा है। संस्था की वर्तमान स्थिति से युवा सबसे अधिक आहत हैं।

फोटोः फाइल।